7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

1 राजाओं 8

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

सुलैमान ने मंदिर बनवाया था, और अब वह समय आया कि सन्दूक, जिसमें दस आज्ञाओं की पटियाएँ रखी थीं, उस मंदिर में लाया जाए। यह सन्दूक उस वाचा की निशानी था, वाचा यानी परमेश्वर की वह ठोस प्रतिज्ञा जो उन्होंने मिस्र से निकलने के समय इस्राएल के साथ बाँधी थी। याजकों ने सन्दूक उठाकर परमपवित्र स्थान में रखा, करूबों के पंखों के नीचे। इतने भेड़-बैल बलि किए गए कि उनकी गिनती नहीं हो सकती थी।

फिर कुछ अनोखा हुआ। एक बादल मंदिर में भर गया, इतना घना कि याजक खड़े भी नहीं रह सके। सुलैमान समझ गया, यह परमेश्वर की महिमा थी। उसने कहा कि परमेश्वर ने घोर अंधकार में वास करने की बात कही थी, और अब उन्होंने अपने लिए एक स्थान बनवाया है।

इसके बाद सुलैमान ने लोगों को आशीर्वाद दिया और याद दिलाया कि परमेश्वर ने दाऊद को जो वचन दिया था, वह पूरा हुआ है। फिर वह घुटनों के बल झुका, हाथ आकाश की ओर फैलाए, और एक लंबी प्रार्थना की। उसने कहा कि परमेश्वर स्वर्ग में भी नहीं समाते, तो यह भवन उन्हें कैसे समाएगा? फिर भी उसने विनती की कि परमेश्वर की आँखें और कान इस स्थान की ओर खुले रहें, चाहे कोई इस्राएली पाप करके पछताकर लौट आए, चाहे सूखा पड़े, चाहे कोई परदेशी दूर से आकर प्रार्थना करे। सुलैमान ने साफ कहा, "निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है", और परमेश्वर से क्षमा का रास्ता हमेशा खुला रखने को कहा। अंत में उसने फिर लोगों को आशीर्वाद दिया, और सबने मिलकर चौदह दिन तक बड़ा उत्सव मनाया।

इसका क्या अर्थ है?

यह घटना दिखाती है कि परमेश्वर अपनी प्रजा के बीच रहना चाहते हैं, पर वे किसी इमारत में बंद नहीं हो सकते। सुलैमान खुद कहता है कि आकाश, वरन् सबसे ऊँचा आकाश भी परमेश्वर को समा नहीं सकता। शायद तुम सोचोगे, तो फिर मंदिर किस काम का था? मंदिर कोई पिंजरा नहीं था जिसमें परमेश्वर को बंद किया गया हो। यह वह जगह थी जहाँ परमेश्वर ने वादा किया था कि वे अपने लोगों की प्रार्थना सुनेंगे।

सुलैमान की पूरी प्रार्थना में एक शब्द बार-बार आता है, सुनना। जब कोई पाप करे, जब सूखा पड़े, जब कोई परदेशी दूर से पुकारे, हर बार सुलैमान कहता है, आप सुन लीजिए। परमेश्वर दूर के परमेश्वर नहीं हैं, वे सुनने वाले परमेश्वर हैं।

ध्यान देने की बात यह भी है कि सुलैमान यह दावा नहीं करता कि उसकी प्रजा हमेशा अच्छी बनी रहेगी। वह खुलकर मानता है, "निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है।" यह ईमानदारी है। सुलैमान जानता था कि उसकी प्रजा फिर गलती करेगी, इसलिए वह पहले से ही परमेश्वर से क्षमा का रास्ता माँग लेता है।

समान सूत्र

मंदिर में परमेश्वर की महिमा का बादल भरना कोई नई बात नहीं थी, मूसा के समय मिलापवाले तंबू में भी ऐसा ही हुआ था। परमेश्वर अपने लोगों के बीच रहना चाहते हैं, यह उनकी पुरानी इच्छा है। पर यह मंदिर पत्थर का था, और एक दिन गिर भी गया। बाइबल की बड़ी कहानी में आगे हम पढ़ते हैं कि यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति लेकर आए, ऐसी उपस्थिति जो किसी इमारत में बंद नहीं रहती बल्कि हर जगह अपने लोगों के साथ चल सकती है। सुलैमान ने पूछा था, क्या परमेश्वर सचमुच पृथ्वी पर वास करेंगे? यीशु मसीह में परमेश्वर ने इसका उत्तर दिया, वे मनुष्य बनकर हमारे बीच आ गए।

आपके लिए

सुलैमान ने प्रार्थना करते समय घुटने टेके और हाथ फैलाए। शायद तुम्हारा भी कभी मन करे कि प्रार्थना में तुम्हारा पूरा शरीर शामिल हो, न सिर्फ शब्द। और जब तुमसे कोई गलती हो जाए, याद रखना, सुलैमान ने पहले से ही परमेश्वर से कहा था कि जब वे गिड़गिड़ाकर लौटें, तो उन्हें सुन लीजिए। परमेश्वर सुनने के लिए तैयार बैठे हैं, चाहे तुम्हारी प्रार्थना कितनी भी टूटी-फूटी क्यों न हो।

चर्चा करें

अगर परमेश्वर आकाश में भी नहीं समाते, तो वे मंदिर में, या तुम्हारे चर्च में, या तुम्हारे कमरे में कैसे मौजूद हो सकते हैं?

सुलैमान ने कहा कि कोई मनुष्य निष्पाप नहीं है। क्या तुम्हें लगता है कि यह बात अपने बारे में मानना कठिन होगा? क्यों?

साथ मिलकर प्रार्थना

हे परमेश्वर, आप इतने बड़े हैं कि पूरा आकाश भी आपको समा नहीं सकता, फिर भी आप हमारी छोटी सी प्रार्थना सुनते हैं। धन्यवाद कि आपके कान हमेशा हमारी ओर खुले रहते हैं। जब हम गलती करें, हमें लौटने का साहस दीजिए, और अपनी क्षमा से हमें ढँक लीजिए। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

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1 राजाओं 8 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 राजाओं 8 किस विषय में है?
सुलैमान ने मंदिर बनवाया था, और अब वह समय आया कि सन्दूक, जिसमें दस आज्ञाओं की पटियाएँ रखी थीं, उस मंदिर में लाया जाए। यह सन्दूक उस वाचा की निशानी था, वाचा यानी परमेश्वर की वह ठोस प्रतिज्ञा जो उन्होंने मिस्र से निकलने के समय इस्राएल के साथ बाँधी थी। याजकों ने सन्दूक उठाकर परमपवित्र स्थान में रखा, करूबों के पंखों के नीचे। इतने भेड़-बैल बलि किए गए कि उनकी गिनती नहीं हो सकती थी।
1 राजाओं 8 क्या कहता है?
इसके बाद सुलैमान ने लोगों को आशीर्वाद दिया और याद दिलाया कि परमेश्वर ने दाऊद को जो वचन दिया था, वह पूरा हुआ है। फिर वह घुटनों के बल झुका, हाथ आकाश की ओर फैलाए, और एक लंबी प्रार्थना की। उसने कहा कि परमेश्वर स्वर्ग में भी नहीं समाते, तो यह भवन उन्हें कैसे समाएगा? फिर भी उसने विनती की कि परमेश्वर की आँखें और कान इस स्थान की ओर खुले रहें, चाहे कोई इस्राएली पाप करके पछताकर लौट आए, चाहे सूखा पड़े, चाहे कोई परदेशी दूर से आकर प्रार्थना करे। सुलैमान ने साफ कहा, "निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है", और परमेश्वर से क्षमा का रास्ता हमेशा खुला रखने को कहा। अंत में उसने फिर लोगों को आशीर्वाद दिया, और सबने मिलकर चौदह दिन तक बड़ा उत्सव मनाया।
1 राजाओं 8 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
सुलैमान की पूरी प्रार्थना में एक शब्द बार-बार आता है, सुनना। जब कोई पाप करे, जब सूखा पड़े, जब कोई परदेशी दूर से पुकारे, हर बार सुलैमान कहता है, आप सुन लीजिए। परमेश्वर दूर के परमेश्वर नहीं हैं, वे सुनने वाले परमेश्वर हैं।
बच्चे 1 राजाओं 8 से क्या सीख सकते हैं?
मंदिर में परमेश्वर की महिमा का बादल भरना कोई नई बात नहीं थी, मूसा के समय मिलापवाले तंबू में भी ऐसा ही हुआ था। परमेश्वर अपने लोगों के बीच रहना चाहते हैं, यह उनकी पुरानी इच्छा है। पर यह मंदिर पत्थर का था, और एक दिन गिर भी गया। बाइबल की बड़ी कहानी में आगे हम पढ़ते हैं कि यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति लेकर आए, ऐसी उपस्थिति जो किसी इमारत में बंद नहीं रहती बल्कि हर जगह अपने लोगों के साथ चल सकती है। सुलैमान ने पूछा थ
1 राजाओं 8 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अगर परमेश्वर आकाश में भी नहीं समाते, तो वे मंदिर में, या तुम्हारे चर्च में, या तुम्हारे कमरे में कैसे मौजूद हो सकते हैं?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 47

सुलैमान मंदिर के उद्घाटन के उत्सव में खड़ा है, और उसी घड़ी उस दिन की प्रार्थना कर रहा है जब लोग बँधुआई में होंगे। वह उनके शब्द भी पहले से बोल देता है: "हमने पाप किया, और कुटिलता और दुष्टता की है।" ध्यान दे, पश्चाताप वहीं से शुरू होता है जहाँ तू इस समय है, परदेस में, टूटा हुआ। पहले घर लौटना ज़रूरी नहीं, पहले मन का लौटना ज़रूरी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

ध्यान दे, परमेश्वर ने पहले कोई नगर नहीं चुना, उसने एक मनुष्य चुना: "मैंने दाऊद को चुन लिया कि वह मेरी प्रजा इस्राएल का प्रधान हो।" पत्थरों से पहले वह दिल चुनता है। तू सोचता है तेरी जगह छोटी है, तेरा काम मामूली है। पर परमेश्वर आज भी भवन से ज़्यादा उस व्यक्ति को देखता है जिसे उसने बुलाया है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

सुलैमान ने मंदिर बनाकर यह नहीं कहा कि अब परमेश्वर यहाँ बंद हो गया। उसने माँगा, "तेरी आँख इस भवन की ओर रात-दिन खुली रहें।" वह जानता था कि पत्थर नहीं, परमेश्वर की खुली आँख ही उस जगह को पवित्र बनाती है। तेरी आँखें आज रात नींद में बंद होंगी, लेकिन उसकी नहीं। जो प्रार्थना तूने थककर अधूरी छोड़ दी, वह उसे सुन रहा है।

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