1 शमूएल 28
पाठ
गिलबो की ढलान पर पलिश्ती सेना को देखकर शाऊल का मन "अत्यन्त भयभीत हो काँप उठा", और जब उसने यहोवा से पूछा तो न स्वप्न आया, न ऊरीम बोला, न कोई भविष्यद्वक्ता; स्वर्ग जैसे बन्द हो गया। तब वह भेष बदलकर, दो आदमियों के साथ, रातों-रात एनदोर की उसी भूत-सिद्धि करनेवाली स्त्री के पास जाता है जिस पेशे को उसी ने देश से मिटा दिया था, और शमूएल को बुलवाता है। मरा हुआ भविष्यद्वक्ता वही दोहराता है जो जीते-जी कह चुका था: राज्य छिन गया, दाऊद को दे दिया गया, और कल तू और तेरे बेटे मेरे साथ होंगे। अध्याय एक विचित्र कोमलता पर खत्म होता है, जब वही डायन टूटे हुए राजा के आगे रोटी रखती है।
मूल मर्म
यह अध्याय परमेश्वर की चुप्पी के बारे में है, और चुप्पी भी एक उत्तर है। शाऊल पूछता तो यहोवा से ही है, पर वह मार्गदर्शन चाहता है, मन-फिराव नहीं; उसे जानकारी चाहिए, क्षमा नहीं। ध्यान दीजिए कि वह एक बार भी "मैंने पाप किया" नहीं कहता, केवल "मैं बड़े संकट में पड़ा हूँ" कहता है। यही इस पाठ की चुभन है: आप वर्षों तक धर्म का बाहरी ढाँचा बनाए रख सकते हैं, ओझों को देश से निकाल सकते हैं, यहोवा की शपथ भी खा सकते हैं, और भीतर से पूरी तरह खोखले हो सकते हैं। शमूएल का उत्तर निर्मम रूप से सीधा है: "जब यहोवा तुझे छोड़कर तेरा शत्रु बन गया, तब तू मुझसे क्यों पूछता है?" परमेश्वर का वचन इसलिए नहीं बदलता कि हम उसे किसी और दरवाज़े से पूछने चले जाएँ।
सूत्र
शाऊल की कहानी उस अंधकार को दिखाती है जिसमें से मसीह की ज़रूरत उभरती है। यहाँ एक राजा है जो अपने ही राज्य में भेष बदलकर, रात के अँधेरे में, शत्रु की छावनी के पास से होकर चलता है, ताकि किसी तरह परमेश्वर का शब्द चुरा सके। और शमूएल उसे साफ़ बता देता है कि राज्य "तेरे पड़ोसी दाऊद" को दे दिया गया है। इस्राएल का भविष्य उस चरवाहे में है जो इसी समय दुश्मन के देश में छिपा हुआ है, और उसी वंश में एक दिन वह राजा आएगा जो भेष बदलकर नहीं, बल्कि खुले चेहरे से मृत्यु की घाटी में उतरेगा। शाऊल मरे हुए से पूछने जाता है; हमें जीवित मसीह उत्तर देते हैं, और उनका उत्तर दण्ड नहीं, क्षमा है।
दर्पण
हम सब जानते हैं कि जब परमेश्वर चुप लगते हैं तो कैसा लगता है। नौकरी का फैसला अटका है, रिपोर्ट डॉक्टर के पास से आनी है, बेटा फोन नहीं उठाता, और प्रार्थना छत से टकराकर लौट आती है। और तब मन दूसरे दरवाज़े खटखटाने लगता है: कुंडली, ताबीज़, वह "आत्मिक" व्यक्ति जो निश्चितता बेचता है, या बस अपनी चालाकी। शाऊल का पाप यह नहीं कि उसने पूछा; उसका पाप यह था कि उसे उत्तर तो चाहिए था, पर पश्चाताप नहीं। यह पाठ पूछता है कि आपकी प्रार्थना में क्या है: सचमुच परमेश्वर, या सिर्फ़ जानकारी जो आपको सुरक्षित कर दे। आज ही, दस मिनट निकालकर, एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसे आप परमेश्वर के सामने कभी खोलते नहीं, और उसे ज़ोर से बोलकर उनसे कह दीजिए।
सन्दर्भ
यह इस्राएल के सबसे उत्तरी मैदान की बात है। पलिश्ती शूनेम में डेरा डाले हैं, शाऊल गिलबो की पहाड़ी पर; यानी दुश्मन उपजाऊ यिज्रेल घाटी पर कब्ज़ा कर चुका है और शाऊल के पास ऊँचाई तो है, पर उम्मीद नहीं। एनदोर पहाड़ के दूसरी ओर है, दुश्मन की रेखाओं के पीछे, इसलिए राजा को रात में, भेष बदलकर जाना पड़ा। कथाकार तीन बातें जान-बूझकर पहले बता देता है: शमूएल मर चुका है, ओझे देश से निकाले जा चुके हैं, और दाऊद पलिश्ती राजा आकीश की सेवा में है। तीनों दरवाज़े शाऊल ने खुद बन्द किए थे। जिस कानून पर उसने अपना धर्मपरायण नाम बनाया था, उसी को तोड़ने वह रात में निकलता है।
एक बारीकी
रोटी वाला अंत आसानी से छूट जाता है। यह वही स्त्री है जिसे शाऊल के आदेश ने बेघर किया, जो अपनी जान की भीख माँगती है, और अंत में वही अपने घर का पला हुआ बछड़ा काटती है, आटा गूँधती है, अख़मीरी रोटी बनाकर राजा के आगे रखती है। इस्राएल का राजा भूमि पर पड़ा है, बलहीन, और उसे उठाकर खाट पर बिठाने वाली एक अवैध पेशेवर औरत है। यह क्षण न शाऊल को बचाता है और न स्त्री को सही ठहराता है, पर यह इंसानी करुणा की एक अजीब, टिमटिमाती लौ है ठीक उस जगह जहाँ धर्म पूरी तरह असफल हो चुका है। परमेश्वर की चुप्पी में भी कोई आकर रोटी रख सकता है।
मुख्य पात्र
शाऊल इस अध्याय में डर से बना हुआ आदमी है। जो कभी सब से सिर भर ऊँचा था, वह अब "औंधे मुँह भूमि पर" गिरता है, दो बार: एक बार आदर में, दूसरी बार टूटकर। उसने दिन भर और रात भर कुछ नहीं खाया, नींद नहीं, दिशा नहीं, और फिर भी वह अंत तक अपनी असल समस्या का नाम नहीं लेता। उसकी त्रासदी यह नहीं कि परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया, बल्कि यह कि उसने आज्ञा मानने के बजाय हर बार नियंत्रण चुना, और अब नियंत्रण ही उसकी जेल बन गया है। वह उठता है, खाता है, और उसी रात लौट जाता है, उस युद्ध की ओर जिसका परिणाम उसे पहले ही बताया जा चुका है। यह मनुष्य की सबसे गहरी विवशता की तस्वीर है, और यही वह जगह है जहाँ अनुग्रह के सिवा कुछ काम नहीं आता।
चिंतन प्रश्न
जब परमेश्वर चुप लगते हैं, तो आपका पहला कदम क्या होता है: प्रतीक्षा और आत्म-परीक्षण, या कोई ऐसा रास्ता जो जल्दी निश्चितता दे दे?
शाऊल ने "मैं बड़े संकट में पड़ा हूँ" कहा, "मैंने पाप किया" नहीं। आपकी प्रार्थनाओं में इन दोनों वाक्यों का अनुपात इस समय कैसा है?
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1 Samuel 28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 शमूएल 28 का क्या अर्थ है?
1 शमूएल 28 किस विषय में है?
1 शमूएल 28 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 शमूएल 28 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 शमूएल 28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Samuel 28 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दाऊद ने शाऊल के डर से पलिश्तियों के बीच शरण ली थी, और अब आकीश कहता है: "निश्चय जान कि तुझे अपने जनों समेत मेरे साथ सेना में जाना होगा।" जिस जगह को उसने सुरक्षा समझा, वही अब उससे अपने ही भाइयों के विरुद्ध खड़े होने की माँग कर रही है।
सोच, तू किस पनाह में बैठा है? हर शरण एक दिन अपनी कीमत माँगती है।
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