बाइबल व्याख्या

2 इतिहास 2

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सुलैमान परमेश्वर के नाम का भवन और अपना राजभवन बनाने का निश्चय करता है, और तुरंत गिनती शुरू होती है: सत्तर हजार बोझ ढोनेवाले, अस्सी हजार पत्थर काटनेवाले, तीन हजार छः सौ मुखिए। वह सोर के राजा हीराम को संदेश भेजता है, लबानोन की देवदार लकड़ी और एक निपुण कारीगर मांगता है, और बदले में गेहूँ, जौ, दाखमधु और तेल देने का वचन देता है। हीराम उत्तर में इस्राएल के परमेश्वर को धन्य कहता है और हूराम-अबी को भेजता है, जो एक दान-वंशी माता और सोरवासी पिता का बेटा है। अध्याय उसी गिनती पर लौटता है जिससे शुरू हुआ था, अब नाम के साथ: एक लाख तिरपन हजार छः सौ परदेशी।

मूल मर्म

अध्याय के ठीक बीच में सुलैमान एक ऐसी बात कहता है जो उसके पूरे उपक्रम को हिला देती है: "किस में इतनी शक्ति है, कि उसके लिये भवन बनाए, वह तो स्वर्ग में वरन् सबसे ऊँचे स्वर्ग में भी नहीं समाता? मैं क्या हूँ…" यह विनम्रता का दिखावा नहीं, धर्मशास्त्र है। परमेश्वर को किसी इमारत की आवश्यकता नहीं; इमारत उसकी उपस्थिति को कैद नहीं करती। तो भवन किसलिए? सुलैमान का उत्तर पद 4 में है: धूप, रोटी, सवेरे और साँझ की भेंट, विश्रामदिन, नये चाँद, नियत पर्व। मंदिर परमेश्वर का घर नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ इस्राएल नियमित रूप से, सप्ताह दर सप्ताह, अपने जीवन का केंद्र परमेश्वर के सामने रखता है। भव्यता उपासना का साधन है, उपासना का विकल्प नहीं।

जोड़ने वाला सूत्र

ध्यान दें कि मंदिर बनाने के लिए कौन आता है। कारीगर हूराम-अबी आधा इस्राएली, आधा सोरवासी है; लकड़ी अन्यजाति के राजा से आती है; और वही अन्यजाति राजा सबसे स्पष्ट स्वीकारोक्ति करता है: "धन्य है इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जो आकाश और पृथ्वी का सृजनहार है।" जिस भवन में अन्यजातियों को भीतर आने की अनुमति नहीं होगी, वह अन्यजातियों के हाथों और होठों के बिना खड़ा भी नहीं हो सकता। यह सूत्र यीशु मसीह तक जाता है, जिन्होंने अपनी देह को ही मंदिर कहा और उसे तोड़कर तीन दिन में उठाया। उसके बाद पत्थर और देवदार की आवश्यकता समाप्त हो गई: अब परमेश्वर का निवास उन लोगों में है जिन्हें उन्होंने बुलाया, हर जाति से।

दर्पण

सुलैमान की परियोजना एक अनसुलझे तनाव पर खड़ी है। वह ईमानदारी से कहता है "मैं क्या हूँ," और उसी अध्याय में एक लाख तिरपन हजार छः सौ परदेशियों को गिनकर काम पर लगा देता है। बड़ा और अच्छा उद्देश्य, और उसके नीचे दूसरों की पीठ। यह प्रश्न हमें छोड़ता नहीं। आपके दफ्तर का लक्ष्य किसकी ओवरटाइम से पूरा होता है? आपके घर की व्यवस्था किसके अनदेखे श्रम पर टिकी है, पत्नी की, माता की, उस सफाईकर्मी की जिसका नाम आप नहीं जानते? आपके सस्ते कपड़े किसने सिए? कलीसिया का वह सफल कार्यक्रम किन थके हुए स्वयंसेवकों के सहारे चला, जिन्हें मंच से धन्यवाद भी नहीं मिला? सुलैमान ने कम से कम मजदूरी तय की: गेहूँ, जौ, दाखमधु, तेल, और हीराम ने याद दिलाकर वह ले भी लिया। आज ही एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसके श्रम से आपका जीवन चलता है और जिसे आपने कभी धन्यवाद नहीं दिया, और अभी उसे नाम लेकर संदेश भेजिए या फोन कीजिए।

कठिन प्रश्न

क्या परमेश्वर ने इस श्रम को स्वीकार किया? पाठ न निंदा करता है, न बचाव। वह केवल संख्या दोहराता है, जैसे कोई बहीखाता खुला छोड़ दे। यह असहज है, क्योंकि व्यवस्था में परदेशी (इब्रानी में गेर) उस वर्ग का था जिसकी रक्षा का आदेश इस्राएल को बार-बार मिला था; वे स्वयं मिस्र में गेर रहे थे और ईंटें ढो चुके थे। और अब उनका राजा वही व्यवस्था दोहरा रहा है, इस बार परमेश्वर के नाम पर। इतिहास की पुस्तक इसे छिपाती नहीं, महिमामंडित भी नहीं करती। मुझे लगता है यह जानबूझकर है। पवित्रशास्त्र हमें यह सिखाने से इनकार करता है कि पवित्र उद्देश्य साधनों को शुद्ध कर देता है। मंदिर सुंदर था; उसकी नींव में एक दाग था; और सुलैमान का राज्य आगे उसी दाग से फटेगा।

मुख्य पात्र

सुलैमान यहाँ जटिल है, और यही उसे विश्वसनीय बनाता है। वह सचमुच परमेश्वर की महानता से चकित है: "हमारा परमेश्वर सब देवताओं में महान है।" वह जानता है कि भवन परमेश्वर को नहीं समा सकता। और साथ ही वह "यहोवा के नाम का एक भवन और अपना राजभवन" एक ही वाक्य में रखता है, दोनों परियोजनाएँ साथ-साथ, दोनों में देवदार, दोनों में मजदूर। भक्ति और महत्वाकांक्षा उसके भीतर एक ही सांस में रहती हैं, और वह स्वयं उनके बीच रेखा नहीं खींच पाता। यह हमारी भी तस्वीर है। हम परमेश्वर के लिए जो बनाते हैं, उसमें हमारा नाम भी कहीं खुदा होता है, और अक्सर हम ही आखिरी व्यक्ति होते हैं जो उसे पढ़ पाता है।

पहले सुननेवाले

इतिवृत्त निर्वासन से लौटे उन लोगों के लिए लिखा गया जिनके पास एक छोटा, फीका मंदिर था, कोई राजा नहीं, और फारस के अधीन एक कमजोर प्रांत। उन्होंने पद 9 पढ़ा, "वह बड़ा और अचम्भे के योग्य होगा," और उनके गले में गाँठ पड़ी होगी। उनके लिए यह अध्याय गौरवगाथा नहीं, बुलावा था: उपासना का ढाँचा वही है, सवेरे और साँझ की भेंट, विश्रामदिन, नियत पर्व, चाहे इमारत छोटी हो। और उन्होंने एक बात हमसे अधिक तीव्रता से सुनी: अन्यजाति राजा का वाक्य "यहोवा अपनी प्रजा से प्रेम रखता है।" जो लोग अपने आप में परमेश्वर का प्रेम देखना लगभग भूल चुके थे, उन्हें यह बाहर से याद दिलाया गया।

चिंतन

आप जो सबसे अच्छी चीज बना रहे हैं, वह किसके अनदेखे श्रम पर खड़ी है, और उस व्यक्ति को उसका "गेहूँ, जौ, तेल और दाखमधु" पूरा मिल रहा है या नहीं?

सुलैमान की तरह, आपके किस अच्छे काम में परमेश्वर का नाम और आपका नाम इतने उलझ गए हैं कि आप स्वयं अंतर नहीं कर पाते?

2 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

2 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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2 Chronicles 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 इतिहास 2 का क्या अर्थ है?
सुलैमान परमेश्वर के नाम का भवन और अपना राजभवन बनाने का निश्चय करता है, और तुरंत गिनती शुरू होती है: सत्तर हजार बोझ ढोनेवाले, अस्सी हजार पत्थर काटनेवाले, तीन हजार छः सौ मुखिए। वह सोर के राजा हीराम को संदेश भेजता है, लबानोन की देवदार लकड़ी और एक निपुण कारीगर मांगता है, और बदले में गेहूँ, जौ, दाखमधु और तेल देने का वचन देता है। हीराम उत्तर में इस्राएल के परमेश्वर को धन्य कहता है और हूराम-अबी को भेजता है, जो एक दान-वंशी माता और सोरवासी पिता का बेटा है। अध्याय उसी गिनती पर लौटता है जिससे शुरू हुआ था, अब नाम के साथ: एक लाख तिरपन हजार छः सौ परदेशी।
2 इतिहास 2 किस विषय में है?
ध्यान दें कि मंदिर बनाने के लिए कौन आता है। कारीगर हूराम-अबी आधा इस्राएली, आधा सोरवासी है; लकड़ी अन्यजाति के राजा से आती है; और वही अन्यजाति राजा सबसे स्पष्ट स्वीकारोक्ति करता है: "धन्य है इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जो आकाश और पृथ्वी का सृजनहार है।" जिस भवन में अन्यजातियों को भीतर आने की अनुमति नहीं होगी, वह अन्यजातियों के हाथों और होठों के बिना खड़ा भी नहीं हो सकता। यह सूत्र यीशु मसीह तक जाता है, जिन्होंने अपनी देह को ही मंदिर कहा और उसे तोड़कर तीन दिन में उठाया। उसके बाद पत्थर और देवदार की आवश्यकता समाप्त हो गई: अब परमेश्वर का निवास उन लोगों में है जिन्हें उन्होंने बुलाया, हर जाति से।
2 इतिहास 2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
क्या परमेश्वर ने इस श्रम को स्वीकार किया? पाठ न निंदा करता है, न बचाव। वह केवल संख्या दोहराता है, जैसे कोई बहीखाता खुला छोड़ दे। यह असहज है, क्योंकि व्यवस्था में परदेशी (इब्रानी में गेर) उस वर्ग का था जिसकी रक्षा का आदेश इस्राएल को बार-बार मिला था; वे स्वयं मिस्र में गेर रहे थे और ईंटें ढो चुके थे। और अब उनका राजा वही व्यवस्था दोहरा रहा है, इस बार परमेश्वर के नाम पर। इतिहास की पुस्तक इसे छिपाती नहीं, महिमामंडित भी नहीं करती। मुझे लगता है यह जानबूझकर है। पवित्रशास्त्र हमें यह सिखाने से इनकार करता है कि पवित्र उद्देश्य साधनों को शुद्ध कर देता है। मंदिर सुंदर था; उसकी नींव में एक दाग था; और सुलैमान का राज्य आगे उसी दाग से फटेगा।
2 इतिहास 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इतिवृत्त निर्वासन से लौटे उन लोगों के लिए लिखा गया जिनके पास एक छोटा, फीका मंदिर था, कोई राजा नहीं, और फारस के अधीन एक कमजोर प्रांत। उन्होंने पद 9 पढ़ा, "वह बड़ा और अचम्भे के योग्य होगा," और उनके गले में गाँठ पड़ी होगी। उनके लिए यह अध्याय गौरवगाथा नहीं, बुलावा था: उपासना का ढाँचा वही है, सवेरे और साँझ की भेंट, विश्रामदिन, नियत पर्व, चाहे इमारत छोटी हो। और उन्होंने एक बात हमसे अधिक तीव्रता से सुनी: अन्यजाति राजा का वाक्य "यहोवा अपनी प्रजा से प्रेम रखता है।" जो लोग अपने आप में परमेश्वर का प्रेम देखना लगभग भूल चुके थे, उन्हें यह बाहर से याद दिलाया गया।
2 इतिहास 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
सुलैमान की तरह, आपके किस अच्छे काम में परमेश्वर का नाम और आपका नाम इतने उलझ गए हैं कि आप स्वयं अंतर नहीं कर पाते?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Chronicles 2 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

मन्दिर बनाने के लिए जो कारीगर चुना गया, उसका परिचय ऐसे दिया गया: "वह एक दानी स्त्री का पुत्र है, और उसका पिता सोरवासी था।" आधा इस्राएली, आधा परदेशी। किसी की नज़र में शायद वह पूरी तरह कहीं का नहीं था, पर उसके हाथ परमेश्वर के भवन को गढ़ रहे थे। तेरी मिलीजुली कहानी तुझे अयोग्य नहीं बनाती। परमेश्वर तेरे हुनर को जानता है, और उसे बुलाने का हक़ भी रखता है।

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