यशायाह 65:9
पाठ
सर्वनाश की धमकी के ठीक बीच में परमेश्वर एक बीज बचा लेते हैं। अंगूर के उस गुच्छे की तरह जिसमें अभी रस बाकी है और इसीलिए लोग कहते हैं, "उसे नाश मत कर," वैसे ही परमेश्वर कहते हैं कि याकूब के वंश में से वे एक संतान उत्पन्न करेंगे और यहूदा में से अपने पर्वतों का एक वारिस खड़ा करेंगे। वह वारिस कोई अनाम भीड़ नहीं है: "मेरे चुने हुए उसके वारिस होंगे, और मेरे दास वहाँ निवास करेंगे।" यानी जो जाति अपनी हठ के कारण न्याय के नीचे आ चुकी थी, उसी के भीतर से परमेश्वर अपने लिए एक शेष निकालते हैं, जिसे वे भूमि सौंपते हैं और जिसे वे बसने की जगह देते हैं। वचन 9 इस पूरे अध्याय का मोड़ है, जहाँ क्रोध की भाषा अचानक उत्तराधिकार की भाषा बन जाती है।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर के चरित्र की दो धाराएँ एक ही वाक्य में बहती हैं, और वे आपस में टकराती नहीं। एक ओर वे न्यायी हैं जो पीढ़ियों के अधर्म का बदला गोद में भर देते हैं; दूसरी ओर वे वही हैं जो सूखी डाल में से नया अंकुर निकालते हैं। ध्यान दीजिए, वारिस "उत्पन्न" किया जाता है, पाया नहीं जाता। यह मानवीय योग्यता की कहानी नहीं, सृजन का कार्य है, वही सृजन जो आगे चलकर "नया आकाश और नई पृथ्वी" तक पहुँचता है। अनुग्रह यहाँ भावुकता नहीं, परमेश्वर की अपनी वाचा के प्रति निष्ठा है: वे अपने वादे को मनुष्य की विफलता से नहीं मरने देते। और वे जिन्हें बचाते हैं, उन्हें "दास" कहते हैं, स्वामी नहीं। उत्तराधिकार मिलता है, पर अधिकार जताने के लिए नहीं, सेवा में बसने के लिए। बचाया जाना और सौंपा जाना यहाँ एक ही क्रिया के दो पहलू हैं।
सूत्र
"याकूब में से एक वंश" और "यहूदा में से अपने पर्वतों का एक वारिस" पढ़ते ही इस्राएल के कान खड़े हो जाते थे, क्योंकि यहूदा वह गोत्र है जिससे राजा आता है। यशायाह पहले भी ठूँठ में से निकलने वाली डाल की बात कर चुका है, और यहाँ वही धारा बहती है: परमेश्वर पूरे लोगों को नहीं, बल्कि एक शेष को बचाते हैं, और उस शेष के भीतर से अंततः एक व्यक्ति खड़ा होता है जिसमें सब वादे इकट्ठे हो जाते हैं। मसीह वही सच्चा वारिस है, और जो उससे जुड़ते हैं वे उसकी विरासत में सहभागी बनते हैं। दिलचस्प यह है कि इसी अध्याय के पहले दो वचन नए नियम में उन जातियों पर लागू किए गए हैं जो परमेश्वर को खोजती भी नहीं थीं (रोम. 10:20,21)। यानी वंश सिकुड़कर एक तक आता है, और फिर एक से फैलकर सारी दुनिया तक जाता है। यह अनुग्रह का आकार है: पहले छँटाई, फिर उदारता।
दर्पण
यह वचन उस डर को छूता है जिसे हम आसानी से नहीं बोलते: कि मेरे बाद कुछ नहीं बचेगा। बच्चे विश्वास से दूर जा रहे हैं, कलीसिया खाली हो रही है, जिस काम में बीस साल लगाए वह किसी और के हाथ में चला जाएगा। यशायाह 65 उन लोगों से बात कर रहा है जिनका इतिहास बर्बाद हो चुका था, और वहाँ परमेश्वर कहते हैं कि वे उत्पन्न करेंगे। साथ ही यह वचन हमारे स्वामित्व के भ्रम को भी काटता है। वचन 5 में वे लोग हैं जो कहते हैं, "हट जा, मेरे निकट मत आ, क्योंकि मैं तुझ से पवित्र हूँ" और वे ही न्याय के नीचे आते हैं; बचने वाले "दास" कहलाते हैं। आज ही एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसे आप सबसे ज़्यादा "मेरी" कहते हैं, घर, पद, कलीसिया की कोई ज़िम्मेदारी, और उसे हाथ में पकड़कर ज़ोर से कहिए: "यह मेरी कमाई नहीं, सौंपी हुई विरासत है; मैं आपका दास हूँ।"
अंतर्पाठ
वचन 9 अकेला नहीं खड़ा; उसके ठीक बाद परमेश्वर बताते हैं कि यह विरासत दिखती कैसी है: "उसकी भेड़-बकरियाँ तो शारोन में चरेंगी, और उसके गाय-बैल आकोर नामक तराई में विश्राम करेंगे।" आकोर वही घाटी है जो आकान के पाप के कारण "दुःख की तराई" कहलाई थी; अब वह चरागाह बन जाती है। जिस जगह पर न्याय हुआ था, वहीं विश्राम लौट आता है। और यही धारा अध्याय के अंत तक चलती है, जहाँ यह विरासत पूरी सृष्टि तक फैल जाती है: "मैं नया आकाश और नई पृथ्वी उत्पन्न करता हूँ।" ध्यान दीजिए, वही क्रिया फिर आती है, "उत्पन्न करता हूँ"। एक वंश उत्पन्न करना और एक नई सृष्टि उत्पन्न करना परमेश्वर के लिए एक ही काम के दो पैमाने हैं।
प्रसंग
यशायाह के इस हिस्से की हवा लौटकर आए हुए लोगों की है: मंदिर की जगह खंडहर, यरूशलेम आधा बसा, और आस्था का बाज़ार खुला हुआ। वचन 3 से 5 में जो चित्र है वह कल्पना नहीं था, कब्रों के बीच बैठना, सूअर का माँस, बारियों में बलि, यह सब पड़ोसी धर्मों की जीवित प्रथाएँ थीं, और इनमें शामिल लोग खुद को आम जनता से ज़्यादा पवित्र मानते थे। समुदाय दो हिस्सों में बँट चुका था: वे जो परमेश्वर को छोड़कर "भाग्य देवता" की मेज सजाते थे, और वे जो चुपचाप इंतज़ार करते थे। वचन 9 इसी टूटे हुए समाज के बीच बोला गया है। यह राष्ट्रीय बहाली का सरकारी ऐलान नहीं, बल्कि उस अल्पसंख्यक से किया गया वादा है जिसकी गिनती किसी रजिस्टर में नहीं थी।
प्रश्न
तो चुनाव का यह भेद क्या है? वचन 9 में "मेरे चुने हुए" विरासत पाते हैं, और तीन वचन बाद वही परमेश्वर कहते हैं, "मैं तुम्हें गिन-गिनकर तलवार का कौर बनाऊँगा।" एक ही जाति, एक ही खून, दो अंत। इसे मीठा बनाना बेईमानी होगी। पर पाठ खुद एक संकेत देता है: अध्याय की शुरुआत में परमेश्वर "दिन भर हाथ फैलाए" खड़े हैं, और वचन 12 में कारण साफ है, "जब मैंने तुम्हें बुलाया तुम ने उत्तर न दिया।" चुनाव यहाँ ठंडा गणित नहीं है; वह एक ऐसे परमेश्वर का काम है जो पहले पुकारते हैं और फिर भी ठुकराए जाते हैं। क्यों कुछ उत्तर देते हैं और कुछ नहीं, यह पाठ नहीं खोलता। हमें यह भेद उठाना पड़ता है, बिना यह भूले कि जिस हाथ ने गुच्छे को बचाया, वह पहले पूरे दिन फैला हुआ था।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी "आकोर की तराई" है जहाँ आप अब तक केवल नुकसान देखते आए हैं, और यदि परमेश्वर उसी जगह को विश्राम की जगह बनाएँ तो वह कैसा दिखेगा?
आप जिस चीज़ को अपनी उपलब्धि मानते हैं, उसे "सौंपी हुई विरासत" कहकर जीने में आपके व्यवहार में ठोस रूप से क्या बदलेगा?
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