भजन संहिता 32
पाठ
एक आदमी चुप था, और वह चुप्पी उसे भीतर से खा रही थी। "जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते-कराहते मेरी हड्डियाँ पिघल गई।" यह भजन उसी टूटी हुई चुप्पी के बाद लिखा गया है: पहले पाप को छिपाने का सूखा, फिर उसे परमेश्वर के सामने खोल देने का क्षण, और उसके बाद क्षमा। भजनकार धन्य कहता है उस मनुष्य को जिसका अपराध क्षमा किया गया और जिसकी आत्मा में कपट नहीं। फिर आवाज़ बदल जाती है और परमेश्वर स्वयं बोलते हैं: मैं तुझे बुद्धि दूँगा, तेरी अगुआई करूँगा। अंत में सब सीधे मनवालों को जयजयकार करने का न्योता, मानो एक आदमी की निजी रिहाई पूरे समुदाय का गीत बन गई हो।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि भजन की शुरुआत क्षमा से होती है, पाप से नहीं। पहले वाक्य में ही मनुष्य धन्य कहा गया है, और उसका आधार उसकी नैतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह कि परमेश्वर "उसके अधर्म का लेखा न ले।" यहाँ एक हिसाब-किताब की भाषा है, एक बहीखाता जिसमें कुछ लिखा नहीं जाता। परमेश्वर भूल नहीं जाते; वे लिखने से इनकार करते हैं। यही अनुग्रह है।
पर भजन यह भी कहता है कि यह अनुग्रह चुप्पी में नहीं मिलता। छिपाना एक श्रम है, और वह श्रम शरीर तक पहुँचता है: हड्डियाँ, तरावट, धूपकाल की झुर्राहट। पाप का बोझ केवल आत्मिक नहीं रहता, वह नींद और भूख और चेहरे तक उतर आता है। मुक्ति का मार्ग विचित्र रूप से सरल है और इसीलिए इतना कठिन: कहना। "मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया।" परमेश्वर उस आवाज़ की प्रतीक्षा करते हैं जो अपने बारे में सच बोलती है।
सूत्र
पौलुस ने इस भजन की पहली दो पंक्तियों को उठाकर रोमियों 4 में रख दिया, ठीक उस जगह जहाँ वह साबित कर रहा है कि परमेश्वर मनुष्य को उसके कामों के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वास के आधार पर धर्मी ठहराते हैं। यानी दाऊद का यह निजी अनुभव बाद में सुसमाचार का गवाह बन गया। और जो शब्द भजनकार चुनता है, वह भी बोलता है: पाप "ढाँपा गया।" इस्राएल में ढाँपना मंदिर की भाषा थी, लहू और प्रायश्चित्त की भाषा। यहाँ वह ढँकना अभी अधूरा है, हर साल दोहराया जाने वाला। मसीह में वही ढँकना उठा लेने में बदल जाता है: कोई परदा नहीं, बल्कि एक व्यक्ति जो बोझ अपने ऊपर ले लेता है। भजन 32 उस दिशा में इशारा करता है जिसे वह स्वयं पूरा नहीं कर सकता।
आईना
आप जानते हैं वह कौन सी बात है। वह पैसा जिसका हिसाब आपने घर में ठीक-ठीक नहीं बताया। वह वाक्य जो आपने अपने बच्चे से गुस्से में कहा और फिर मज़ाक बनाकर टाल दिया। वह आदत जो रात के अँधेरे में चलती है और सुबह आप रविवार को समूह की अगुआई करने चले जाते हैं। छिपाना काम माँगता है, और वह काम आपकी नींद से, आपकी पीठ से, आपके चिड़चिड़ेपन से वसूला जाता है। भजन कहता है, घोड़े और खच्चर मत बनो, जिन्हें लगाम से खींचना पड़ता है। परमेश्वर आपको नियंत्रित नहीं, अगुवाई करना चाहते हैं, पर अगुवाई के लिए सुनना पड़ता है, और सुनने के लिए पहले बोलना पड़ता है।
आज, दरवाज़ा बंद करके, ऊँची आवाज़ में, नाम लेकर वह एक बात परमेश्वर से कहिए जिसे आप महीनों से भीतर दबाए हुए हैं। सफ़ाई मत दीजिए, बस कहिए।
कठिन सवाल
छठा पद एक बड़ा दावा करता है: "जब जल की बड़ी बाढ़ आए तो भी उस भक्त के पास न पहुँचेगी।" पर हम जानते हैं कि क्षमा पाए हुए लोग भी डूबते हैं। विश्वासी माता-पिता कैंसर से मरते हैं, ईमानदार आदमी की नौकरी जाती है, और दसवें पद का "दुष्ट" कभी-कभी बहुत आराम से जीता है। क्या भजनकार भोला था? शायद नहीं। ध्यान दीजिए, वह यह नहीं कहता कि बाढ़ नहीं आएगी। वह कहता है कि वह उस तक नहीं पहुँचेगी, क्योंकि "तू मेरे छिपने का स्थान है।" सुरक्षा किसी परिस्थिति में नहीं, एक व्यक्ति में है। फिर भी यह उत्तर सब कुछ शांत नहीं करता। कुछ लोग सचमुच पानी में चले गए हैं और उनका आख़िरी शब्द भी प्रार्थना था। इस भजन को पढ़ते हुए हमें यह असुविधा साथ रखनी होगी, उसे जल्दी सुलझाए बिना।
पृष्ठभूमि
यह भजन मंदिर की उपासना के लिए लिखा गया, और "सेला" उसका निशान है: वहाँ संगीत ठहरता था, लोग साँस लेते थे। इस्राएल में पाप कभी निजी मामला नहीं था; अपराध समुदाय को अशुद्ध करता था, और उसका समाधान बलिदान से, याजक के सामने, सबकी नज़रों में होता था। मान-अपमान की उस संस्कृति में अपना दोष खुले में स्वीकार करना सामाजिक हैसियत गँवाना था। इसलिए चुप रहना सबसे स्वाभाविक विकल्प था। और यहीं यह भजन चौंकाता है: पूरे गीत में एक भी बलिदान का ज़िक्र नहीं। सिर्फ़ कहना, "मैं यहोवा के सामने अपने अपराधों को मान लूँगा", और तुरंत, बीच वाक्य में, क्षमा। वेदी से पहले शब्द।
एक बारीकी
तीन बार यह भजन "घेरने" की भाषा इस्तेमाल करता है, और यह संयोग नहीं। पहले वह आदमी सूखे से घिरा था, धूपकाल की झुर्राहट, रात-दिन एक हाथ के नीचे दबा हुआ। फिर सातवें पद में परमेश्वर उसे "चारों ओर से छुटकारे के गीतों से" घेर लेते हैं, और दसवें पद में भरोसा रखने वाला "करुणा से घिरा" रहता है। घेराव तो पहले भी था; बदला यह कि अब उसे किसने घेरा है। और गौर कीजिए, वह आदमी जो छिप रहा था, अब कहता है, "तू मेरे छिपने का स्थान है।" छिपने की चाह ग़लत नहीं थी, जगह ग़लत थी। हम अपने भीतर छिपते हैं और सूख जाते हैं; परमेश्वर में छिपते हैं और गीतों से घिर जाते हैं।
चिंतन के प्रश्न
आप किस बात के बारे में इस समय चुप हैं, और वह चुप्पी आपके शरीर, आपकी नींद, आपके रिश्तों से क्या क़ीमत वसूल रही है?
आप परमेश्वर के साथ घोड़े और खच्चर की तरह चल रहे हैं या सुनने वाले की तरह; पिछली बार कब आपने उनकी अगुआई महसूस की, बिना खींचे जाए?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि तू मेरे अधर्म को पाप नहीं गिनता। मेरी गलतियों की सूची तेरे हाथ में नहीं, तेरी क्षमा में मिट चुकी है। धन्यवाद कि तेरे सामने मुझे कुछ छिपाना नहीं पड़ता, तू मेरी आत्मा के कपट को भी साफ करता है और फिर भी मुझे धन्य कहता है।
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