6 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

यशायाह 48

प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यशायाह 48 में परमेश्वर याकूब के घराने से, यानी इस्राएल के लोगों से बात करते हैं। ये वे लोग हैं जो यहोवा के नाम की शपथ खाते हैं, मंदिर की चर्चा करते हैं, परमेश्वर पर भरोसा होने की बात कहते हैं, पर सच्चाई और धार्मिकता से नहीं जीते। परमेश्वर कहते हैं कि वे जानते थे कि इस्राएल हठीला है, उसकी गर्दन जैसे लोहे की और माथा जैसे पीतल का कठोर है। इसलिए परमेश्वर ने पहले से ही बता दिया था कि क्या होगा, ताकि कोई यह न कह सके कि यह सब मूर्तियों का काम है।

फिर परमेश्वर एक गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने इस्राएल को चाँदी की तरह नहीं, बल्कि दुःख की भट्ठी में परखकर चुन लिया है। यानी कठिन समय, जैसे बाबेल की गुलामी, कोई सज़ा मात्र नहीं थी, बल्कि एक तरह की परख थी। परमेश्वर खुद को याद दिलाते हैं, मैं ही आदि और मैं ही अन्त हूँ, मेरे ही हाथों ने पृथ्वी की नींव डाली। फिर वे बताते हैं कि बाबेल पर उनका न्याय आएगा और इस्राएल को वहाँ से छुड़ाया जाएगा।

अध्याय के अंत में परमेश्वर कहते हैं कि यदि इस्राएल ने उनकी आज्ञाओं को ध्यान से सुना होता, तो उनकी शान्ति नदी के समान बहती रहती। फिर भी वे अपने लोगों को बाबेल से निकल जाने और पूरी पृथ्वी पर यह बात सुनाने के लिए कहते हैं, यहोवा ने अपने दास याकूब को छुड़ा लिया है। और एक तस्वीर दी जाती है, जैसे मरुभूमि में परमेश्वर ने चट्टान से पानी निकाला था, वैसे ही अब भी वे अपने लोगों की प्यास बुझाएँगे।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय बहुत ईमानदार है। परमेश्वर अपने लोगों की तारीफ नहीं करते, वे उनकी हठधर्मी और बेवफाई को साफ साफ नाम देते हैं। फिर भी वे उन्हें नहीं छोड़ते। परमेश्वर कहते हैं, अपने ही नाम के निमित्त मैं क्रोध करने में विलम्ब करता हूँ। यानी परमेश्वर धीरज रखते हैं, न इसलिए कि इस्राएल इसके लायक है, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर का अपना नाम और चरित्र भरोसेमंद है। यह सोचने लायक बात है, परमेश्वर किसी के साथ भले इसलिए नहीं रहते कि वह व्यक्ति अच्छा है, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर स्वयं वफादार हैं।

भट्ठी की तस्वीर भी गहरी है। दुःख हमेशा सज़ा नहीं होता, कभी कभी वह एक परख होता है, जिससे कुछ निखरकर सामने आता है। बाइबल यहाँ यह नहीं समझाती कि हर दुःख का यही मतलब होता है, और यह सवाल खुला रह जाता है कि किसी खास कठिनाई के पीछे क्या है। पर यह ज़रूर पता चलता है कि परमेश्वर कठिन समय में भी काम कर रहे होते हैं।

कहानी की एक कड़ी

इस अध्याय में परमेश्वर खुद को "तेरा छुड़ानेवाला" कहते हैं। यह शब्द एक वाचा की भाषा है, वाचा यानी परमेश्वर का वह ठहराया हुआ वादा जो वे अपने लोगों से निभाते हैं, चाहे लोग कैसे भी हों। यह वाचा इस्राएल के साथ शुरू हुई, पर बाइबल की पूरी कहानी में यह आगे बढ़ती जाती है। जब यीशु मसीह आए, तब वे भी छुड़ानेवाले कहलाए, पर उन्होंने केवल बाबेल की गुलामी से नहीं, बल्कि पाप और मृत्यु की गहरी गुलामी से लोगों को छुड़ाया। यशायाह 48 में परमेश्वर की धीरज भरी वफादारी, जो हठीले लोगों को नहीं छोड़ती, अंत में क्रूस पर पूरी तरह दिखाई देती है।

तुम्हारे लिए

शायद तुम भी कभी महसूस करते हो कि तुम बात तो सही करते हो, पर दिल से उस पर चलते नहीं। इस्राएल के साथ भी यही हुआ। यह अध्याय हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर हमें इसलिए प्यार नहीं करते कि हम हमेशा सही करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे खुद वफादार हैं। इससे यह मतलब नहीं निकलता कि सच्चाई से जीना ज़रूरी नहीं है, बल्कि यह कि जब तुम गलत मोड़ पर होते हो, तब भी परमेश्वर तुम्हें बुलाते रहते हैं, डाँटते हुए भी प्यार से।

बात करें

क्या तुम्हें कभी ऐसा लगा है कि तुम अंदर से सच्चे नहीं हो, जैसे इस्राएल के लोग थे? उस समय तुमने क्या किया?

परमेश्वर कहते हैं कि उन्होंने इस्राएल को "दुःख की भट्ठी" में परखा। क्या तुम्हारे जीवन में कोई कठिन समय था जिसमें बाद में पता चला कि परमेश्वर उसमें भी काम कर रहे थे?

साथ में प्रार्थना

हे परमेश्वर, आप हमसे बेहतर जानते हैं कि हमारे दिल कितने हठीले हो सकते हैं। फिर भी आप हमें नहीं छोड़ते। धन्यवाद कि आपकी वफादारी हमारी अच्छाई पर नहीं, बल्कि आपके अपने नाम पर टिकी है। हमें सच्चाई से जीना सिखाइए, और कठिन दिनों में भी हमें यह भरोसा दीजिए कि आप हमारे पास हैं। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

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यशायाह 48 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

यशायाह 48 किस विषय में है?
यशायाह 48 में परमेश्वर याकूब के घराने से, यानी इस्राएल के लोगों से बात करते हैं। ये वे लोग हैं जो यहोवा के नाम की शपथ खाते हैं, मंदिर की चर्चा करते हैं, परमेश्वर पर भरोसा होने की बात कहते हैं, पर सच्चाई और धार्मिकता से नहीं जीते। परमेश्वर कहते हैं कि वे जानते थे कि इस्राएल हठीला है, उसकी गर्दन जैसे लोहे की और माथा जैसे पीतल का कठोर है। इसलिए परमेश्वर ने पहले से ही बता दिया था कि क्या होगा, ताकि कोई यह न कह सके कि यह सब मूर्तियों का काम है।
यशायाह 48 क्या कहता है?
अध्याय के अंत में परमेश्वर कहते हैं कि यदि इस्राएल ने उनकी आज्ञाओं को ध्यान से सुना होता, तो उनकी शान्ति नदी के समान बहती रहती। फिर भी वे अपने लोगों को बाबेल से निकल जाने और पूरी पृथ्वी पर यह बात सुनाने के लिए कहते हैं, यहोवा ने अपने दास याकूब को छुड़ा लिया है। और एक तस्वीर दी जाती है, जैसे मरुभूमि में परमेश्वर ने चट्टान से पानी निकाला था, वैसे ही अब भी वे अपने लोगों की प्यास बुझाएँगे।
यशायाह 48 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
भट्ठी की तस्वीर भी गहरी है। दुःख हमेशा सज़ा नहीं होता, कभी कभी वह एक परख होता है, जिससे कुछ निखरकर सामने आता है। बाइबल यहाँ यह नहीं समझाती कि हर दुःख का यही मतलब होता है, और यह सवाल खुला रह जाता है कि किसी खास कठिनाई के पीछे क्या है। पर यह ज़रूर पता चलता है कि परमेश्वर कठिन समय में भी काम कर रहे होते हैं।
बच्चे यशायाह 48 से क्या सीख सकते हैं?
शायद तुम भी कभी महसूस करते हो कि तुम बात तो सही करते हो, पर दिल से उस पर चलते नहीं। इस्राएल के साथ भी यही हुआ। यह अध्याय हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर हमें इसलिए प्यार नहीं करते कि हम हमेशा सही करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे खुद वफादार हैं। इससे यह मतलब नहीं निकलता कि सच्चाई से जीना ज़रूरी नहीं है, बल्कि यह कि जब तुम गलत मोड़ पर होते हो, तब भी परमेश्वर तुम्हें बुलाते रहते हैं, डाँटते हुए भी प्यार से।
यशायाह 48 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
परमेश्वर कहते हैं कि उन्होंने इस्राएल को "दुःख की भट्ठी" में परखा। क्या तुम्हारे जीवन में कोई कठिन समय था जिसमें बाद में पता चला कि परमेश्वर उसमें भी काम कर रहे थे?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

परमेश्वर कहता है, "अपने निमित्त, हाँ अपने ही निमित्त मैंने यह किया है... अपनी महिमा मैं दूसरे को नहीं दूँगा।" इस्राएल जिद्दी था, मूरतों का दीवाना, फिर भी बचाया गया। क्यों? इसलिए नहीं कि वह योग्य था, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर अपने नाम के प्रति सच्चा है। सोचो, तुम्हारी रक्षा तुम्हारे प्रदर्शन पर नहीं, उसके नाम पर टिकी है। यही तुम्हारी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

वे अपने को पवित्र नगर के निवासी कहते हैं, और इस्राएल के परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं।" सुनने में यह तारीफ लगती है, पर परमेश्वर इसे उलाहने की तरह कहते हैं। पता कहाँ का है, यह आसान है; दिल कहाँ का है, यह असली सवाल है। तू भी शायद सही कलीसिया में बैठता है, सही गीत गाता है, सही नाम लेता है। पर क्या तेरा भरोसा सचमुच उस पर है, या सिर्फ उसके नाम पर?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

भला होता कि तूने मेरी आज्ञाओं पर ध्यान दिया होता! तब तेरी शान्ति नदी के समान और तेरा धर्म समुद्र की लहरों के समान होता।" परमेश्वर यहाँ डाँट नहीं रहा, वह आह भर रहा है। सोचो, तुम्हारे न सुनने पर उसका दिल दुखता है। वह नदी आज भी बह सकती है। आज उसकी कौन सी बात है जिसे तुम टाल रहे हो?

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