7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

लूका 13

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

लूका 13 में बहुत सारी बातें एक साथ आती हैं। पहले कुछ लोग यीशु के पास आकर एक भयानक घटना की चर्चा करते हैं, कुछ गलीली लोगों को पिलातुस ने मार डाला था और उनका खून उन्हीं की बलि के साथ मिला दिया। लोग सोचते थे कि ऐसा सिर्फ बड़े पापियों के साथ होता है। यीशु साफ कहते हैं, नहीं, ऐसा नहीं है। वे एक और घटना जोड़ते हैं, शीलोह के गुम्मट के गिरने से अठारह लोग मर गए थे। यीशु दोनों बार कहते हैं कि मन फिराना ज़रूरी है, यानी अपना रास्ता बदलकर परमेश्वर की ओर लौटना, चाहे बुरी घटनाएँ हों या न हों।

फिर यीशु एक दृष्टान्त सुनाते हैं, एक अंजीर के पेड़ के बारे में जिसमें तीन साल से फल नहीं आया। मालिक उसे काट डालना चाहता है, पर रखवाला कहता है, एक साल और रुक जाइए, मैं इसकी देखभाल करूँगा।

इसके बाद एक सभाघर में यीशु एक स्त्री को देखते हैं जो अठारह साल से कुबड़ी थी और सीधी नहीं हो पाती थी। यीशु उसे चंगा करते हैं, और वह परमेश्वर की स्तुति करने लगती है। पर यह सब्त का दिन था, और सभाघर का सरदार गुस्सा हो जाता है क्योंकि नियम के अनुसार उस दिन काम नहीं करना चाहिए। यीशु उसे कपटी कहते हैं, क्योंकि वही लोग अपने बैल को सब्त के दिन पानी पिलाने ले जाते हैं।

आगे यीशु परमेश्वर के राज्य की तुलना राई के दाने और ख़मीर से करते हैं, छोटी शुरुआत से बड़ा काम। फिर कोई पूछता है, क्या बचनेवाले कम हैं? यीशु जवाब देते हैं कि सकेत द्वार से प्रवेश करने का यत्न करो, क्योंकि बहुत से लोग बाद में दरवाजा बंद पाएँगे। अंत में फरीसी चेतावनी देते हैं कि हेरोदेस उन्हें मार डालना चाहता है, पर यीशु डरते नहीं, और यरूशलेम के लिए रोते हुए कहते हैं कि वह शहर अपने ही भविष्यद्वक्ताओं को मारता आया है।

इसका क्या मतलब है?

यह अध्याय हमें बताता है कि यीशु सीधी, सच्ची बातें कहने से नहीं डरते। वे लोगों की गलत सोच ठीक करते हैं, वे यह नहीं मानते कि दुख हमेशा पाप की सज़ा है। वे यह भी दिखाते हैं कि नियम रखना ज़रूरी है, पर नियम से बड़ा है प्यार और दया। उस स्त्री को अठारह साल दुख में छोड़ देना किसी नियम से सही नहीं ठहराया जा सकता। अंजीर के पेड़ की कहानी हमें सिखाती है कि परमेश्वर धीरज रखते हैं, पर धीरज हमेशा के लिए नहीं रहता। एक दिन फल देखना ज़रूरी हो जाता है।

एक बड़ी कहानी से जुड़ाव

यीशु यहाँ खुद को उस किसान जैसा दिखाते हैं जो पेड़ की देखभाल करने को तैयार है, एक और मौका देने को तैयार है। यह परमेश्वर के स्वभाव की तस्वीर है, जो तुरंत काट नहीं डालते बल्कि रुकते हैं और बुलाते हैं। और जब यीशु यरूशलेम के लिए रोते हैं, मुर्गी की तरह अपने बच्चों को पंखों के नीचे इकट्ठा करना चाहते हैं, तो हम देखते हैं कि परमेश्वर का प्यार कितना गहरा है, भले ही लोग उसे ठुकरा दें। यही वह मेल-मिलाप का वादा है जो पूरी बाइबल में चलता है, परमेश्वर बार-बार बुलाते हैं, भले ही हम दूर भाग जाएँ।

तुम्हारे लिए

कभी-कभी हम सोचते हैं कि अगर किसी के साथ कुछ बुरा होता है, तो ज़रूर उसने कुछ गलत किया होगा। यीशु कहते हैं कि ऐसा सोचना ठीक नहीं। इसके बजाय हर किसी को, अच्छे या बुरे दिनों में, अपने दिल की जाँच करनी चाहिए। क्या तुम्हारी ज़िंदगी में भी ऐसे नियम हैं जो तुम दया से ज़्यादा महत्व देते हो? उस सभाघर के सरदार की तरह बनना आसान है, नियम तो सही था, पर दिल गलत जगह था। यीशु चाहते हैं कि हम फल दें, प्यार और सच्चाई का फल, न कि सिर्फ नियम निभाने का दिखावा।

बात करें

अगर किसी के साथ कुछ बुरा होता है, तो क्या इसका मतलब है कि परमेश्वर उससे नाराज़ हैं? यीशु की बात से इसका जवाब कैसे मिलता है?

सभाघर के सरदार ने नियम को दया से ज़्यादा महत्व दिया। क्या तुम्हारे जीवन में भी कभी ऐसा हो सकता है?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, आप हमारे साथ धीरज रखते हैं, जैसे उस अंजीर के पेड़ के साथ रखा गया। हमें सिखाइए कि नियम से ज़्यादा दया को महत्व दें, और अपने दिल को सच्चे मन से आपकी ओर मोड़ने में मदद करें। आमीन।

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लूका 13 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

लूका 13 किस विषय में है?
लूका 13 में बहुत सारी बातें एक साथ आती हैं। पहले कुछ लोग यीशु के पास आकर एक भयानक घटना की चर्चा करते हैं, कुछ गलीली लोगों को पिलातुस ने मार डाला था और उनका खून उन्हीं की बलि के साथ मिला दिया। लोग सोचते थे कि ऐसा सिर्फ बड़े पापियों के साथ होता है। यीशु साफ कहते हैं, नहीं, ऐसा नहीं है। वे एक और घटना जोड़ते हैं, शीलोह के गुम्मट के गिरने से अठारह लोग मर गए थे। यीशु दोनों बार कहते हैं कि मन फिराना ज़रूरी है, यानी अपना रास्ता बदलकर परमेश्वर की ओर लौटना, चाहे बुरी घटनाएँ हों या न हों।
लूका 13 क्या कहता है?
इसके बाद एक सभाघर में यीशु एक स्त्री को देखते हैं जो अठारह साल से कुबड़ी थी और सीधी नहीं हो पाती थी। यीशु उसे चंगा करते हैं, और वह परमेश्वर की स्तुति करने लगती है। पर यह सब्त का दिन था, और सभाघर का सरदार गुस्सा हो जाता है क्योंकि नियम के अनुसार उस दिन काम नहीं करना चाहिए। यीशु उसे कपटी कहते हैं, क्योंकि वही लोग अपने बैल को सब्त के दिन पानी पिलाने ले जाते हैं।
लूका 13 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय हमें बताता है कि यीशु सीधी, सच्ची बातें कहने से नहीं डरते। वे लोगों की गलत सोच ठीक करते हैं, वे यह नहीं मानते कि दुख हमेशा पाप की सज़ा है। वे यह भी दिखाते हैं कि नियम रखना ज़रूरी है, पर नियम से बड़ा है प्यार और दया। उस स्त्री को अठारह साल दुख में छोड़ देना किसी नियम से सही नहीं ठहराया जा सकता। अंजीर के पेड़ की कहानी हमें सिखाती है कि परमेश्वर धीरज रखते हैं, पर धीरज हमेशा के लिए नहीं रहता। एक दिन फल देखना ज़रूरी हो जाता है।
बच्चे लूका 13 से क्या सीख सकते हैं?
कभी-कभी हम सोचते हैं कि अगर किसी के साथ कुछ बुरा होता है, तो ज़रूर उसने कुछ गलत किया होगा। यीशु कहते हैं कि ऐसा सोचना ठीक नहीं। इसके बजाय हर किसी को, अच्छे या बुरे दिनों में, अपने दिल की जाँच करनी चाहिए। क्या तुम्हारी ज़िंदगी में भी ऐसे नियम हैं जो तुम दया से ज़्यादा महत्व देते हो?
लूका 13 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
सभाघर के सरदार ने नियम को दया से ज़्यादा महत्व दिया। क्या तुम्हारे जीवन में भी कभी ऐसा हो सकता है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

अठारह साल से झुकी हुई वह स्त्री सीधी खड़ी हो गई, और उसी दृश्य को देखकर दो तरह के दिल सामने आए: "उसके सब विरोधी लज्जित हुए, और सारी भीड़ उन महिमा के कामों से जो वह करता था, आनन्दित हुई।" एक ही चमत्कार, पर किसी ने नियम टूटता देखा और किसी ने परमेश्वर की महिमा। जब तेरे सामने कोई सीधा खड़ा होता है, तेरे भीतर पहले क्या जागता है, आपत्ति या आनन्द?

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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