7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

अय्यूब 14

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

अय्यूब बहुत दुःखी था। उसका शरीर दर्द से भरा था, और उसका मन उससे भी ज़्यादा भारी था। वह परमेश्वर के सामने बैठा और अपने दिल की सारी बात कह डाली।

उसने कहा, "मनुष्य जो स्त्री से उत्पन्न होता है, उसके दिन थोड़े और दुःख भरे हैं।" वह एक फूल जैसा है, जो खिलता है और फिर तोड़ा जाता है। वह छाया जैसा है, जो कभी ठहरती नहीं। अय्यूब ने परमेश्वर से पूछा, "फिर क्या आप ऐसे पर दृष्टि लगाते हैं?"

फिर अय्यूब ने एक पेड़ की बात की। एक पेड़ को काट दो, फिर भी उसमें आशा रहती है। उसकी जड़ें मिट्टी में सूख भी जाएँ, तो भी बारिश की गंध पाकर वह फिर से हरा हो जाता है, नई-नई डालियाँ फूट पड़ती हैं। पर मनुष्य ऐसा नहीं है। मनुष्य मर जाता है, और फिर उठता नहीं, जैसे नदी का पानी सूखते-सूखते सूख जाता है।

अय्यूब ने एक बहुत साहसी बात कही। उसने कहा, "काश आप मुझे अधोलोक में छिपा लेते, और एक दिन ठहराकर फिर मेरी सुधि लेते।" और फिर उसने वह बड़ा सवाल पूछा, जो उसके दिल की गहराई से निकला, "यदि मनुष्य मर जाए तो क्या वह फिर जीवित होगा?" अय्यूब ने कहा कि वह अपनी पूरी कठिन ज़िंदगी में इस आशा को थामे रहेगा।

फिर भी उसकी सच्चाई में एक शिकायत भी थी। उसने कहा कि जैसे पहाड़ गिरते-गिरते मिट जाता है, और पत्थर पानी से घिस जाते हैं, वैसे ही परमेश्वर मनुष्य की आशा को मिटा देते हैं।

इसका मतलब क्या है?

अय्यूब ने जो कहा वह बहुत दुःख भरा था, पर एक बात ध्यान देने लायक है, वह परमेश्वर से छिपा नहीं। उसने अपना डर, अपनी उलझन, अपना सबसे बड़ा सवाल, सब कुछ सीधे परमेश्वर के सामने रख दिया। उसने झूठी मुस्कान नहीं दिखाई।

यह हमें सिखाता है कि हम परमेश्वर से अपनी सच्ची बातें कह सकते हैं, चाहे वे कितनी भी उदास या डरावनी क्यों न हों। परमेश्वर अपने बच्चों के सवालों से नहीं डरते।

सामान्य सूत्र

अय्यूब ने पूछा था, "यदि मनुष्य मर जाए तो क्या वह फिर जीवित होगा?" उस समय उसे पूरा उत्तर नहीं मिला था। पर आज हम जानते हैं। यीशु मसीह मरे, और तीसरे दिन फिर से जीवित हो उठे। मृत्यु उन्हें रोक न सकी।

अय्यूब की आशा, जो एक पेड़ की नई शाखाओं जैसी थी, यीशु में पूरी होती है। जो कोई यीशु पर भरोसा करता है, वह मरने के बाद भी फिर जीएगा। यह अय्यूब का सपना था, और यह हमारे लिए सच्चाई है।

तुम्हारे लिए

जब तुम्हारे मन में कोई बड़ा डर हो, जैसे किसी के खो जाने का डर, या कोई दुःख जो समझ नहीं आता, तो अय्यूब जैसे बनो। परमेश्वर के पास जाओ और सच-सच बताओ। उनसे पूछो जो पूछना चाहते हो। और याद रखो, यीशु जी उठे, इसलिए हमारी आशा कभी नहीं सूखेगी।

बात करें

अय्यूब ने परमेश्वर से अपना सबसे बड़ा डर क्यों कहा?

यीशु के जी उठने से अय्यूब का सवाल कैसे हल होता है?

एक साथ प्रार्थना

हे प्रभु, कभी-कभी हमारा मन भी भारी होता है। धन्यवाद कि हम आपसे सच-सच कह सकते हैं। धन्यवाद कि यीशु मसीह मृत्यु से जी उठे, और हमारी आशा को कभी सूखने नहीं देते। आमीन।

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अय्यूब 14 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

अय्यूब 14 किस विषय में है?
अय्यूब बहुत दुःखी था। उसका शरीर दर्द से भरा था, और उसका मन उससे भी ज़्यादा भारी था। वह परमेश्वर के सामने बैठा और अपने दिल की सारी बात कह डाली।
अय्यूब 14 क्या कहता है?
फिर अय्यूब ने एक पेड़ की बात की। एक पेड़ को काट दो, फिर भी उसमें आशा रहती है। उसकी जड़ें मिट्टी में सूख भी जाएँ, तो भी बारिश की गंध पाकर वह फिर से हरा हो जाता है, नई-नई डालियाँ फूट पड़ती हैं। पर मनुष्य ऐसा नहीं है। मनुष्य मर जाता है, और फिर उठता नहीं, जैसे नदी का पानी सूखते-सूखते सूख जाता है।
अय्यूब 14 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
फिर भी उसकी सच्चाई में एक शिकायत भी थी। उसने कहा कि जैसे पहाड़ गिरते-गिरते मिट जाता है, और पत्थर पानी से घिस जाते हैं, वैसे ही परमेश्वर मनुष्य की आशा को मिटा देते हैं।
बच्चे अय्यूब 14 से क्या सीख सकते हैं?
यह हमें सिखाता है कि हम परमेश्वर से अपनी सच्ची बातें कह सकते हैं, चाहे वे कितनी भी उदास या डरावनी क्यों न हों। परमेश्वर अपने बच्चों के सवालों से नहीं डरते।
अय्यूब 14 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अय्यूब की आशा, जो एक पेड़ की नई शाखाओं जैसी थी, यीशु में पूरी होती है। जो कोई यीशु पर भरोसा करता है, वह मरने के बाद भी फिर जीएगा। यह अय्यूब का सपना था, और यह हमारे लिए सच्चाई है।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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