2 इतिहास 7
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
सुलैमान ने अभी-अभी मंदिर के लिए लंबी प्रार्थना की थी। जैसे ही वह प्रार्थना समाप्त हुई, आकाश से आग गिरी और उसने बलियों को भस्म कर दिया। यहोवा का तेज, यानी उनकी चमकती हुई उपस्थिति, मंदिर में इतनी भर गई कि याजक भी अंदर नहीं जा सके। सोचिए, यह कोई छोटी बात नहीं थी। सारे इस्राएली लोग यह देखकर भूमि पर झुक गए और बोले, “वह भला है, उसकी करुणा सदा की है।” फिर राजा और प्रजा ने मिलकर हजारों बैल और भेड़-बकरियाँ चढ़ाईं, इतनी अधिक कि मुख्य वेदी छोटी पड़ गई। सात दिन तक उत्सव चला, फिर एक और सप्ताह, और आखिर में सब लोग खुशी से अपने घर लौटे।
फिर रात में परमेश्वर स्वयं सुलैमान से बात करते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने प्रार्थना सुन ली है और इस मंदिर को अपना घर बना लिया है। लेकिन साथ ही वे कुछ गंभीर बातें भी कहते हैं। अगर लोग परमेश्वर से दूर जाएँ और सूखा, टिड्डी या महामारी आए, तो अगर वे दीन होकर लौटें, परमेश्वर सुनेंगे और क्षमा करेंगे। पर अगर वे पूरी तरह मुँह मोड़ लें और दूसरे देवताओं की पूजा करें, तो परमेश्वर यह सुंदर मंदिर भी छोड़ सकते हैं।
इसका क्या मतलब है?
यह अध्याय दिखाता है कि परमेश्वर की उपस्थिति कोई हल्की बात नहीं है। वे इतने पवित्र और शक्तिशाली हैं कि आग गिरती है और याजक भी ठहर नहीं पाते। पर वही परमेश्वर अपने लोगों के बीच रहना चाहते हैं, यह कितनी बड़ी बात है। मंदिर बनने पर खुशी थी, पर उस खुशी के साथ परमेश्वर एक शर्त भी जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि यह घर उनका तभी रहेगा जब लोग उनकी बात मानेंगे। यहाँ एक मुश्किल सच्चाई है जिसे टेक्स्ट खुद नहीं छिपाता, परमेश्वर का प्यार बिना शर्त महसूस होता है, पर उनके साथ चलना एक जिम्मेदारी भी है। क्या परमेश्वर सच में अपना घर छोड़ सकते थे? पाठ कहता है हाँ, अगर लोग जानबूझकर पीठ फेर लें। यह सोचने लायक बात है, और इसका कोई आसान जवाब नहीं है।
बड़ी कहानी से जुड़ाव
परमेश्वर यहाँ दाऊद के साथ की गई वाचा, यानी एक पक्का वादा, याद दिलाते हैं। वे कहते हैं कि अगर सुलैमान उनके सामने चलता रहे, तो उसका घराना सदा राज करेगा। यह वादा आगे चलकर यीशु मसीह में पूरा होता है, जो दाऊद के घराने से आए और सदा के लिए राजा बने। पर इससे भी गहरी बात है, सुलैमान का मंदिर पत्थर का बना था और कभी गिर भी सकता था, जैसा आगे हुआ भी। यीशु मसीह आकर स्वयं कहते हैं कि वे ही सच्चा मंदिर हैं, जहाँ परमेश्वर और मनुष्य मिलते हैं। आग और तेज की जगह अब यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति हमारे पास लाते हैं, बिना किसी को दूर रखे।
तुम्हारे लिए
तुम भी कभी मन में टूटा हुआ महसूस करते हो, जैसे तुमने कुछ गलत किया और परमेश्वर से दूर चले गए हो। इस अध्याय में एक वादा छिपा है, अगर तुम दीन होकर, यानी अपने अहंकार को छोड़कर, परमेश्वर की ओर लौटो, तो वे सुनते हैं। यह बात सिर्फ इस्राएल के लिए नहीं, तुम्हारे लिए भी सच है। जब तुम झूठ बोलकर, या किसी से गुस्से में होकर मन में बेचैनी महसूस करो, तो याद रखना कि परमेश्वर की आँखें और कान तुम्हारी प्रार्थना की ओर खुले हैं, जैसा वचन 15 में लिखा है। लौटना कमजोरी नहीं, बल्कि भरोसे की निशानी है।
बात करें
अगर परमेश्वर इतने प्रेमी हैं, तो वे मंदिर छोड़ने की चेतावनी क्यों देते हैं? क्या प्रेम और शर्त एक साथ हो सकते हैं?
क्या तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा समय आया है जब तुमने परमेश्वर से दूर जाकर फिर लौटने का फैसला किया? उस समय कैसा महसूस हुआ था?
साथ में प्रार्थना
प्रभु, आप इतने पवित्र हैं कि आपकी उपस्थिति में खड़ा होना भी कठिन है, फिर भी आप हमारे बीच रहना चाहते हैं। धन्यवाद कि जब हम दीन होकर आपकी ओर लौटते हैं, आप सुनते और क्षमा करते हैं। हमें यीशु मसीह के पास लौटना सिखाइए, जो सच्चे मंदिर हैं। आमीन।
2 इतिहास 7 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
2 इतिहास 7 किस विषय में है?
2 इतिहास 7 क्या कहता है?
2 इतिहास 7 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे 2 इतिहास 7 से क्या सीख सकते हैं?
2 इतिहास 7 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
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