यहोशू 9
पाठ
गिबोन के निवासी यह सुनकर डर गए कि यहोशू ने यरीहो और आई का क्या हाल किया। युद्ध के बजाय उन्होंने चालाकी चुनी। फटे कपड़े, फफूंदी लगी रोटी, पुरानी जूतियाँ, और एक झूठी कहानी लेकर वे गिलगाल की छावनी में आए, बोले "हम दूर देश से आए हैं," और इस्राएल से जीवन की वाचा माँग ली। इस्राएली नेता यहोवा से पूछे बिना उनके बहकावे में आ गए, शपथ खा बैठे, और तीन दिन बाद सच्चाई सामने आई। शपथ तोड़ी नहीं जा सकती थी, इसलिए गिबोनवासी जीवित बचे, पर हमेशा के लिए लकड़हारे और पानी भरनेवाले बना दिए गए।
मूल बात
गिलगाल की छावनी की धूल में उस दिन कुछ बहुत ही गंभीर हुआ, जो तलवारों की गड़गड़ाहट से भी भारी था। इस्राएल के प्रधानों ने "यहोवा से बिना सलाह लिये" एक निर्णय ले लिया, यह वाक्य पद 14 में चुपचाप बैठा है पर पूरे अध्याय का ताला यही खोलता है। यह पाठ केवल कनानी छल की कहानी नहीं है, यह इस्राएल की उस आत्मनिर्भरता की कहानी है जो जीत के बाद आती है। यरीहो की दीवारें गिरने के बाद, आई पर विजय के बाद, ऐसा लगता है कि अब हर स्थिति का अंदाजा हम खुद लगा सकते हैं। परमेश्वर बड़े संकटों में याद आते हैं, पर छोटे निर्णयों में भूल जाते हैं। और यहीं पर हार होती है।
साझा सूत्र
गिबोनवासी उस बड़ी कहानी की ओर इशारा करते हैं जो पूरे बाइबल में गूँजती है, कि परमेश्वर के लोगों की सीमा के बाहर से लोग आकर उनकी दया में शरण लेते हैं। ये कनानी थे, जिन्हें नाश होना था, पर अपने प्राणों के डर से वे इस्राएल के परमेश्वर के नाम की शरण में आए। पद 9 में उनकी गवाही सुनिए, "तेरे परमेश्वर यहोवा का नाम सुनकर आए हैं।" यह राहाब जैसी ही स्वीकारोक्ति है। मंदिर में लकड़ी काटने और पानी भरने की उनकी सेवा एक भविष्यवाणी बन जाती है, कि एक दिन अन्यजातियाँ भी परमेश्वर के भवन में सेवा करेंगी। यीशु मसीह की सूली पर, बाहर के लोग भीतर लाए जाते हैं, बिना छल के, बिना शर्त, केवल अनुग्रह से।
दर्पण
आप और मैं भी अक्सर गिलगाल के उन प्रधानों जैसे हैं। कोई प्रस्ताव आता है, कोई अवसर, कोई रिश्ता, कोई नौकरी का निर्णय, और सब कुछ इतना ठोस दिखता है, फफूंदी लगी रोटी की तरह "प्रमाण" हमारे सामने रखा होता है, कि हम प्रार्थना को बाद के लिए टाल देते हैं। हम सोचते हैं, "यह तो साफ मामला है, इसमें परमेश्वर से क्या पूछना।" फिर तीन दिन बाद, या तीन साल बाद, सच्चाई सामने आती है, और हमने ऐसी शपथ खा ली होती है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता, ऐसा बंधन जिसमें हम फँस चुके हैं। ध्यान दीजिए, इस्राएलियों की गलती दुष्टता नहीं थी, जल्दबाजी थी। और जल्दबाजी अक्सर उसी जगह होती है जहाँ हम सबसे ज्यादा आत्मविश्वासी होते हैं।
अन्तर्पाठ
व्यवस्थाविवरण 7 में परमेश्वर ने साफ कहा था कि कनानियों से कोई वाचा न बाँधी जाए। पर यहाँ शपथ खा ली गई, और शपथ का सम्मान करना पड़ा। बाद में 2 शमूएल 21 में जब शाऊल ने इसी वाचा को तोड़कर गिबोनवासियों को मार डाला था, तो पूरे इस्राएल पर तीन साल का अकाल पड़ा। परमेश्वर ने उस पुरानी शपथ को याद रखा, चाहे वह छल से ही क्यों न ली गई हो। यह डरावना और सुंदर दोनों है, कि परमेश्वर के लोगों की जीभ से निकली बात परमेश्वर हल्के में नहीं लेते। दूसरी ओर, राहाब की कहानी (यहोशू 2) यहाँ छाया की तरह खड़ी है, वहाँ भी एक कनानी बचा, पर बिना छल के, विश्वास से।
मुख्य पात्र
यहोशू की भूमिका इस अध्याय में विचित्र है। वह पूछता है, "तुम कौन हो? और कहाँ से आए हो?" यह ठीक प्रश्न है, पर उत्तर की जाँच नहीं होती। मूसा का यह उत्तराधिकारी, जो अब तक हर कदम पर परमेश्वर से पूछता आया था, यहाँ चूक जाता है। और यही उसे मानवीय बनाता है। बाइबल अपने नायकों की गलतियाँ छिपाती नहीं। पद 22 में यहोशू का क्रोध सुनिए, "तुम ने हम से यह कहकर क्यों छल किया है," पर यह क्रोध आधा अपनी ही असावधानी पर है। फिर भी, जब भीड़ कुड़कुड़ाती है और गिबोनवासियों को मार डालना चाहती है, तो यहोशू अपनी शपथ पर टिका रहता है। गलती की, पर वचन नहीं तोड़ा। यह भी एक तरह की परिपक्वता है, अपनी भूल का बोझ उठाना और फिर भी सच्चाई से खड़े रहना।
प्रश्न
यहाँ एक कठिन बात है जिसे हम टाल नहीं सकते। परमेश्वर ने कनानियों के नाश की आज्ञा दी थी, पर गिबोनवासी छल से बच गए, और परमेश्वर ने उनके बचाव को स्वीकार किया, यहाँ तक कि सदियों बाद उनकी रक्षा भी की। तो क्या छल काम कर गया? क्या धोखे से बचाई गई जान भी परमेश्वर की दृष्टि में मान्य है? पाठ इसका सीधा उत्तर नहीं देता। शायद यही रहस्य है, कि परमेश्वर की न्यायपूर्ण आज्ञाओं के बीच भी उनकी दया के लिए दरवाजे खुले रहते हैं, उन लोगों के लिए भी जो केवल डर से ही सही, उनके नाम की शरण लेते हैं। गिबोनव
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Joshua 9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यहोशू 9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
गिबोनियों की फटी जूतियाँ और सूखी रोटी देखकर इस्राएलियों को लगा, सबूत तो सामने है। पर लिखा है, "तब उन पुरुषों ने उनके भोजन में से कुछ ले लिया, परन्तु यहोवा से सलाह न ली।" उन्होंने जाँच की, बस पूछा नहीं। आज भी सबसे बड़ा धोखा वहीं होता है जहाँ बात इतनी साफ़ लगती है कि प्रार्थना करना ज़रूरी ही नहीं लगता। तेरा कौन सा फ़ैसला अभी परमेश्वर से बिना पूछे तैयार खड़ा है?
प्रभु, धन्यवाद कि तीसरे ही दिन इस्राएलियों को गिबोनियों के नगरों का पता चल गया। आप सच्चाई को छिपे नहीं रहने देते, समय पर हर छल को उजागर कर देते हैं। हमारे जीवन में भी आप हमें अंधेरे में नहीं छोड़ते, धीरे धीरे हर बात प्रकट करते हैं।
हे प्रभु, कभी-कभी लोग हमारे पास आते हैं और हम नहीं जानते कि उनके इरादे क्या हैं। हमें विवेक दे, ताकि हम बिना तेरी सलाह लिए कोई वादा या फैसला न करें। हर बड़े निर्णय से पहले हमें रुकना और तुझसे पूछना सिखा।
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