बाइबल व्याख्या

यूहन्ना 5:1

बाइबल
यह वचन SATYA KRUPA CHARITABLE MINISTRIES द्वारा समर्पित है

पाठ

इन बातों के बाद, यानी गलील में राजकर्मचारी के बेटे के चंगे होने के बाद, कहानी अचानक रुकती है और जगह बदल जाती है: "यहूदियों का एक पर्व हुआ, और यीशु यरूशलेम को गया।" कौन-सा पर्व था, यूहन्ना नहीं बताते। कोई कारण, कोई निमंत्रण, कोई चेतावनी नहीं। बस एक तिथि आती है, और उस तिथि के साथ यीशु उस नगर की ओर चल पड़ते हैं जहाँ परमेश्वर के नाम का भवन खड़ा है। एक वाक्य, और उसी एक वाक्य में पूरा अध्याय तन जाता है: बैतहसदा का कुण्ड, अड़तीस साल का रोगी, सब्त का विवाद, और अंत में वह दावा जिसके कारण लोग उन्हें मार डालना चाहेंगे। सब कुछ इसी छोटी-सी यात्रा से शुरू होता है।

मर्म

ध्यान दीजिए कि यूहन्ना किसका पर्व कहते हैं: "यहूदियों का एक पर्व।" मूसा की व्यवस्था में ये पर्व परमेश्वर के अपने ठहराए हुए नियत समय थे, उनके अपने उत्सव। पर यूहन्ना के लिखते-लिखते वे किसी और की सम्पत्ति बन चुके हैं, एक धार्मिक कैलेंडर जिसका असली मालिक अब बाहर खड़ा है। और तब वह आते हैं। यूनानी क्रिया यहाँ अनेबे है, "ऊपर चढ़ गया", वही शब्द जो तीर्थयात्रियों के लिए इस्तेमाल होता था जो गाते हुए सिय्योन की चढ़ाई चढ़ते थे। यीशु भीड़ में से एक बनकर चढ़ते हैं, जबकि वास्तव में वही हैं जिसकी ओर हर पर्व उँगली उठाता रहा है। परमेश्वर अपने ही घर में मेहमान की तरह लौटते हैं। यही इस वचन का मर्म है: उद्धार हमारी खोज से नहीं, उनके आने से शुरू होता है। वे नियत समय चूकते नहीं; वे उसमें प्रवेश करते हैं।

सूत्र

यूहन्ना अपनी पूरी पुस्तक को पर्वों के खूँटों पर टाँगते हैं: फसह, झोपड़ियों का पर्व, समर्पण का पर्व। हर बार यीशु उस पर्व के बीचोंबीच खड़े होकर कुछ ऐसा करते या कहते हैं जिससे साफ हो जाता है कि वह पर्व किसकी ओर इशारा कर रहा था। लैव्यव्यवस्था 23 में परमेश्वर इन दिनों को "अपने नियत समय" कहते हैं; वे खाली तारीखें नहीं, वादे हैं जिन्हें साल-दर-साल दोहराया जाता रहा जब तक पूरा करनेवाला न आ जाए। इसीलिए इसी अध्याय के अंत में यीशु कह सकते हैं कि पवित्रशास्त्र "यह वही है, जो मेरी गवाही देता है," और मूसा के बारे में, "उसने मेरे विषय में लिखा है।" पर्व छाया थे, यीशु शरीर हैं। जब वह यरूशलेम की चढ़ाई चढ़ते हैं, तो कैलेंडर अपने केंद्र से मिलता है।

दर्पण

हमारे पास भी नियत समय हैं। रविवार की आराधना, सुबह का पाठ, लेंट, क्रिसमस की सेवाएँ, वह छोटा समूह जो हर बुधवार को मिलता है। और हममें से बहुतों के लिए ये सच्चे पर यथावत् ढाँचे बन चुके हैं: हम आते हैं, गाते हैं, लौट जाते हैं, और कुछ नहीं बदलता। यह वचन उस ढाँचे को तोड़ता नहीं, उसमें प्रवेश करता है। पर्व वही रहा, भीड़ वही रही, पर उस भीड़ में एक व्यक्ति चल रहा था जिसे किसी ने पहचाना नहीं, और अध्याय खत्म होते-होते अड़तीस साल का एक आदमी अपनी खाट उठाकर चल रहा था। आपका अगला रविवार भी ऐसा ही हो सकता है। आज ही अपने कैलेंडर में इस सप्ताह का वह एक नियत धार्मिक समय खोजिए और उसके बगल में लिख दीजिए: "वह आ रहे हैं," फिर एक वाक्य ऊँचे स्वर में कहिए: "प्रभु, इस बार आप आइए।"

मुख्य पात्र

इस वाक्य में यीशु कुछ कहते नहीं, सिर्फ चलते हैं, और यही उनके बारे में सबसे अधिक बताता है। कोई उन्हें बुलाता नहीं; कोई बीमार उन्हें ढूँढ़ने गलील तक नहीं गया था। वे अपनी ओर से उठते हैं और उस नगर की ओर जाते हैं जहाँ इसी अध्याय के अंत तक लोग उन्हें मार डालने का प्रयत्न करने लगेंगे। यह लापरवाही नहीं, आज्ञाकारिता है। बाद में वही आदमी कहेगा, "मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजनेवाले की इच्छा चाहता हूँ।" यरूशलेम की हर यात्रा उस अंतिम यात्रा का पूर्वाभ्यास है, जब वह फिर एक पर्व पर चढ़ेंगे और लौटेंगे नहीं। उनका भीतरी भूगोल शांत और दृढ़ है: वे जानते हैं कि क्या इंतजार कर रहा है, और फिर भी कदम उठाते हैं।

अंतर्पाठ

मलाकी अपनी भविष्यवाणी के अंत में कहते हैं कि प्रभु जिसे लोग ढूँढ़ते हैं, अचानक अपने मंदिर में आएँगे, और आगे पूछते हैं कि उनके आने का दिन कौन सह सकेगा। यूहन्ना 5:1 उस वाक्य का बिल्कुल सादा, बिना तुरही के पूरा होना है: कोई घोषणा नहीं, कोई चमक नहीं, बस एक तीर्थयात्री भीड़ में। और जो सवाल मलाकी ने पूछा था, वही इस अध्याय के अंत में खुलकर सामने आता है, क्योंकि उनके आने को बहुत लोग सह नहीं पाते। दूसरी ओर लूका 2 में बारह साल का लड़का भी पर्व पर यरूशलेम गया था और मंदिर में अपने पिता के घर की बात करता है। वही घर, वही दावा, बस अब वक्त आ गया है कि वह दावा खुलकर कहा जाए।

श्रोता

यूहन्ना जिनके लिए लिख रहे थे, उनमें से बहुत यहूदी विश्वासी थे जिन्हें आराधनालय से निकाल दिया गया था, और जिनकी पीढ़ी देख चुकी थी कि मंदिर जलकर राख हो गया। उनके लिए "यहूदियों का एक पर्व" वाक्य में एक टीस थी: वे पर्व अब उनके नहीं रहे, न उस रूप में मनाए जा सकते थे। और ठीक इसी बिंदु पर यूहन्ना उन्हें दिखाते हैं कि उन पर्वों का केंद्र कभी पत्थर की इमारत नहीं था। जिस व्यक्ति की ओर हर नियत समय इशारा करता था, वह आ चुका है और अब उनके बीच रहता है। जो खो गया, वह छाया थी; जो मिला, वह जीवित है। यह सांत्वना नहीं, स्थानांतरण है।

मनन

आपके जीवन के कौन-से "नियत समय" अब केवल आदत बनकर रह गए हैं, और आप उनमें यीशु के आने की अपेक्षा फिर से कैसे करेंगे?

यीशु बिना बुलाए यरूशलेम गए। आपके जीवन में कौन-सी जगह है जहाँ आप चाहते हैं कि वे न आएँ, और क्यों?

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John 5:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यूहन्ना 5:1 का क्या अर्थ है?
इन बातों के बाद, यानी गलील में राजकर्मचारी के बेटे के चंगे होने के बाद, कहानी अचानक रुकती है और जगह बदल जाती है: "यहूदियों का एक पर्व हुआ, और यीशु यरूशलेम को गया।" कौन-सा पर्व था, यूहन्ना नहीं बताते। कोई कारण, कोई निमंत्रण, कोई चेतावनी नहीं। बस एक तिथि आती है, और उस तिथि के साथ यीशु उस नगर की ओर चल पड़ते हैं जहाँ परमेश्वर के नाम का भवन खड़ा है। एक वाक्य, और उसी एक वाक्य में पूरा अध्याय तन जाता है: बैतहसदा का कुण्ड, अड़तीस साल का रोगी, सब्त का विवाद, और अंत में वह दावा जिसके कारण लोग उन्हें मार डालना चाहेंगे। सब कुछ इसी छोटी-सी यात्रा से शुरू होता है।
यूहन्ना 5:1 किस विषय में है?
यूहन्ना अपनी पूरी पुस्तक को पर्वों के खूँटों पर टाँगते हैं: फसह, झोपड़ियों का पर्व, समर्पण का पर्व। हर बार यीशु उस पर्व के बीचोंबीच खड़े होकर कुछ ऐसा करते या कहते हैं जिससे साफ हो जाता है कि वह पर्व किसकी ओर इशारा कर रहा था। लैव्यव्यवस्था 23 में परमेश्वर इन दिनों को "अपने नियत समय" कहते हैं; वे खाली तारीखें नहीं, वादे हैं जिन्हें साल-दर-साल दोहराया जाता रहा जब तक पूरा करनेवाला न आ जाए। इसीलिए इसी अध्याय के अंत में यीशु कह सकते हैं कि पवित्रशास्त्र "यह वही है, जो मेरी गवाही देता है," और मूसा के बारे में, "उसने मेरे विषय में लिखा है।" पर्व छाया थे, यीशु शरीर हैं। जब वह यरूशलेम की चढ़ाई चढ़ते हैं, तो कैलेंडर अपने केंद्र से मिलता है।
यूहन्ना 5:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस वाक्य में यीशु कुछ कहते नहीं, सिर्फ चलते हैं, और यही उनके बारे में सबसे अधिक बताता है। कोई उन्हें बुलाता नहीं; कोई बीमार उन्हें ढूँढ़ने गलील तक नहीं गया था। वे अपनी ओर से उठते हैं और उस नगर की ओर जाते हैं जहाँ इसी अध्याय के अंत तक लोग उन्हें मार डालने का प्रयत्न करने लगेंगे। यह लापरवाही नहीं, आज्ञाकारिता है। बाद में वही आदमी कहेगा, "मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजनेवाले की इच्छा चाहता हूँ।" यरूशलेम की हर यात्रा उस अंतिम यात्रा का पूर्वाभ्यास है, जब वह फिर एक पर्व पर चढ़ेंगे और लौटेंगे नहीं। उनका भीतरी भूगोल शांत और दृढ़ है: वे जानते हैं कि क्या इंतजार कर रहा है, और फिर भी कदम उठाते हैं।
यूहन्ना 5:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना जिनके लिए लिख रहे थे, उनमें से बहुत यहूदी विश्वासी थे जिन्हें आराधनालय से निकाल दिया गया था, और जिनकी पीढ़ी देख चुकी थी कि मंदिर जलकर राख हो गया। उनके लिए "यहूदियों का एक पर्व" वाक्य में एक टीस थी: वे पर्व अब उनके नहीं रहे, न उस रूप में मनाए जा सकते थे। और ठीक इसी बिंदु पर यूहन्ना उन्हें दिखाते हैं कि उन पर्वों का केंद्र कभी पत्थर की इमारत नहीं था। जिस व्यक्ति की ओर हर नियत समय इशारा करता था, वह आ चुका है और अब उनके बीच रहता है। जो खो गया, वह छाया थी; जो मिला, वह जीवित है। यह सांत्वना नहीं, स्थानांतरण है।
यूहन्ना 5:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यीशु बिना बुलाए यरूशलेम गए। आपके जीवन में कौन-सी जगह है जहाँ आप चाहते हैं कि वे न आएँ, और क्यों?
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John 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 12

पिता, कई बार मैं भी सवालों में उलझ जाता हूं और उस चेहरे को नहीं देख पाता जिसने मुझे चंगा किया। मेरी आंखें खोल, ताकि नियमों की बहस से ज्यादा तुझे जानने की भूख मुझमें जगे। जो तूने मेरे जीवन में किया है, उसके लिए धन्यवाद, और अब मुझे अपने पास खींच ले।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 43

यीशु कहते हैं, "मैं अपने पिता के नाम से आया हूँ, और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते; यदि कोई और अपने ही नाम से आए, तो उसे ग्रहण कर लोगे।" सोचो, जो अपनी बड़ाई लेकर आता है उसे हम जल्दी अपना लेते हैं, पर जो पिता की महिमा लेकर आया उसे ठुकरा दिया। आज भी दिल उसी आवाज़ की ओर झुकता है जो हमें बड़ा महसूस कराए। तुम्हारा दिल किसे जगह दे रहा है?

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