1 पतरस 3:12
पाठ
पतरस दाऊद के एक भजन को उधार लेकर अपने सताए हुए पाठकों के सामने रखता है: "क्योंकि प्रभु की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान उनकी विनती की ओर लगे रहते हैं, परन्तु प्रभु बुराई करनेवालों के विमुख रहता है।" बात सीधी है और इसीलिए चुभती है। परमेश्वर दूर खड़े दर्शक नहीं हैं जो निष्पक्षता के नाम पर चुप रहें; उनकी आँखें किसी ओर लगी हैं और उनकी पीठ किसी ओर है। पिछले पदों में जो कहा गया, कि जीभ को बुराई से रोको, भलाई करो, मेल मिलाप ढूँढ़ो, उसका आधार यहाँ आता है। ऐसा जीवन इसलिए सार्थक है क्योंकि उसे देखा जा रहा है, और सुना जा रहा है।
मूल बात
आँखें और कान, ये मनुष्य के अंग हैं, और परमेश्वर के पास न शरीर है न कान। फिर भी पवित्र आत्मा ने यही भाषा चुनी, क्योंकि वाचा की भाषा ऐसी ही होती है। मिस्र में परमेश्वर ने कहा था कि उन्होंने अपने लोगों की चिल्लाहट सुनी और उनके दुःख को देखा; तब से यह देखना और सुनना परमेश्वर की उस निष्ठा का चिह्न बन गया जो किसी अनुबंध से नहीं, बल्कि उनके अपने वचन से बँधी है। पतरस यह चिह्न उन बिखरे हुए, बदनाम किए गए विश्वासियों पर लगा देता है। और ध्यान दें: यहाँ "धर्मी" वे नहीं जो अपने आचरण से अंक कमा चुके हैं, बल्कि वे जो पद 9 के अनुसार "आशीष के वारिस होने के लिये बुलाए गए" हैं। धार्मिकता पहले उपहार है, फिर चाल-चलन। और परमेश्वर का विमुख हो जाना कोई भावनात्मक नाराज़गी नहीं; वह न्याय है, उस पीठ का फेर जिससे बुराई अंत में अकेली रह जाती है।
सूत्र
भजन 34 दाऊद ने तब लिखा जब वह अपनी जान बचाकर भाग रहा था, राजा नहीं, भगोड़ा। पतरस उस भजन को उठाकर उन लोगों को देता है जिनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं। पर बीच में एक घटना खड़ी है जिसे पतरस कुछ ही पदों बाद नाम देता है: "अधर्मियों के लिये धर्मी ने पापों के कारण एक बार दुःख उठाया।" यहीं यह पद अपनी पूरी गहराई पाता है। गतसमनी में एक धर्मी ने विनती की, और वह विनती सुनी गई, पर उत्तर कटोरे को हटाना नहीं, बल्कि पुनरुत्थान था। परमेश्वर की आँखें अपने धर्मी पर लगी थीं, तब भी जब क्रूस पर सब कुछ इसके उलट दिखता था। इसलिए वारिसों से किया गया यह वादा भावुक आशावाद नहीं; यह खाली कब्र पर टिका है।
दर्पण
हम सब यह जानते हैं कि कौन हमें देख रहा है। दफ्तर में वह व्यक्ति जो आपकी हर गलती नोट करता है, रिश्तेदारों का समूह जो आपकी शादी या आपकी संतान पर राय रखता है, वह पड़ोसी जिसने आपके विश्वास को मज़ाक बना दिया। इन नज़रों के दबाव में हम या तो कठोर हो जाते हैं या दिखावटी। पतरस एक और जोड़ी आँखों की याद दिलाता है, जिनके सामने आपकी वह भलाई भी दर्ज है जिसे किसी ने नहीं सराहा, और वह चुप्पी भी जब आपने गाली का बदला गाली से नहीं दिया। साथ ही यह पद यह भी कहता है कि जो आपके साथ अन्याय कर रहा है, उसके सामने परमेश्वर की पीठ है; इसलिए बदला लेना आपका काम नहीं। आज एक काम कीजिए: उस व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसने आपको हाल में चोट पहुँचाई, और उस नाम के लिए ज़ोर से आशीष की एक प्रार्थना कहिए।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और वे यहाँ बहुत ही ठोस रूप में सामने आते हैं। यह वह देवता नहीं जो ऊँचाई पर बैठकर मानव मामलों से ऊब चुका है। इनकी आँखें झुकी हुई हैं, इनके कान लगे हुए हैं, यानी इनका ध्यान किसी सिद्धांत पर नहीं, व्यक्तियों पर है। पर वही परमेश्वर मुँह फेरना भी जानते हैं, और यह वाक्य का सबसे कठोर हिस्सा है। जो प्रेम पक्ष नहीं ले सकता वह प्रेम नहीं, उदासीनता है। यहाँ ईश्वर का चरित्र दो हिस्सों में नहीं बँटता, जैसे एक तरफ अनुग्रह और दूसरी तरफ न्याय; यह एक ही निष्ठा के दो चेहरे हैं। जो उन्हें पुकारता है वह सुना जाता है, और जो उनकी रचना को कुचलता है वह अंततः अपने ही सन्नाटे में छोड़ दिया जाता है।
संदर्भ
पतरस उन विश्वासियों को लिख रहा है जो एशिया माइनर के प्रांतों में बिखरे हैं, अल्पसंख्यक, अक्सर गुलाम, पत्नियाँ जिनके पति मसीही नहीं, कारीगर जिनका व्यापार मंदिरों के त्योहारों से जुड़ा था। रोमी समाज में धर्म परिवार और नगर की पहचान थी; मसीह को मानना का अर्थ था अपने घर और मोहल्ले की देवमूर्तियों से हट जाना, और इसीलिए देशद्रोही और असामाजिक कहलाना। पद 16 में जिस "बदनामी" की बात है वह अफवाह नहीं, रोज़ की सच्चाई थी। ऐसे लोगों के पास अदालत नहीं थी, संरक्षक नहीं था, कोई ऊँची पहुँच नहीं थी। इसी शून्य में पतरस भजन 34 रखता है: तुम्हारी विनती के लिए एक कान खुला है, और वह कान सम्राट का नहीं, प्रभु का है।
अंतर्पाठ
भजन 34 का मूल संदर्भ ध्यान देने योग्य है: वहाँ दाऊद कहता है कि उसने प्रभु को ढूँढ़ा और वे उससे मिले, और यही वह अनुभव है जिसे पतरस अपनी कलीसिया पर लागू करता है। दूसरी ओर, पतरस स्वयं पद 7 में एक चेतावनी दे चुका है, कि पति अपनी पत्नी का आदर करे "जिससे तुम्हारी प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ"। दोनों पदों को साथ पढ़िए और तस्वीर पूरी हो जाती है: वही कान जो धर्मी की विनती की ओर लगा है, कठोरता से भरे घर की प्रार्थना पर बंद भी हो सकता है। सुने जाना कोई स्वचालित अधिकार नहीं है जो नाम मसीही होने से मिल जाता हो; वह उस जीवन के साथ जुड़ा है जो उस अनुग्रह के अनुरूप जिया जाता है जिसने हमें वारिस बनाया।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन सा ऐसा काम है जो कोई नहीं देखता, और क्या यह जानना कि परमेश्वर की आँखें उस पर लगी हैं, आपको सचमुच बदलता है?
जब आपको लगता है कि आपकी प्रार्थना दीवार से टकराकर लौट आई है, तो आप इस पद के साथ क्या करते हैं: उसे झुठलाते हैं, या क्रूस पर सुनी गई विनती की रोशनी में फिर से पढ़ते हैं?
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1 Peter 3:12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 पतरस 3:12 का क्या अर्थ है?
1 पतरस 3:12 किस विषय में है?
1 पतरस 3:12 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 पतरस 3:12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 पतरस 3:12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Peter 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे भीतर डर जल्दी घर बना लेता है। "अगर ऐसा हो गया तो?" यही सोच मुझे थका देती है। मुझे ऐसा भरोसा दे कि मैं भलाई करती रहूँ, चुपचाप, बिना डरे। आप साथ हैं, यह सच मेरे मन में गहरा उतर जाए।
क्योंकि प्रभु की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान उनकी प्रार्थना की ओर लगे रहते हैं।" पतरस यह उन लोगों को लिख रहा था जिन्हें गाली दी जा रही थी, और वह कहता है, बुराई के बदले बुराई मत करो। क्योंकि जब लोग तुझसे मुँह फेर लेते हैं, तब भी एक जोड़ी आँखें तुझ पर टिकी हैं। तेरी फुसफुसाहट भी उस तक पहुँचती है।
पिता, मैं अकसर बाहर से अच्छा दिखने में लगा रहता हूँ, और भीतर का मन सूखा रह जाता है। मुझे सिखा कि असली सुंदरता नम्र और शांत हृदय में है। मेरे अंदर वह कोमलता बढ़ा, जो तेरी नज़र में अनमोल है।
नूह के दिनों में जिस पानी ने दुनिया को डुबाया, उसी ने जहाज़ को ऊपर उठाया। पतरस कहता है कि बपतिस्मा "शरीर के मैल को दूर करना नहीं, वरन् शुद्ध विवेक से परमेश्वर के लिये वादा है।" यानी बात पानी की नहीं, उस जी उठे मसीह की है जिस पर तू भरोसा करता है। तेरा विवेक आज किसके सामने साफ़ है, लोगों के या परमेश्वर के?
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