12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

इब्रानियों 5

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

इब्रानियों के लेखक अब यीशु को एक नए नाम से बुलाते हैं, महायाजक। यह शब्द तुम्हें शायद अजनबी लगे, पर पहली सदी के यहूदी पाठक के लिए यह बिलकुल परिचित था। महायाजक वह व्यक्ति था जो मनुष्यों में से चुना जाता था, ताकि परमेश्वर और लोगों के बीच खड़ा होकर भेंट और पापबलि चढ़ाए। वह खुद भी निर्बलता से घिरा हुआ था, इसलिए वह अज्ञानियों और भूले भटकों के साथ नर्मी से व्यवहार कर सकता था। उसे अपने लिए भी पापबलि चढ़ानी पड़ती थी, क्योंकि वह भी पापी था। और यह पद कोई अपनी इच्छा से नहीं पा सकता था, हारून के समान, उसे परमेश्वर की ओर से ही ठहराया जाना पड़ता था।

फिर लेखक कहते हैं, मसीह के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने खुद को महायाजक नहीं बनाया, परमेश्वर ने उनसे कहा, “तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे जन्माया है,” और “तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिये याजक है।” यहाँ कुछ बहुत मार्मिक जुड़ता है। यीशु ने अपने शरीर में रहने के दिनों में ऊँचे शब्द से पुकार पुकारकर और आँसू बहा-बहाकर प्रार्थना की, उससे जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था। पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी, और सिद्ध बनकर सबके लिए सदाकाल के उद्धार का कारण बन गए।

इसके बाद लेखक का स्वर बदल जाता है। वे कहते हैं, इस बारे में बहुत कुछ कहना है, पर तुम्हें समझाना कठिन है, क्योंकि तुम ऊँचा सुनने लगे हो। समय के हिसाब से तो तुम्हें गुरु बन जाना चाहिए था, पर तुम्हें अब तक दूध चाहिए, ठोस आहार नहीं। दूध पीनेवाला बच्चा है, पर ठोस आहार उनके लिए है जिनकी समझ अभ्यास से परिपक्व हो चुकी है, जो भले और बुरे में भेद कर सकते हैं।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय दो चीज़ें एक साथ कहता है, और दोनों तुम्हें छूनी चाहिए। पहली, यीशु सिर्फ एक दूर का, ठंडा उद्धारकर्ता नहीं हैं। वे रोए। उन्होंने ऊँची आवाज़ में पुकारा। उन्होंने डर जाना, दर्द महसूस करना, और फिर भी आज्ञा मानना सीखा। यह कोई कमज़ोरी की बात नहीं, यह असली इंसानियत की बात है। यीशु ने दुःख को छोड़कर नहीं, दुःख से होकर गुज़रकर परिपक्वता पाई।

दूसरी बात ज़्यादा चुभने वाली है। लेखक अपने पाठकों को, जो लंबे समय से विश्वासी थे, बच्चों जैसा कहते हैं। उन्हें शर्म आनी चाहिए थी, क्योंकि इतने समय बाद भी वे गहरी बातें समझने में असमर्थ थे, अभी भी दूध पर टिके हुए थे। यह केवल ज्ञान की कमी की बात नहीं, यह अभ्यास की कमी की बात है। समझ अपने आप नहीं आती, वह तब आती है जब तुम बार-बार भले और बुरे में फर्क करने की कोशिश करते हो, जब तुम्हारा विवेक इस्तेमाल होता है।

मुख्य सूत्र

पूरी बाइबल की कहानी यह है कि परमेश्वर और मनुष्य के बीच एक दूरी है, और कोई न कोई बीच में खड़ा होना चाहिए। पुराने नियम में यह काम याजक करते थे, पर वे खुद भी पापी थे, इसलिए उनकी भेंटें बार-बार चढ़ानी पड़ती थीं। यीशु उस पूरी व्यवस्था को पूरा करते हैं और साथ ही उससे आगे भी जाते हैं। वे मलिकिसिदक की रीति पर याजक हैं, यानी एक ऐसा याजकपद जो हारून की वंशावली से परे, सदा के लिए है। और सबसे बड़ी बात, वे अपने आप में पापरहित हैं, फिर भी उन्होंने हमारी निर्बलता को पूरी तरह महसूस किया। इसलिए वे परमेश्वर के सामने हमारी ओर से खड़े हो सकते हैं, और साथ ही हमें पूरी तरह समझ भी सकते हैं। यह वही वादा है जो पूरी बाइबल में गूँजता है, परमेश्वर दूर नहीं रहता, वह करीब आता है, दुःख उठाता है, ताकि हमें बचा सके।

तुम्हारे लिए

शायद तुम उस उम्र में हो जहाँ ज़िंदगी असली दर्द दिखाने लगी है, रिश्तों की टूट-फूट, भविष्य की अनिश्चितता, खुद को साबित करने का दबाव। यह अध्याय तुमसे झूठ नहीं बोलता कि विश्वास रखने से दर्द गायब हो जाएगा। यीशु खुद रोए, पुकारे, और सीखा। अगर तुम्हारा विश्वास भी दुःख में से गुज़र रहा है, तो तुम अकेले नहीं हो, और यह कोई असफलता नहीं है।

दूसरी चुनौती ज़्यादा निजी है। क्या तुम सालों से चर्च में हो, बाइबल की कहानियाँ बचपन से सुनते आए हो, पर अब भी वहीं अटके हो जहाँ दस साल पहले थे? परिपक्वता अपने आप नहीं आती। वह तब आती है जब तुम मुश्किल सवाल पूछते हो, जब तुम सिर्फ सही जवाब नहीं, गहरी समझ ढूँढ़ते हो, जब तुम अपने विवेक को अभ्यास से तेज़ करते हो। दूध पीना बुरा नहीं, पर हमेशा दूध पर रहना एक चुनाव है, और यह अध्याय उस चुनाव पर उंगली रखता है।

आपस में चर्चा करें

क्या तुम्हारे विश्वास में अब भी "दूध" जैसी बातें हैं, जिनसे आगे बढ़ने का समय आ गया है, पर तुमने टाल दिया है?

यीशु का रोना और पुकारना तुम्हारे उस दुःख के बारे में क्या कहता है जिसे तुम शायद किसी को नहीं बताते?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, आपने दुःख को झूठा नहीं बनाया, आप रोए, आप पुकारे, और फिर भी आज्ञाकारी रहे। हमें भी वही साहस दीजिए, अपने दर्द को छिपाने के बजाय आपके सामने लाने का साहस। हमें बचपन की समझ में अटके रहने से बचाइए, हमारी समझ को अपने वचन से परिपक्व कीजिए, ताकि हम भला और बुरा पहचान सकें। आमीन।

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इब्रानियों 5 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

इब्रानियों 5 किस विषय में है?
इब्रानियों के लेखक अब यीशु को एक नए नाम से बुलाते हैं, महायाजक। यह शब्द तुम्हें शायद अजनबी लगे, पर पहली सदी के यहूदी पाठक के लिए यह बिलकुल परिचित था। महायाजक वह व्यक्ति था जो मनुष्यों में से चुना जाता था, ताकि परमेश्वर और लोगों के बीच खड़ा होकर भेंट और पापबलि चढ़ाए। वह खुद भी निर्बलता से घिरा हुआ था, इसलिए वह अज्ञानियों और भूले भटकों के साथ नर्मी से व्यवहार कर सकता था। उसे अपने लिए भी पापबलि चढ़ानी पड़ती थी, क्योंकि वह भी पापी था। और यह पद कोई अपनी इच्छा से नहीं पा सकता था, हारून के समान, उसे परमेश्वर की ओर से ही ठहराया जाना पड़ता था।
इब्रानियों 5 क्या कहता है?
इसके बाद लेखक का स्वर बदल जाता है। वे कहते हैं, इस बारे में बहुत कुछ कहना है, पर तुम्हें समझाना कठिन है, क्योंकि तुम ऊँचा सुनने लगे हो। समय के हिसाब से तो तुम्हें गुरु बन जाना चाहिए था, पर तुम्हें अब तक दूध चाहिए, ठोस आहार नहीं। दूध पीनेवाला बच्चा है, पर ठोस आहार उनके लिए है जिनकी समझ अभ्यास से परिपक्व हो चुकी है, जो भले और बुरे में भेद कर सकते हैं।
इब्रानियों 5 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
दूसरी बात ज़्यादा चुभने वाली है। लेखक अपने पाठकों को, जो लंबे समय से विश्वासी थे, बच्चों जैसा कहते हैं। उन्हें शर्म आनी चाहिए थी, क्योंकि इतने समय बाद भी वे गहरी बातें समझने में असमर्थ थे, अभी भी दूध पर टिके हुए थे। यह केवल ज्ञान की कमी की बात नहीं, यह अभ्यास की कमी की बात है। समझ अपने आप नहीं आती, वह तब आती है जब तुम बार-बार भले और बुरे में फर्क करने की कोशिश करते हो, जब तुम्हारा विवेक इस्तेमाल होता है।
किशोर इब्रानियों 5 से क्या सीख सकते हैं?
शायद तुम उस उम्र में हो जहाँ ज़िंदगी असली दर्द दिखाने लगी है, रिश्तों की टूट-फूट, भविष्य की अनिश्चितता, खुद को साबित करने का दबाव। यह अध्याय तुमसे झूठ नहीं बोलता कि विश्वास रखने से दर्द गायब हो जाएगा। यीशु खुद रोए, पुकारे, और सीखा। अगर तुम्हारा विश्वास भी दुःख में से गुज़र रहा है, तो तुम अकेले नहीं हो, और यह कोई असफलता नहीं है।
इब्रानियों 5 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
क्या तुम्हारे विश्वास में अब भी "दूध" जैसी बातें हैं, जिनसे आगे बढ़ने का समय आ गया है, पर तुमने टाल दिया है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

याजक की योग्यता उसकी मजबूती नहीं, उसकी कमज़ोरी थी। "वह अज्ञानियों, और भूले भटकों के साथ नर्मी से व्यवहार कर सकता है, इसलिए कि वह आप भी निर्बलता से घिरा है।" जिस गिरावट पर तू आज शर्मिंदा है, शायद वही तुझे किसी गिरे हुए के पास चुपचाप बैठना सिखाएगी। और जब दिल किसी पर कठोर हो जाए, तो समझ लेना कि हम अपनी ही निर्बलता भूल बैठे हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

वह पुत्र तो था, तो भी उसने दुःख उठा उठाकर आज्ञा माननी सीखी।" पुत्र होना दुःख से छूट का प्रमाणपत्र नहीं था। यीशु ने आज्ञाकारिता किताबों से नहीं, गतसमनी के पसीने और आँसुओं से सीखी। तो जब तेरी प्रार्थना का जवाब राहत नहीं, बल्कि एक और कठिन दिन होता है, तब सोच: शायद पिता तुझे छोड़ नहीं रहा, सिखा रहा है।

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