1 कुरिन्थियों 11
पाठ
कुरिन्थ की एक भीड़ भरी हवेली में शाम ढल रही है। पौलुस पहले सिर ढकने की बात उठाते हैं: कौन प्रार्थना और भविष्यद्वाणी करते समय कैसा दिखे, और उस दिखावे के पीछे कौन-सा क्रम है, "हर एक पुरुष का सिर मसीह है: और स्त्री का सिर पुरुष है: और मसीह का सिर परमेश्वर है।" फिर उनकी आवाज़ कठोर हो जाती है, क्योंकि खबर आई है कि सभा में भोजन बँटा हुआ है: "कोई भूखा रहता है, और कोई मतवाला हो जाता है।" इसी टूटी हुई मेज़ पर वे उस रात की स्मृति रखते हैं जब प्रभु यीशु ने रोटी तोड़ी और कहा, "यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है।" अंत में चेतावनी: स्वयं को जाँचो, और "एक दूसरे के लिये ठहरा करो।"
मूल बात
इस अध्याय का हृदय यह है कि उपासना कभी निजी मामला नहीं होती; वह हमेशा किसी शरीर का अंग होती है। पौलुस दो बार वही बात अलग-अलग कोणों से कहते हैं। पहले: तुम्हारा शरीर, तुम्हारा सिर, तुम्हारी उपस्थिति परमेश्वर के सामने कुछ कहती है, और वह कहना दूसरों के सामने भी होता है। फिर: जो मेज़ मसीह की मृत्यु का प्रचार करती है, वहाँ यदि अमीर पहले खा लेता है और मज़दूर देर से आकर खाली हाथ लौटता है, तो वह भोजन प्रभु भोज रह ही नहीं जाता, "यह प्रभु भोज खाने के लिये नहीं।" ईश्वर की कृपा साझा की गई कृपा है। जो देह के लिए तोड़ी गई रोटी लेकर देह को तोड़ता है, वह अपने ही निर्णय की मेज़ पर बैठा है। यही वह गंभीरता है जिसे पौलुस हल्का नहीं होने देते।
सूत्र
पौलुस जिस रात की बात करते हैं, वह कोई भी रात नहीं थी: "जिस रात पकड़वाया गया।" विश्वासघात की रात में यीशु ने रोटी ली और धन्यवाद किया। यह पूरे उद्धार-इतिहास का सार है: जहाँ मनुष्य तोड़ता है, वहाँ परमेश्वर देते हैं। कटोरे के शब्द और भी गहरे जाते हैं, "यह कटोरा मेरे लहू में नई वाचा है।" सीनै पर वाचा लहू छिड़ककर बाँधी गई थी, और भविष्यद्वक्ताओं ने एक नई वाचा का वादा किया था जो पत्थर पर नहीं, हृदय पर लिखी जाएगी। कुरिन्थ की उस मेज़ पर वह वादा रोटी और दाखरस के रूप में रखा है। और मेज़ का चेहरा दो दिशाओं में है: पीछे क्रूस की ओर, आगे उस दिन की ओर, "जब तक वह न आए।" हर बार यह भोज खाना एक घोषणा भी है और एक प्रतीक्षा भी।
दर्पण
यह अध्याय हमारी उस आदत को पकड़ता है जिसमें हम आराधना को अपनी सुविधा के हिसाब से ढालते हैं। कुरिन्थ के अमीर मालिक शायद यह भी न सोचते थे कि वे कुछ गलत कर रहे हैं; उनके पास समय था, वे जल्दी आ जाते थे, अच्छा भोजन लाते थे, अपने बराबर वालों के साथ बैठते थे। दिन भर काम करके देर से पहुँचने वाला दास केवल बचा-खुचा पाता था। हमारे यहाँ भी यही होता है, बस रूप बदल जाता है: वही लोग सामने, वही लोग अनदेखे, वही कोना जहाँ किसी से बात नहीं होती। पौलुस का सवाल चुभता है, "जिनके पास नहीं है उन्हें लज्जित करते हो?" आज ही, अगली सभा से पहले, अपनी मंडली के उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिससे आप कभी बात नहीं करते, और उसके लिए दो मिनट प्रार्थना कीजिए।
संदर्भ
कुरिन्थ बंदरगाह का शहर था: पैसा, जहाज़, मंदिर, और तेज़ी से बदलती सामाजिक सीढ़ियाँ। कलीसिया किसी इमारत में नहीं, किसी धनी सदस्य के घर में मिलती थी। ऐसे रोमी घरों में एक छोटा भोजन-कक्ष होता था जहाँ सम्मानित मेहमान लेटकर खाते थे, और बाहर आँगन में बाकी लोग। रोमी दावतों का दस्तूर ही यह था कि भोजन की गुणवत्ता मेहमान के दर्जे के अनुसार अलग हो। यानी कुरिन्थ के मसीही कुछ नया नहीं कर रहे थे; वे बस अपने शहर की तरह व्यवहार कर रहे थे। यही पौलुस की सबसे बड़ी शिकायत है। सिर ढकने की चर्चा भी इसी दुनिया की है, जहाँ बाल और ओढ़नी सम्मान, वैवाहिक स्थिति और शालीनता की भाषा बोलते थे, जैसे आज कपड़े बोलते हैं।
कठिन प्रश्न
पद 30 को हल्का करना कठिन है: "इसी कारण तुम में बहुत से निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए।" क्या परमेश्वर सचमुच मेज़ के पाप का दंड बीमारी और मृत्यु से देते हैं? पौलुस इसे समझाते नहीं, बस कहते हैं, और अगले ही वाक्य में इसे पिता की ताड़ना कहते हैं, "इसलिए कि हम संसार के साथ दोषी न ठहरें।" यहाँ दो बातें साथ खड़ी रहती हैं जिन्हें हम अलग करना चाहते हैं: परमेश्वर की गंभीरता और परमेश्वर की करुणा। मैं इससे यह नियम नहीं बनाऊँगा कि हर बीमारी किसी पाप का फल है; यीशु ने स्वयं यह जोड़ ठुकराई। पर मैं यह भी नहीं मिटाऊँगा कि पवित्र वस्तु के साथ लापरवाही करने के परिणाम होते हैं। यह रहस्य असहज है, और असहज ही रहना चाहिए।
मुख्य पात्र
इस पूरे अध्याय के बीच में एक शांत आकृति खड़ी है: वह व्यक्ति जो जानता है कि आज रात उसे पकड़वाया जाएगा, और फिर भी रोटी लेकर धन्यवाद करता है। यही यीशु का सबसे गहरा चित्र है। वे शिकायत नहीं करते, मेज़ छोड़कर नहीं उठते, गद्दार को बाहर नहीं निकालते। वे तोड़ते हैं और देते हैं, "यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है।" उस "तुम्हारे लिये" में वे सब शामिल हैं जो उस रात भागने वाले थे। और वे एक ही आज्ञा छोड़ते हैं, कोई सिद्धांत नहीं, केवल स्मरण: "मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।" जिस कलीसिया ने यह स्मरण गँवा दिया, वह खाकर भी भूखी रह गई। जो इसे थामे रहती है, वह अपने ही स्वार्थ के विरुद्ध हर बार फिर से सिखाई जाती है।
चिंतन
पिछली बार जब आपने प्रभु भोज लिया, तब आपके मन में मुख्य रूप से क्या था: अपनी आत्मा का हिसाब, या उन लोगों का चेहरा जिनके साथ आप वह रोटी बाँट रहे थे?
आपकी मंडली में "एक दूसरे के लिये ठहरा करो" का ठोस अर्थ क्या होगा, किसके लिए ठहरना पड़ेगा, और आपको उसमें क्या खोना पड़ेगा?
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1 Corinthians 11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 11 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 11 किस विषय में है?
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1 कुरिन्थियों 11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
तुम मेरी जैसी चाल चलो जैसा मैं मसीह के समान चलता हूँ।" पौलुस यह बात ठीक उसके बाद कहता है जब उसने अपने अधिकार छोड़े, अपना लाभ नहीं बल्कि दूसरों का भला खोजा। यानी जिस चाल की नकल करनी है, वह चमक नहीं, झुकना है। क्या कोई तुम्हें देखकर मसीह की ओर चल सकता है? सवाल डराता नहीं, बुलाता है।
पिता, धन्यवाद कि हर बार जब हम वह रोटी खाते और उस कटोरे में से पीते हैं, हमें प्रभु यीशु की मृत्यु याद आती है, और यह भी कि वह फिर आनेवाला है। धन्यवाद कि आपने हमें ऐसी साधारण रोटी और दाखरस में अपने प्रेम की इतनी बड़ी गवाही सौंपी है।
जिस रात वह पकड़वाया गया, उसी रात उसने धन्यवाद किया। विश्वासघात की मेज़ पर भी उसके होंठों पर शिकायत नहीं, धन्यवाद था। फिर उसने रोटी तोड़ी और कहा, "यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है; मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।" वह टूटा, ताकि तू जुड़ सके। आज जब सब कुछ बिखरा लगे, याद रख, तेरे लिए कोई पहले ही टूट चुका है।
पिता, धन्यवाद कि आपने किसी को भी बेमतलब नहीं रचा। आपका वचन कहता है कि स्त्री पुरुष के लिये सृजी गई, और इसमें हम आपकी सोची समझी योजना देखते हैं। धन्यवाद कि हमारे रिश्ते संयोग नहीं, बल्कि आपके हाथों का काम हैं, जहाँ हम एक दूसरे का सहारा बनते हैं।
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