1 कुरिन्थियों 1
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
The Explanation
पौलुस कुरिन्थुस की कलीसिया को पत्र लिख रहे हैं, और वह इस तरह शुरू करते हैं जैसे कोई पुराना दोस्त शुरू करता है, न कि कोई अफसर जो हुक्म सुनाने आया हो। वे उन्हें याद दिलाते हैं कि वे कौन हैं, "मसीह यीशु में पवित्र किए गए, और पवित्र होने के लिये बुलाए गए हैं।" फिर वे परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं, क्योंकि इन लोगों को ज्ञान और वरदान की कोई कमी नहीं है। लेकिन जल्दी ही सुर बदल जाता है। खलोए के घराने से खबर आई है कि कलीसिया में झगड़े हो रहे हैं। लोग गुटों में बँट गए हैं, कोई कहता है "मैं पौलुस का", कोई "अपुल्लोस का", कोई "कैफा का", कोई मानो सबसे ऊपर उठकर कहता है "मैं तो मसीह का हूँ।" पौलुस इस पर सीधा सवाल पूछते हैं, "क्या मसीह बँट गया?" फिर वे मूल मुद्दे पर आते हैं, क्रूस। दुनिया की नजर में क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह मूर्खता है, यहूदियों के लिये ठोकर, यूनानियों के लिये बकवास। लेकिन जो बुलाए गए हैं, उनके लिये यही मसीह परमेश्वर की सामर्थ्य और परमेश्वर का ज्ञान है। और पौलुस उन्हें याद दिलाते हैं कि परमेश्वर ने जान बूझकर दुनिया के हिसाब से कमजोर, तुच्छ, नासमझ लोगों को चुना, ताकि किसी को घमण्ड करने का मौका न मिले।
What Does This Mean?
यह अध्याय सीधे उस चीज़ पर वार करता है जो शायद तुम्हारे भीतर भी है, यह विचार कि विश्वास तभी सही लगता है जब वह "समझदार" दिखे, जब वह तर्क से जीता जा सके, जब वह किसी बड़े नाम या किसी होशियार व्यक्ति से जुड़ा हो। कुरिन्थुस के लोग यही कर रहे थे। वे अपने पसंदीदा उपदेशक के पीछे पहचान बना रहे थे, जैसे आजकल कोई किसी इन्फ्लुएंसर या किसी विचारधारा के पीछे अपनी पहचान बनाता है। पौलुस कहते हैं, रुको। सुसमाचार किसी इंसान की चतुराई पर टिका नहीं है। अगर वह टिका होता, तो क्रूस बेकार हो जाता। सच तो यह है कि क्रूस अपने आप में एक स्कैंडल है। एक फांसी की सज़ा पाया हुआ, कमजोर दिखने वाला, हारा हुआ आदमी, वही उद्धार का ज़रिया है। दुनिया इसे मूर्खता कहती है क्योंकि दुनिया सामर्थ्य और चिन्ह और चमक ढूँढती है। परमेश्वर ने जान बूझकर वह रास्ता चुना जो घमण्ड को जड़ से काट दे। यह कोई कमज़ोरी नहीं, यह परमेश्वर की गहरी बुद्धि है।
The Common Thread
पूरी बाइबल की कहानी यही है, परमेश्वर बार बार उन्हें चुनते हैं जिन्हें दुनिया नज़रअंदाज़ करती है, ताकि साफ हो जाए कि उद्धार इंसान की काबिलियत से नहीं, परमेश्वर के अनुग्रह से आता है। यही कहानी क्रूस पर अपनी चरम सीमा तक पहुँचती है। पौलुस लिखते हैं कि मसीह यीशु ही हमारे लिये "ज्ञान ठहरा अर्थात् धार्मिकता, और पवित्रता, और छुटकारा।" ध्यान दो, यह कहना नहीं है कि मसीह हमें ज्ञान, धार्मिकता और छुटकारा देते हैं, बल्कि यह कि वे स्वयं वह हैं। तुम्हारी पहचान किसी गुट में, किसी लीडर में, किसी विचारधारा में नहीं मिलेगी, वह मसीह में मिलती है। इसलिए पौलुस अंत में इशारा करते हैं, "जो घमण्ड करे वह प्रभु में घमण्ड करे।" यह कहानी हमेशा से इसी ओर जाती रही है, इंसान अपने आप को नहीं बचा सकता, परमेश्वर ने वही किया जो सबसे कमज़ोर दिखा, और वही सबसे बड़ी सामर्थ्य निकला।
For You
तुम्हारे आस-पास भी अलग अलग "गुट" हैं, कोई कहता है सच्चाई विज्ञान में है, कोई कहता है सफलता में, कोई कहता है सोशल मीडिया पर सही राय रखने में। और चर्च के भीतर भी यह हो सकता है, तुम किसी खास स्टाइल के उपदेशक, किसी खास तरह के म्यूज़िक, किसी खास ग्रुप से अपनी पहचान जोड़ने लगते हो, जैसे वही तुम्हारी असली पहचान बन गई हो। पौलुस पूछते हैं, क्या वह चीज़ तुम्हारे लिये क्रूस पर चढ़ी? यह सवाल आज भी उतना ही तीखा है। और शायद तुम्हें भी कभी शर्म आती हो कि विश्वास "बुद्धिमान" नहीं दिखता, कि दोस्तों के सामने यीशु की बात करना अजीब लगता है, मानो तुम कुछ नासमझी कर रहे हो। पौलुस तुम्हें यह नहीं कहता कि शर्म मत करो क्योंकि यह सब आसानी से समझ आ जाता है। वे कहते हैं, यह मूर्खता जैसी ही लगेगी, दुनिया की नज़र में। सवाल यह नहीं कि क्या यह चतुर लगता है, सवाल यह है कि क्या यह सच है। जिस दिन तुम यह मान लोगे कि तुम्हारी पहचान परमेश्वर के अनुग्रह से आती है, न कि किसी खेमे या किसी उपलब्धि से, उस दिन तुम्हारे भीतर की तुलना और घमण्ड, दोनों ढीले पड़ने लगेंगे।
Talk About It
क्या तुम्हारी अपनी पहचान किसी "गुट" या समूह से बहुत ज़्यादा जुड़ी हुई है, ऐसे कि उसके बिना तुम खुद को खोया हुआ महसूस करो?
क्रूस पर चढ़े मसीह की बात आज तुम्हारे दोस्तों को "मूर्खता" जैसी क्यों लग सकती है, और तुम इस बारे में कैसा महसूस करते हो?
Praying Together
प्रभु, हमें माफ़ कीजिए जब हम अपनी पहचान किसी और चीज़ में ढूँढते हैं, न कि आपमें। हमें साहस दीजिए कि हम क्रूस से शर्माएँ नहीं, भले ही दुनिया उसे नासमझी कहे। हमें याद दिलाइए कि हमारा घमण्ड करने का कोई कारण नहीं है सिवाय आपके, क्योंकि आपने ही हमें बुलाया, आपने ही हमें अपना बनाया। आमीन।
1 कुरिन्थियों 1 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 कुरिन्थियों 1 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 1 क्या कहता है?
1 कुरिन्थियों 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर 1 कुरिन्थियों 1 से क्या सीख सकते हैं?
1 कुरिन्थियों 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
परमेश्वर की इच्छा से" पौलुस अपनी पहचान नहीं गिनाता, बल्कि बताता है कि यह चुनाव उसका अपना नहीं था। जिस कलीसिया में लोग गुटों में बँटे थे, वहाँ वह शुरू ही यहाँ से करता है कि बुलाहट ऊपर से आती है। और उसके साथ खड़ा है सोस्थिनेस, जो कभी विरोधी खेमे में था, अब "भाई" कहलाता है। सोचो, तुम्हारा नाम किसके साथ लिखा जा सकता है, अगर अनुग्रह अपना काम पूरा करे?
परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन् जो कुछ नहीं हैं उन्हें भी चुन लिया।" पौलुस कुरिन्थुस की उस कलीसिया को लिख रहा है जहाँ लोग अपने ज्ञान और रुतबे पर इतराते थे। और वह कहता है, देखो, परमेश्वर ने तुम्हें इसलिए नहीं चुना कि तुम कुछ थे। तुम्हारा खालीपन ही उसकी जगह बना। आज जो कमी तुझे शर्मिंदा करती है, वही शायद उसका दरवाजा हो।
यहूदी चिन्ह चाहते हैं, और यूनानी ज्ञान की खोज में हैं।" दोनों परमेश्वर से अपनी शर्तों पर मिलना चाहते थे। एक सबूत माँगता है, दूसरा तर्क। और तू? कहीं तेरी प्रार्थना भी यही तो नहीं, बस एक निशान दे दे, फिर मान लूँगा। पर पौलुस क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को दिखाता है, जहाँ न चमत्कार दिखा, न तर्क समझ आया, बस प्रेम बहता रहा।
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