यूहन्ना 17:17
पाठ
प्रार्थना के बीच में यीशु मसीह पिता से एक बहुत ठोस माँग करते हैं: इन लोगों को सत्य के द्वारा पवित्र कर, अलग कर, अपने काम के लिए तैयार कर। और फिर वे तुरंत बता देते हैं कि यह सत्य कोई अस्पष्ट, हवा में तैरता विचार नहीं है: "तेरा वचन सत्य है।" जो शिष्य अभी-अभी संसार की नफ़रत के बीच पीछे छूट जाने वाले हैं (पद 14 और 15), उनके लिए यीशु न कोई सुरक्षित निकास माँगते हैं, न कोई आसान रास्ता, बल्कि यह कि परमेश्वर का वचन उन्हें भीतर से बदल दे।
मूल
यहाँ पवित्रता की परिभाषा बदल जाती है। हम अक्सर सोचते हैं कि पवित्र होना मतलब अपनी कोशिश से साफ़-सुथरा बन जाना, ग़लतियों की सूची छोटी कर लेना। परंतु यीशु यह काम पिता से माँगते हैं, आदेश के रूप में शिष्यों को नहीं देते। जो यूनानी शब्द यहाँ है, हागियाज़ो, उसका अर्थ है "अलग करके किसी उद्देश्य के लिए समर्पित करना", जैसे मंदिर का पात्र सामान्य उपयोग से हटाकर परमेश्वर की सेवा के लिए रखा जाता था। और यह अलग करना किसी रहस्यमय अनुभव से नहीं, बल्कि वचन के द्वारा होता है। परमेश्वर जो कहते हैं, वही हमें गढ़ता है। इसका मतलब है: आपकी पवित्रता आपके संकल्प की मज़बूती पर नहीं, बल्कि उस सत्य के सामने खुले रहने पर टिकी है जो आपको आपकी पसंद के विरुद्ध भी सुधारता है।
सूत्र
पुराने नियम में जो पात्र, वस्त्र और याजक परमेश्वर की सेवा के लिए अलग किए जाते थे, उन पर तेल छिड़का जाता था और लहू लगाया जाता था; वे तब से सामान्य उपयोग के लिए नहीं रहते थे। यीशु उसी शब्दावली को उठाते हैं, पर एक नए केंद्र के साथ: पद 19 में वे कहते हैं, "और उनके लिये मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ।" याजक और बलि दोनों वही हैं। इसका अर्थ है कि हमारा अलग किया जाना किसी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि उस क्रूस से निकलता है जिसकी ओर यह प्रार्थना बढ़ रही है। सृष्टि से पहले जो वचन पिता के साथ था, वही देहधारी होकर हमें वचन से गढ़ता है। मुक्ति की पूरी कहानी यहाँ एक वाक्य में सिमट आती है: परमेश्वर बोलते हैं, और बोलकर लोगों को अपने लिए अलग कर लेते हैं।
दर्पण
यह पद आपकी उस गुप्त आशा पर चोट करता है कि आत्मिक परिवर्तन किसी अनुभव से, किसी सम्मेलन से, किसी भावनात्मक रात से आ जाएगा। यीशु कहते हैं: सत्य के द्वारा। यानी उन शब्दों के द्वारा जिन्हें आप पढ़ते हुए ऊब जाते हैं, जिन पर आप बहस करना पसंद करते हैं पर आधीन होना नहीं। और यह भी खुल जाता है कि हम वचन को अक्सर आईने की तरह नहीं, बल्कि सजावट की तरह इस्तेमाल करते हैं: वे पद जो हमारी राय की पुष्टि करते हैं, वे हमें प्रिय हैं; वे जो हमारे पैसे के इस्तेमाल पर, हमारी ज़ुबान पर, हमारे विवाह में हमारी ज़िद पर उँगली रखते हैं, वे "व्याख्या के विषय" बन जाते हैं। ईमानदारी से पूछिए: पिछली बार कब किसी वचन ने आपको हरा दिया था?
आज यह कीजिए: बाइबल का वह हिस्सा खोलिए जिससे आप महीनों से बचते आ रहे हैं, उसे धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ में पढ़िए, और अंत में स्वर निकालकर कहिए, "तेरा वचन सत्य है, मेरी राय नहीं।"
संदर्भ
यह प्रार्थना यरूशलेम में, फसह के भोजन के बाद की रात हो रही है, बहुत संभवतः उस कमरे से निकलकर किद्रोन घाटी की ओर जाते हुए। कुछ ही घंटों में सैनिक मशालें लेकर आएँगे। यीशु मरने जा रहे हैं और उनके पीछे ग्यारह डरे हुए, अशिक्षित, आपसी होड़ में उलझे आदमी छूट रहे हैं, जिनके पास न कोई संस्था है, न सुरक्षा, न सामाजिक शक्ति। मंदिर के अधिकारी उनके विरुद्ध हैं, रोमी शासन उदासीन है। ऐसे क्षण में एक शिक्षक स्वाभाविक रूप से रणनीति देता, चेतावनी देता, उत्तराधिकारी नियुक्त करता। यीशु पिता से बात करते हैं, और शिष्यों को सुनने देते हैं। यह प्रार्थना उनके कानों के लिए भी है: तुम्हें छोड़ा नहीं जा रहा, तुम्हें सौंपा जा रहा है।
बारीकी
ध्यान दीजिए, यीशु यह नहीं कहते कि "तेरा वचन सत्य बोलता है" या "सत्य के विषय में है"। वे कहते हैं: "तेरा वचन सत्य है।" वचन सत्य को दर्शाता भर नहीं, वह सत्य के रूप में मौजूद है। यह अंतर छोटा नहीं। हमारे लिए सत्य आमतौर पर जानकारी है, जिसे जाँचा-परखा जाता है और फिर मान लिया या छोड़ दिया जाता है। यहूदी सोच में सत्य, एमेत, भरोसेमंद होना है, वह चट्टान जिस पर पैर रखा जा सकता है। इसलिए यह पद जानकारी बढ़ाने का वादा नहीं करता, वह ज़मीन देने का वादा करता है। और यही कारण है कि वचन पवित्र कर सकता है: जो केवल सूचना देता है वह आपको बदल नहीं सकता, पर जो आपको थाम सकता है, वह आपको ढाल भी सकता है।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र माँगने वाला नहीं, वह है जिससे माँगा जा रहा है। पिता को यहाँ ऐसे संबोधित किया जाता है जो अपने लोगों को स्वयं अलग करते हैं; यीशु उन्हें काम सौंपते हैं, क्योंकि यह काम किसी मनुष्य के बस में नहीं। और यीशु का स्वयं का चित्र भी चौंकाने वाला है: मृत्यु की देहरी पर खड़ा एक व्यक्ति अपनी पीड़ा के लिए नहीं, दूसरों की पवित्रता के लिए विनती कर रहा है। पद 13 में वे अपने आनन्द की बात करते हैं, पद 15 में दुष्ट से रक्षा की, पद 17 में पवित्रता की। यह कोई घबराया हुआ स्वर नहीं; यह उस पुत्र का स्वर है जो जानता है कि वह किसके हाथ में सौंप रहा है। प्रेम यहाँ भावना नहीं, सुपुर्दगी है।
अंतर्पाठ
इस पद के पीछे व्यवस्थाविवरण की वह पुकार गूँजती है जहाँ इस्राएल से कहा जाता है कि परमेश्वर के वचन उनके हृदय पर हों, घर में, रास्ते में, उठते-बैठते दोहराए जाएँ; वहाँ भी वचन ही एक जाति को बाकी जातियों से अलग करता था। यीशु उसी परंपरा में खड़े हैं, पर अब वह वचन एक व्यक्ति में सिमट आया है। और इफिसियों में पौलुस मसीह के विषय में कहता है कि वे कलीसिया को वचन के जल से धोकर शुद्ध करते हैं; वही चित्र, वही क्रिया, वही साधन। दोनों जगह ध्यान दीजिए कि पवित्रता समुदाय के लिए है, अकेले साधक के लिए नहीं। यीशु "उन्हें" कहते हैं, बहुवचन में। कोई अपने कमरे में अकेले पवित्र नहीं किया जाता।
श्रोता
यूहन्ना का सुसमाचार जिन कलीसियाओं ने पहले पढ़ा, वे आराधनालय से निकाले जा चुके विश्वासी थे, जिन्हें अपने ही परिवार में गद्दार समझा जाता था। उनके पास मंदिर नहीं था, याजक नहीं था, बलिदान नहीं था, यानी पवित्रता का हर वह ढाँचा नहीं था जिसे वे बचपन से जानते थे। उनके कानों में "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर" एक क्रांतिकारी आश्वासन था: तुम्हें अलग करने वाली चीज़ छिन नहीं गई, वह तुम्हारे बीच पढ़े जाने वाले इन शब्दों में है। जहाँ यह सुसमाचार पढ़ा जाता है, वहाँ पवित्र स्थान बन जाता है। हमारे लिए जिनके पास बाइबल की चार प्रतियाँ और अनगिनत ऐप हैं, यह बात सस्ती लगती है। उनके लिए यह जीवन-रेखा थी।
प्रश्न
तो क्यों वे लोग जो सबसे ज़्यादा बाइबल पढ़ते हैं, कभी-कभी सबसे कठोर निकलते हैं? यदि वचन पवित्र करता है, तो शास्त्र-ज्ञान और चरित्र के बीच यह खाई क्यों? पद टालता नहीं, वह संकेत देता है: यह प्रार्थना पिता से की गई है। वचन अपने आप में कोई यंत्र नहीं जिसे चलाकर परिणाम निकाल लिया जाए; वह उस हाथ में औज़ार है जो हमारे भीतर काम करता है। हम पढ़ते हुए भी बच सकते हैं, यदि हम वचन के न्यायाधीश बने रहें और उसके अधीन कभी न आएँ। इसका कोई साफ़ हल नहीं है जिसे मैं आपको दे सकूँ। जो रह जाता है वह यह है: पढ़िए, और साथ ही माँगिए कि वह पढ़ना आपको काटे, क्योंकि आप स्वयं को पवित्र नहीं कर सकते।
मनन
पिछले महीने में कौन-सा बाइबल का हिस्सा आपने जानबूझकर छोड़ दिया, और क्यों?
यदि पवित्रता परमेश्वर का काम है, तो आपकी भूमिका किस रूप में बची रहती है, और आप उसे कैसे निभा रहे हैं?
आपके समुदाय में वचन ऐसे पढ़ा जाता है कि लोग बदल जाएँ, या ऐसे कि लोग अपनी राय की पुष्टि पा जाएँ?
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John 17:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 17:17 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 17:17 किस विषय में है?
यूहन्ना 17:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 17:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 17:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है।" यीशु यह क्रूस से पहले कहते हैं, जब सब कुछ बाकी दिखता था। पर उनका मन पहले ही मान गया था। और ध्यान दे, उन्होंने हर काम नहीं किया, बस वही जो पिता ने सौंपा था। तेरी थकान कहीं उन कामों से नहीं, जो तुझे दिए ही नहीं गए थे?
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