व्यवस्थाविवरण 34
पाठ
एक बूढ़ा आदमी पहाड़ पर चढ़ता है, वह देश देखता है जिसके लिए उसने चालीस साल रेगिस्तान में झेला, और परमेश्वर उससे कहते हैं: "मैंने इसको तुझे साक्षात् दिखा दिया है, परन्तु तू पार होकर वहाँ जाने न पाएगा।" मूसा वहीं मोआब में मर जाता है, और यहोवा स्वयं उसे मिट्टी देते हैं, ऐसी जगह जिसे आज तक कोई नहीं जानता। इस्राएल तीस दिन रोता है, यहोशू अगुवाई सँभालता है, और व्यवस्थाविवरण की आखिरी पंक्तियाँ एक शोकगीत की तरह कहती हैं कि मूसा जैसा नबी फिर कोई नहीं उठा।
मर्म
यह अध्याय एक ऐसे परमेश्वर को दिखाता है जो अपनी शपथ नहीं तोड़ते, पर अपने सबसे बड़े सेवक को भी छूट नहीं देते। वादा अब्राहम, इसहाक और याकूब से किया गया था, और वह पूरा होगा; मूसा उसे अपनी आँखों से देखता है, पर उसका पैर उस मिट्टी पर नहीं पड़ता। यहाँ ईमानदारी से कहना पड़ता है कि यह खटकता है। इतनी सेवा के बाद यह अंत? पर पाठ शिकायत नहीं करता। वह यही सिखाता है कि उद्धार मूसा के हाथ में नहीं है, कभी था ही नहीं। व्यवस्था देने वाला व्यवस्था के बाहर नहीं खड़ा। जो अगुवा लोगों को कगार तक ले आया, वह स्वयं कगार पर ही रह गया, ताकि किसी को गलतफहमी न हो कि विश्राम में कौन ले जाता है।
सूत्र
व्यवस्थाविवरण यहीं पर एक खुला दरवाज़ा छोड़ता है: "मूसा के तुल्य इस्राएल में ऐसा कोई नबी नहीं उठा।" यह तारीफ़ है, पर उससे बढ़कर यह एक प्रतीक्षा है, क्योंकि परमेश्वर ने पहले ही मूसा के मुँह से कहलवाया था कि उसके समान एक नबी खड़ा किया जाएगा (व्यवस्थाविवरण 18)। सदियों तक इस्राएल इस वाक्य को पढ़ता रहा और गिनता रहा: अभी नहीं, अभी नहीं। फिर एक और पहाड़ आता है, जहाँ मूसा स्वयं यीशु के साथ खड़ा दिखाई देता है, इस बार वादा किए हुए देश के भीतर। और नाम भी ध्यान दीजिए: यहोशू पार ले जाता है, और यहोशू का ग्रीक रूप ही "येशुआ", यीशु है। व्यवस्था कगार तक लाती है; अनुग्रह पार ले जाता है।
दर्पण
आप शायद उस जगह पर खड़े हैं जहाँ काम अधूरा है। जिस बच्चे के लिए आपने प्रार्थना की, वह अभी लौटा नहीं। जिस विभाग को आपने खड़ा किया, उसका फल कोई और काटेगा। जिस मंडली या समूह में आपने बीस साल दिए, वहाँ अब कोई और खड़ा होगा और लोग उसके पीछे चलेंगे। मूसा की कहानी आपसे यह नहीं कहती कि दुख मत करो; इस्राएल तीस दिन रोया, और परमेश्वर ने उस रोने को रोका नहीं। पर वह यह ज़रूर कहती है कि आपकी अधूरी कहानी परमेश्वर की अधूरी कहानी नहीं है। आपके हाथ से काम निकलना हार नहीं है, अगर वह उस हाथ में जा रहा है जिसने उसे शुरू किया था।
संदर्भ
हम मोआब के अराबा में हैं, यरदन के पूर्वी किनारे पर, यरीहो के ठीक सामने। पीढ़ी बदल चुकी है; मिस्र से निकलने वाले लगभग सब मर चुके हैं। यह इलाका इस्राएल का नहीं, मोआब का था, यानी मूसा पराई ज़मीन पर मरता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने अपनी जवानी मिस्र में और अपना मध्यकाल मिद्यान में बिताई। प्राचीन पूर्व में किसी महान अगुवे की कब्र स्मारक बनती थी, तीर्थ बनती थी, सत्ता का दावा बनती थी। यहाँ उलटा होता है: "आज के दिन तक कोई नहीं जानता कि उसकी कब्र कहाँ है।" कोई मंदिर नहीं, कोई अवशेष नहीं, कोई पूजा नहीं। परमेश्वर अपने सेवक को याद रखते हैं और उसकी हड्डियों को छिपा देते हैं।
अन्तर्पाठ
नए नियम में यूहन्ना एक वाक्य में यही तनाव पकड़ता है: व्यवस्था मूसा के द्वारा दी गई, पर अनुग्रह और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची। यह मूसा का अपमान नहीं, उसकी सीमा का ईमानदार बयान है, वही सीमा जो नबो पहाड़ पर दिखती है। और इब्रानियों का लेखक यरदन पार जाने को "विश्राम" कहता है और साफ़ करता है कि यहोशू ने जो विश्राम दिया वह अंतिम नहीं था, क्योंकि परमेश्वर के लोगों के लिए एक और विश्राम बाकी है। यानी कनान भी अपने आप में मंज़िल नहीं थी। मूसा जिस देश को नहीं पा सका, वह देश भी एक बड़ी चीज़ का नक्शा भर था, और वह बड़ी चीज़ मसीह में खुलती है।
एक बारीकी
सातवें पद पर रुकिए: "न तो उसकी आँखें धुँधली पड़ीं, और न उसका पौरूष घटा था।" मूसा बुढ़ापे से नहीं मरा। शरीर थका नहीं था, नज़र कमज़ोर नहीं थी। वह मरा क्योंकि परमेश्वर ने कहा, और पाठ इसे लगभग कोमलता से लिखता है: "यहोवा के कहने के अनुसार उसका दास मूसा वहीं… मर गया।" पुरानी यहूदी परंपरा इसे "परमेश्वर के मुख के चुंबन से मरना" कहती थी। जो भी हो, बात यह है कि यह मृत्यु दंड की कठोरता और प्रेम की निकटता दोनों एक साथ है। और वही आँखें, जो धुँधली नहीं पड़ीं, उस देश को देखने के लिए खुली रखी गईं जिसमें वह जाएगा नहीं। परमेश्वर ने उससे वादा छिपाया नहीं, केवल उसका समय अपने पास रखा।
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आपके जीवन में कौन सा काम है जिसका फल शायद आप नहीं देखेंगे, और क्या आप उसे किसी और के हाथ में सौंपने को तैयार हैं?
मूसा को देश दिखाया गया पर दिया नहीं गया। मसीह में आपको जो विश्राम मिला है, उसे आप केवल दूर से देख रहे हैं या उसमें रहकर जी रहे हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मूसा अपनी मृत्यु के समय एक सौ बीस वर्ष का था; परन्तु न तो उसकी आँखें धुँधली हुई थीं और न उसका बल घटा था।" सोचिए, वह थककर नहीं मरा। आँखें अब भी साफ थीं, ताकत अब भी बाकी थी। उसकी सेवा इसलिए खत्म नहीं हुई कि वह चुक गया था, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर का समय पूरा हुआ। आपका काम भी आपकी ताकत से नहीं, उसके बुलावे से नापा जाता है।
व्यवस्थाविवरण की आख़िरी पंक्तियाँ मूसा के "बड़े और भयानक कामों" को याद करती हैं, और उसी अध्याय में लिखा है कि उसकी कब्र कोई नहीं जानता। जिस आदमी ने वादे का देश दूर से देखा पर उसमें पैर न रखा, उसकी कहानी अधूरी नहीं कहलाई। तेरा जीवन भी अधूरा लगे तो ठहर जा। परमेश्वर काम अधूरा नहीं छोड़ता, वह आगे बढ़ाने के लिए किसी और को खड़ा करता है।
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