7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

मलाकी 1

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

बहुत समय पहले की बात है। परमेश्वर ने एक भविष्यवक्ता को भेजा, जिसका नाम था मलाकी। परमेश्वर ने उससे कहा, "जाकर मेरी प्रजा को मेरा सन्देश सुनाओ।"

परमेश्वर ने कहा, "मैंने तुमसे प्रेम किया है।" पर लोगों ने पूछा, "आपने हमसे प्रेम कैसे किया?" सोचो, क्या यह अजीब सवाल नहीं? जैसे कोई पिता अपने बच्चे से कहे, "मैं तुझसे प्यार करता हूँ," और बच्चा जवाब दे, "साबित करो!"

परमेश्वर ने समझाया। याकूब और एसाव दो भाई थे। परमेश्वर ने याकूब को चुना और उसकी देखभाल की। पर लोग फिर भी परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते थे।

फिर परमेश्वर ने एक और बात कही, जो सुनने में कड़वी लगती है। उसने कहा, "एक बेटा अपने पिता का आदर करता है, एक दास अपने मालिक का आदर करता है। मैं तुम्हारा पिता हूँ, तो मेरा आदर कहाँ है?"

याजक लोग परमेश्वर की वेदी पर भेंट चढ़ाते थे। पर वे कैसी भेंट लाते थे? अंधे पशु, लंगड़े पशु, बीमार पशु! सोचो, अगर तुम किसी राजा को उपहार देना चाहते, तो क्या तुम टूटी-फूटी, बेकार चीज़ ले जाते? नहीं न! पर याजक परमेश्वर के लिए वही करते थे जो सबसे घटिया था।

परमेश्वर ने कहा, "यह भेंट अपने हाकिम के पास ले जाओ, क्या वह खुश होगा?" यह एक तीखा सवाल था। परमेश्वर दुखी थे, क्योंकि उनकी प्रजा उन्हें तुच्छ समझती थी।

इसका क्या अर्थ है?

यह कहानी हमें दिखाती है कि परमेश्वर चाहते हैं कि हम उन्हें सच्चे दिल से प्यार करें, न कि सिर्फ दिखावे के लिए कुछ भी दे दें। याजक सोचते थे, "चलो कोई भी पशु ले जाएँ, परमेश्वर को क्या फर्क पड़ेगा?" पर परमेश्वर को फर्क पड़ता है। वे हमारा सबसे अच्छा चाहते हैं, क्योंकि वे हमसे प्रेम करते हैं।

परमेश्वर ने यह भी कहा कि दूर-दूर के देशों में भी लोग उनका नाम महान मानेंगे। परमेश्वर छोटे नहीं हैं। वे सारी पृथ्वी के राजा हैं।

सूत्र

परमेश्वर एक पिता की तरह हैं, जो चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे सच्चा प्रेम करें। बहुत बाद में परमेश्वर ने अपना सबसे अनमोल उपहार भेजा, अपने पुत्र यीशु मसीह को। यीशु टूटा-फूटा या घटिया उपहार नहीं थे, वे परमेश्वर की सबसे बड़ी भेंट थे, दुनिया को बचाने के लिए। जहाँ याजक घटिया चीज़ें लाते थे, वहाँ यीशु ने अपना पूरा जीवन, अपना सब कुछ दे दिया।

तुम्हारे लिए

क्या तुमने कभी सोचा है कि परमेश्वर को क्या दोगे? शायद तुम्हारी प्रार्थना, तुम्हारा समय, तुम्हारी आज्ञाकारिता। क्या तुम वह देते हो जो सबसे अच्छा है, या जो बचा-खुचा है? जैसे जब तुम अपनी सबसे प्यारी चीज़ किसी दोस्त को देते हो, वैसे ही परमेश्वर को अपना सबसे अच्छा दिल दो, अपनी सच्ची प्रार्थना दो।

आपस में बात करें

क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को हमारी छोटी-छोटी बातों से भी फर्क पड़ता है?

तुम परमेश्वर को अपने दिन का "सबसे अच्छा हिस्सा" कैसे दे सकते हो?

संग साथ प्रार्थना

हे परमेश्वर, आपने हमसे प्रेम किया है, धन्यवाद। हमें सिखाइए कि हम आपको दिखावे की चीज़ें नहीं, पर अपना सच्चा दिल दें। आमीन।

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मलाकी 1 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

मलाकी 1 किस विषय में है?
बहुत समय पहले की बात है। परमेश्वर ने एक भविष्यवक्ता को भेजा, जिसका नाम था मलाकी। परमेश्वर ने उससे कहा, "जाकर मेरी प्रजा को मेरा सन्देश सुनाओ।"
मलाकी 1 क्या कहता है?
फिर परमेश्वर ने एक और बात कही, जो सुनने में कड़वी लगती है। उसने कहा, "एक बेटा अपने पिता का आदर करता है, एक दास अपने मालिक का आदर करता है। मैं तुम्हारा पिता हूँ, तो मेरा आदर कहाँ है?"
मलाकी 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह कहानी हमें दिखाती है कि परमेश्वर चाहते हैं कि हम उन्हें सच्चे दिल से प्यार करें, न कि सिर्फ दिखावे के लिए कुछ भी दे दें। याजक सोचते थे, "चलो कोई भी पशु ले जाएँ, परमेश्वर को क्या फर्क पड़ेगा?" पर परमेश्वर को फर्क पड़ता है। वे हमारा सबसे अच्छा चाहते हैं, क्योंकि वे हमसे प्रेम करते हैं।
बच्चे मलाकी 1 से क्या सीख सकते हैं?
क्या तुमने कभी सोचा है कि परमेश्वर को क्या दोगे? शायद तुम्हारी प्रार्थना, तुम्हारा समय, तुम्हारी आज्ञाकारिता। क्या तुम वह देते हो जो सबसे अच्छा है, या जो बचा-खुचा है? जैसे जब तुम अपनी सबसे प्यारी चीज़ किसी दोस्त को देते हो, वैसे ही परमेश्वर को अपना सबसे अच्छा दिल दो, अपनी सच्ची प्रार्थना दो।
मलाकी 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
हे परमेश्वर, आपने हमसे प्रेम किया है, धन्यवाद। हमें सिखाइए कि हम आपको दिखावे की चीज़ें नहीं, पर अपना सच्चा दिल दें। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

परन्तु तुम लोग उसको अपवित्र ठहराते हो, क्योंकि तुम कहते हो, 'यहोवा की मेज अशुद्ध है, और उस पर का भोजन तुच्छ है।'" याजक मन्दिर में खड़े थे, काम भी कर रहे थे, पर भीतर से ऊब चुके थे। परमेश्वर का अनादर चिल्लाकर नहीं, बुदबुदाकर हुआ। सोच, आज तेरी प्रार्थना और आराधना में थकावट की वह फुसफुसाहट तो नहीं छिपी?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

परमेश्वर अपनी बात उलाहने से नहीं, प्रेम से शुरू करता है: "मैंने तुमसे प्रेम रखा है।" और लोग पलटकर पूछते हैं, "तूने किस बात में हम से प्रेम रखा है?" निर्वासन से लौटे थे, मन्दिर छोटा था, फसल कम थी, तो दिल ने हिसाब लगा लिया कि प्रेम कहीं दिखता नहीं। क्या तू भी अपने हालात से उसका प्रेम नापता है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

लोग पूछ रहे थे, "तूने किस बात में हमसे प्रेम किया?" परमेश्वर बहस नहीं करता, वह इतिहास दिखाता है: "एसाव को अप्रिय जाना और उसके पहाड़ों को उजाड़ दिया।" एदोम के खंडहर और यरूशलेम की बची हुई दीवारें, दोनों एक ही बात कहते हैं। तेरा आज तक टिके रहना संयोग नहीं है। तू टूटा है, पर मिटा नहीं। यही उसके प्रेम का प्रमाण है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

यदि मैं पिता हूँ, तो मेरा आदर कहाँ?" परमेश्वर याजकों से यह नहीं पूछ रहा कि बलिदान चढ़ाया या नहीं। वे तो रोज़ चढ़ाते थे, बस सबसे घटिया चढ़ाते थे। और सबसे दुखद यह कि उन्हें खबर तक नहीं थी, इसलिए पूछते हैं, "हमने किस बात में तेरे नाम को तुच्छ जाना है?" तेरी प्रार्थना, तेरा समय, तेरा पैसा। उसे सबसे अच्छा मिल रहा है, या जो बच जाता है वही?

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