2 इतिहास 36
पाठ
योशिय्याह की मृत्यु के बाद यहूदा का सिंहासन एक फिसलन भरी ढलान बन जाता है: यहोआहाज तीन महीने, यहोयाकीम ग्यारह वर्ष, यहोयाकीन तीन महीने और दस दिन, सिदकिय्याह ग्यारह वर्ष। हर राजा को विदेशी शक्तियाँ बिठाती और उतारती हैं, मिस्र का नको और फिर बाबेल का नबूकदनेस्सर, और हर एक के बारे में वही सूखा वाक्य दोहराया जाता है कि उसने वही किया जो यहोवा की दृष्टि में बुरा है। परमेश्वर बार-बार अपने दूत भेजते हैं, पर लोग उनकी हँसी उड़ाते हैं, और अंत में मन्दिर जल जाता है, शहरपनाह टूट जाती है, बचे हुए लोग बाबेल ले जाए जाते हैं। सत्तर वर्ष तक देश सूना पड़ा रहकर अपने विश्राम भोगता है। और फिर, बिलकुल अप्रत्याशित रूप से, एक फ़ारसी राजा कुस्रू का फ़रमान: जो चाहे, वह ऊपर यरूशलेम को जाए।
मर्म
यह अध्याय इतिहास की किताब का अंत है, पर यह इतिहास नहीं, धर्मविज्ञान है। लेखक यह नहीं कहता कि बाबेल ताक़तवर था इसलिए यरूशलेम गिरा; वह कहता है कि यहोवा ने सभी को उसके हाथ में कर दिया। परमेश्वर के धैर्य की एक सीमा है, और वह सीमा मनमानी नहीं, दयालु है: उन्होंने "बड़ा यत्न करके" दूत भेजे, क्योंकि उन्हें अपनी प्रजा पर तरस आता था। न्याय तब आता है जब करुणा को लगातार ठुकराया जाता है। पर यहाँ असली चौंकाने वाली बात यह है कि परमेश्वर का वचन दोनों तरफ़ काम करता है: वही यिर्मयाह जिसका वचन विनाश लाया, उसी का वचन सत्तर वर्ष बाद वापसी का द्वार खोलता है। परमेश्वर का अंतिम शब्द दण्ड नहीं, बहाली है, और यही वह दिशा है जिसमें पूरा शास्त्र मसीह की ओर बहता है।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि यह किताब कैसे ख़त्म होती है: एक वाक्य के बीच में, एक खुले दरवाज़े पर। "वह वहाँ रवाना हो जाए।" कोई समापन नहीं, कोई निष्कर्ष नहीं, बस एक निमंत्रण जो हवा में लटका रहता है। इब्रानी बाइबल यहीं समाप्त होती है, और यह संयोग नहीं। दाऊद का वंश मिट्टी में मिल चुका है, राजा बेड़ियों में बाबेल जा चुके हैं, मन्दिर राख है, और फिर भी परमेश्वर एक विदेशी सम्राट के मन को उभारकर द्वार खोल देते हैं। यही परमेश्वर की कार्यशैली है: वे मलबे से शुरू करते हैं। और यह मलबा बंजर नहीं रहता, क्योंकि पद 10 का यहोयाकीन, वही आठ साल का लड़का जिसे तीन महीने बाद उठा ले जाया गया, मत्ती 1:11 में यीशु मसीह की वंशावली में खड़ा है। निर्वासन मसीह के परिवार-वृक्ष में लिखा गया है। जो सिंहासन यहाँ बुझता दिखता है, वह वास्तव में उस राजा की ओर बढ़ रहा है जिसका राज्य बाबेल कभी छीन नहीं सका।
दर्पण
सिदकिय्याह के बारे में सबसे चुभने वाला वाक्य यह है: यिर्मयाह परमेश्वर की ओर से बोलता था, "तो भी वह उसके सामने दीन न हुआ।" उसने भविष्यद्वक्ता को मारा नहीं, बहस भी शायद नहीं की। उसने बस सिर नहीं झुकाया। यह हमारा भी तरीक़ा है। पत्नी वही बात तीसरी बार कहती है और आप विषय बदल देते हैं। सहकर्मी आपके काम पर ईमानदार टिप्पणी करता है और आप मन में उसका मक़सद तौलने लगते हैं। रविवार को उपदेश ठीक उसी जगह छूता है जहाँ दुखता है, और आप गाड़ी में बैठते ही मौसम की बात करने लगते हैं। पद 16 कहता है कि लोग दूतों को "उपहास में उड़ाते" थे; हमारा उपहास व्यंग्य नहीं, विषय बदलने की कला है। आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसकी वही बात आप तीन बार टाल चुके हैं, और ज़ोर से कहिए, "प्रभु, हो सकता है यह आपकी ओर से हो।" फिर काग़ज़ अपनी बाइबल में रख दीजिए।
संदर्भ
हम 609 से 586 ईसा पूर्व के बीच खड़े हैं। योशिय्याह मगिद्दो में मारा जा चुका है, और यहूदा अचानक दो महाशक्तियों के बीच की चक्की में है: दक्षिण में मिस्र, उत्तर में उभरता हुआ बाबेल। यहूदा राष्ट्र नहीं, करदाता प्रांत है। नको एक राजा को हटाकर दूसरे को बिठाता है और उसका नाम तक बदल देता है, एलयाकीम से यहोयाकीम, क्योंकि प्राचीन पूर्व में नाम बदलना मालिकाना हक़ की मुहर थी। सौ किक्कार चाँदी का जुर्माना किसी बड़ी सेना की क़ीमत नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का तरीक़ा है कि तुम्हारी जेब भी हमारी है। और जो लेखक यह सब लिख रहा है, वह इन घटनाओं से लगभग डेढ़ सौ साल बाद, फ़ारसी शासन के अधीन एक छोटे-से यरूशलेम में बैठा है, जहाँ दूसरा मन्दिर पहले की तुलना में मामूली है और कोई दाऊदवंशी राजा गद्दी पर नहीं। वह अतीत नहीं गिना रहा; वह अपने समुदाय को समझा रहा है कि हम यहाँ तक कैसे पहुँचे और अब क्या उम्मीद बची है।
एक बारीकी
पात्रों पर नज़र रखिए। पद 7 में नबूकदनेस्सर "यहोवा के भवन के कुछ पात्र" ले जाता है। पद 10 में "मनभावने पात्र" ले जाता है। पद 18 में "क्या छोटे, क्या बड़े, परमेश्वर के भवन के सब पात्र"। लेखक इन बर्तनों को धागे की तरह पकड़े हुए है, तीन बार, हर बार ज़्यादा। भवन जल जाता है, दीवारें गिरती हैं, महल राख होते हैं, पर पात्र नष्ट नहीं होते। वे लूट में जाते हैं, दूसरे देवता के मन्दिर में रखे जाते हैं, और वहीं सुरक्षित रहते हैं, जब तक कुस्रू उन्हें लौटाने का आदेश नहीं देता। यह छोटी-सी विवरण-श्रृंखला पूरे अध्याय का ताला खोल देती है: परमेश्वर का न्याय सर्वनाश नहीं है। जो उनकी आराधना का है, वह निर्वासन में भी उनके हाथ से बाहर नहीं जाता। यही बचे हुए शेष लोगों का सिद्धांत है, और अंततः उस बीज का, जिससे मसीह आएँगे।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का असली पात्र न सिदकिय्याह है न नबूकदनेस्सर, बल्कि वे परमेश्वर हैं जो पद 15 में "बड़ा यत्न करके" दूत भेजते हैं। इब्रानी में यहाँ एक मुहावरा है, हशकेम, जिसका शाब्दिक अर्थ है "सुबह जल्दी उठकर"। परमेश्वर सुबह-सुबह उठते हैं और फिर एक दूत भेजते हैं। यह किसी न्यायाधीश की तस्वीर नहीं जो हथौड़ा उठाए बैठा है, बल्कि उस पिता की जो रात भर सो नहीं पाया और भोर होते ही फिर कोशिश करता है। और कारण भी बताया गया है: "क्योंकि वह अपनी प्रजा और अपने धाम पर तरस खाता था।" फिर वही परमेश्वर पद 16 में "झुँझला" उठते हैं। यहाँ क्रोध ठंडा नहीं, आहत है। और अंत में वही परमेश्वर एक अन्यजाति राजा के मन को उभारते हैं। जो जल्दी उठकर बुलाते रहे, वे अंत में स्वयं दरवाज़ा खोलते हैं।
शास्त्र की गूँज
पद 21 का वाक्य कि देश "अपने विश्रामकालों में सुख भोगता रहे" सीधे लैव्यव्यवस्था 26 की चेतावनी उठाता है, जहाँ परमेश्वर ने कहा था कि यदि तुमने भूमि को उसके सब्त नहीं दिए, तो वह सूनी पड़कर अपने सब्त स्वयं ले लेगी। यानी निर्वासन एक हिसाब-किताब है: सत्तर साल का बकाया विश्राम, ब्याज सहित वसूला गया। यह ठंडा लग सकता है, पर इसमें एक अजीब कोमलता है, क्योंकि यह अंतहीन नहीं, गिना हुआ है। और दूसरी गूँज पाठ स्वयं देता है: पद 10 के हाशिये पर मत्ती 1:11। मत्ती वंशावली लिखते हुए निर्वासन को छिपाते नहीं, उसे वंशावली का मोड़ बनाते हैं। जिस कर्ज़ को भूमि सत्तर साल चुकाती रही, उसे अंततः वह चुकाएगा जो इसी बंदी बनाए गए वंश से जन्मा, और जो थके हुओं को विश्राम देने आया।
पहले श्रोता
कल्पना कीजिए कि यह अध्याय किसे पढ़कर सुनाया गया: लौटे हुए लोगों की एक छोटी बस्ती, फ़ारसी प्रांत यहूद, जहाँ बूढ़े लोग पहले मन्दिर को याद करके रोते थे और जवान समझ नहीं पाते थे कि रोना किस बात का। उनके मन में एक सवाल था जो कोई ज़ोर से नहीं पूछता: क्या हमारा परमेश्वर हार गए थे? बाबेल के देवता तो जीतते दिखे। यह अध्याय उन्हें दो बातें सुनाता है। पहली, यहोवा हारे नहीं, उन्होंने ही सौंपा; "यहोवा ने सभी को उसके हाथ में कर दिया।" दूसरी, और यह उनके लिए ज़्यादा चुभने वाली थी, कि पतन का कारण बाहरी सेना नहीं, भीतरी विश्वासघात था, और वह विश्वासघात याजकों से शुरू हुआ। पद 23 का अंतिम वाक्य उनके कानों में आमंत्रण था, इतिहास नहीं: जो अब भी बाबेल में बैठा है, वह उठे और चले।
कठिन प्रश्न
पद 17 को हल्के में मत पढ़िए। जवान लोग पवित्र भवन के भीतर तलवार से मारे गए, कुँवारी पर भी कोमलता नहीं, बूढ़ों पर भी नहीं, और लेखक जोड़ता है कि यहोवा ने ही सौंप दिया। यहाँ कोई भी ईमानदार पाठक ठिठकता है। क्या हर मरा हुआ जवान सिदकिय्याह जितना दोषी था? पाठ इसका उत्तर नहीं देता, और मैं आपके लिए बनाना नहीं चाहूँगा। जो पाठ देता है वह पद 16 का भयावह वाक्य है: "बचने का कोई उपाय न रहा।" कोई मरहम नहीं बचा। पाप की सामूहिक क़ीमत निर्दोष लोगों पर भी गिरती है, और बाइबल इसे छिपाती नहीं। मैं केवल इतना जानता हूँ कि यह वही परमेश्वर हैं जिन्होंने अंततः "कोई उपाय न रहा" को अपने ऊपर ले लिया, और अपने ही पुत्र को उस तलवार के नीचे खड़ा कर दिया जिससे किसी पर कोमलता नहीं हुई। यह उत्तर नहीं है। यह वह जगह है जहाँ प्रश्न घुटने टेकता है।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन में वह कौन-सी आवाज़ है जो बार-बार लौटकर आती है और जिसके सामने आप अभी तक "दीन न हुए" हैं?
पद 15 में परमेश्वर सुबह जल्दी उठकर दूत भेजते हैं। यदि आप परमेश्वर की इस बेचैन दृढ़ता को सचमुच मान लें, तो आपकी प्रार्थना का लहजा कैसे बदलेगा?
यह किताब एक खुले निमंत्रण पर समाप्त होती है: "वह वहाँ रवाना हो जाए।" आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा अब भी बाबेल में बैठा है और लौटने का आदेश सुनने से बच रहा है?
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2 Chronicles 36 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 इतिहास 36 का क्या अर्थ है?
2 इतिहास 36 किस विषय में है?
2 इतिहास 36 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 इतिहास 36 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 इतिहास 36 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Chronicles 36 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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