बाइबल व्याख्या

2 इतिहास 27

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

एक राजा के सोलह साल इन नौ आयतों में सिमट जाते हैं। योताम पच्चीस की उम्र में गद्दी पर बैठा, उसने वही किया जो यहोवा की दृष्टि में ठीक है, मन्दिर का ऊपरवाला फाटक बनवाया, ओपेल की शहरपनाह मज़बूत की, पहाड़ी देश में नगर और जंगलों में गढ़ खड़े किए, और अम्मोनियों को हराकर तीन साल तक भारी कर वसूला। फिर एक वाक्य में उसका पूरा जीवन तौल दिया जाता है: "योताम सामर्थी हो गया, क्योंकि वह अपने आपको अपने परमेश्वर यहोवा के सम्मुख जानकर सीधी चाल चलता था।" और उसके बाद, बिना किसी चेतावनी के, आहाज।

मर्म

ध्यान दीजिए कि योताम की प्रशंसा किस अजीब तरीके से होती है: "तो भी वह यहोवा के मन्दिर में न घुसा।" यह तारीफ़ नकारात्मक है, और जानबूझकर। उसके पिता उज्जियाह ने यही सीमा लाँघी थी और कोढ़ी होकर मरा। योताम की धार्मिकता का सार यह है कि उसने वह नहीं किया जो उसके पिता ने किया। बाइबल में भलाई अक्सर इसी रूप में आती है: एक सीमा का आदर, एक दरवाज़ा जो खुला था पर जिसमें आप नहीं घुसे। परमेश्वर के सामने सीधी चाल चलना किसी महान धार्मिक उपलब्धि का नाम नहीं, बल्कि अपनी जगह जानने का नाम है। राजा मन्दिर के बाहर रहता है, याजक भीतर। यह अनुशासन ही योताम की ताक़त का स्रोत बना।

जोड़ने वाला सूत्र

इब्रानी में आयत 6 का मुहावरा है हेकीन दराखाव, "उसने अपनी चाल सँवारी, स्थिर की"। वही क्रिया मन्दिर बनाने और राज्य को स्थापित करने के लिए भी प्रयोग होती है। योताम ने जैसे शहरपनाह और गढ़ चिनवाए, वैसे ही अपना जीवन चिनवाया, पत्थर दर पत्थर, यहोवा के सामने। पर उसकी सारी चिनाई एक पीढ़ी भी नहीं टिकी; उसका बेटा आहाज सब ढहा देगा। यहीं से उस लालसा की नींव पड़ती है जो पूरे इतिहास में फैली है: ऐसा राजा जो केवल अपनी चाल सीधी न रखे, बल्कि अपनी प्रजा को भी बदल दे। योताम सीमा का आदर करता है; मसीह उस सीमा को पार करके भीतर जाते हैं, पर याजक के रूप में, और अपने लोगों को साथ ले जाते हैं।

दर्पण

"प्रजा के लोग तब भी बिगड़ी चाल चलते थे।" यह वाक्य उन सबके लिए है जो किसी के ऊपर रखे गए हैं। आप घर में ईमानदारी से जीते हैं, पर बच्चे अपनी राह चुनते हैं। आप अपनी टीम में साफ़ हिसाब रखते हैं, दफ़्तर का माहौल फिर भी सड़ा रहता है। आप समूह की अगुवाई करते हैं और लोग वही करते हैं जो वे पहले करते थे। यह पाठ आपको यह नहीं कहता कि आपकी ईमानदारी बेकार थी; यह कहता है कि वह आपकी थी, और किसी और की धार्मिकता आप नहीं बन सकते। साथ ही यह पूछता है: आपके जीवन में वह कौन सा दरवाज़ा है जिसमें घुसने का हक़ आपको नहीं, पर घुसने का अवसर है? आज ही उस एक सीमा को काग़ज़ पर लिखिए जिसे आप लाँघने के बिल्कुल क़रीब हैं, और उसे ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर के सामने स्वीकार कीजिए।

अन्तर्पाठ

2 राजा 15 में योताम का यही विवरण है, पर एक वाक्य ज़्यादा: उन दिनों यहोवा ने अराम के रसीन और इस्राएल के पेकह को यहूदा के विरुद्ध भेजना शुरू किया। इतिहास की पुस्तक यह छोड़ देती है, क्योंकि उसका ध्यान परिणाम पर नहीं, चाल पर है। दूसरा गूँजता हुआ पाठ है 2 इतिहास 26, जहाँ उज्जियाह "सामर्थी हो गया" और फिर घमण्डी होकर मन्दिर में धूप जलाने घुसा; योताम के बारे में भी ठीक वही शब्द आते हैं, "सामर्थी हो गया", पर इस बार बिना पतन के। और तीसरा: यशायाह, होशे और मीका तीनों अपनी भविष्यवाणियाँ योताम के दिनों से गिनते हैं। यानी जिस समय राजा सीधा चल रहा था, नबी चिल्ला रहे थे, क्योंकि प्रजा बिगड़ी हुई थी। मत्ती 1:9 में यही नाम मसीह की वंशावली में चुपचाप खड़ा है।

पृष्ठभूमि

आठवीं सदी ईसा पूर्व का यहूदा समृद्ध है, पर उत्तर में अश्शूर जाग रहा है। योताम पहले अपने कोढ़ी पिता के साथ सह-शासक रहा, यानी उसने सत्ता तब सँभाली जब राजमहल में एक अलग-थलग, अशुद्ध घोषित राजा रहता था। वह चेतावनी उसकी आँखों के सामने जीती-जागती थी। उसका निर्माण-कार्य राजनीतिक भी है और आध्यात्मिक भी: मन्दिर का ऊपरवाला फाटक पूजा की व्यवस्था का प्रतीक, ओपेल की शहरपनाह राजधानी की सुरक्षा, जंगलों के गढ़ व्यापार-मार्गों पर नियंत्रण। अम्मोनियों से सौ किक्कार चाँदी और हज़ारों कोर गेहूँ और जौ का कर बताता है कि यहूदा क्षेत्रीय शक्ति बन चुका था। पर ध्यान दें, वह कर केवल तीन साल आया। समृद्धि भी अस्थायी थी।

मुख्य पात्र

योताम बाइबल के उन पात्रों में है जिनके मुँह से एक शब्द भी दर्ज नहीं। कोई प्रार्थना नहीं, कोई नबी से संवाद नहीं, कोई संकट नहीं जिसमें वह टूटे। सिर्फ़ काम और एक चाल। ऐसे लोग उपदेशों में कम आते हैं, क्योंकि उनकी कहानी में नाटक नहीं होता। पर यही उसका सबसे गहरा गुण है: उसने बिना दर्शकों के, बिना किसी चमत्कार के, सोलह साल तक अपने परमेश्वर के सम्मुख अपनी चाल सँवारी। उसकी आध्यात्मिक दुनिया शायद अकेली रही होगी, एक ऐसे राजा की जो जानता था कि जिस प्रजा के लिए वह शहरपनाह बना रहा है, वह प्रजा उसके साथ नहीं चल रही। और फिर भी वह चलता रहा। यह विश्वास का सबसे कम सराहा गया रूप है: वफ़ादारी जो फल न देखकर भी नहीं रुकती।

चिंतन

आपके जीवन का कौन सा हिस्सा केवल परमेश्वर देखते हैं, और क्या वह हिस्सा उतना ही सीधा है जितना दिखने वाला हिस्सा?

योताम ने वफ़ादार रहकर भी ऐसा बेटा पाया जिसने सब बिगाड़ दिया। क्या आप परमेश्वर के सामने ऐसी आज्ञाकारिता जी सकते हैं जिसका नतीजा आपको कभी दिखाई न दे?

2 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

2 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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2 Chronicles 27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 इतिहास 27 का क्या अर्थ है?
एक राजा के सोलह साल इन नौ आयतों में सिमट जाते हैं। योताम पच्चीस की उम्र में गद्दी पर बैठा, उसने वही किया जो यहोवा की दृष्टि में ठीक है, मन्दिर का ऊपरवाला फाटक बनवाया, ओपेल की शहरपनाह मज़बूत की, पहाड़ी देश में नगर और जंगलों में गढ़ खड़े किए, और अम्मोनियों को हराकर तीन साल तक भारी कर वसूला। फिर एक वाक्य में उसका पूरा जीवन तौल दिया जाता है: "योताम सामर्थी हो गया, क्योंकि वह अपने आपको अपने परमेश्वर यहोवा के सम्मुख जानकर सीधी चाल चलता था।" और उसके बाद, बिना किसी चेतावनी के, आहाज।
2 इतिहास 27 किस विषय में है?
ध्यान दीजिए कि योताम की प्रशंसा किस अजीब तरीके से होती है: "तो भी वह यहोवा के मन्दिर में न घुसा।" यह तारीफ़ नकारात्मक है, और जानबूझकर। उसके पिता उज्जियाह ने यही सीमा लाँघी थी और कोढ़ी होकर मरा। योताम की धार्मिकता का सार यह है कि उसने वह नहीं किया जो उसके पिता ने किया। बाइबल में भलाई अक्सर इसी रूप में आती है: एक सीमा का आदर, एक दरवाज़ा जो खुला था पर जिसमें आप नहीं घुसे। परमेश्वर के सामने सीधी चाल चलना किसी महान धार्मिक उपलब्धि का नाम नहीं, बल्कि अपनी जगह जानने का नाम है। राजा मन्दिर के बाहर रहता है, याजक भीतर। यह अनुशासन ही योताम की ताक़त का स्रोत बना।
2 इतिहास 27 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इब्रानी में आयत 6 का मुहावरा है हेकीन दराखाव, "उसने अपनी चाल सँवारी, स्थिर की"। वही क्रिया मन्दिर बनाने और राज्य को स्थापित करने के लिए भी प्रयोग होती है। योताम ने जैसे शहरपनाह और गढ़ चिनवाए, वैसे ही अपना जीवन चिनवाया, पत्थर दर पत्थर, यहोवा के सामने। पर उसकी सारी चिनाई एक पीढ़ी भी नहीं टिकी; उसका बेटा आहाज सब ढहा देगा। यहीं से उस लालसा की नींव पड़ती है जो पूरे इतिहास में फैली है: ऐसा राजा जो केवल अपनी चाल सीधी न रखे, बल्कि अपनी प्रजा को भी बदल दे। योताम सीमा का आदर करता है; मसीह उस सीमा को पार करके भीतर जाते हैं, पर याजक के रूप में, और अपने लोगों को साथ ले जाते हैं।
2 इतिहास 27 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"प्रजा के लोग तब भी बिगड़ी चाल चलते थे।" यह वाक्य उन सबके लिए है जो किसी के ऊपर रखे गए हैं। आप घर में ईमानदारी से जीते हैं, पर बच्चे अपनी राह चुनते हैं। आप अपनी टीम में साफ़ हिसाब रखते हैं, दफ़्तर का माहौल फिर भी सड़ा रहता है। आप समूह की अगुवाई करते हैं और लोग वही करते हैं जो वे पहले करते थे। यह पाठ आपको यह नहीं कहता कि आपकी ईमानदारी बेकार थी; यह कहता है कि वह आपकी थी, और किसी और की धार्मिकता आप नहीं बन सकत
2 इतिहास 27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आठवीं सदी ईसा पूर्व का यहूदा समृद्ध है, पर उत्तर में अश्शूर जाग रहा है। योताम पहले अपने कोढ़ी पिता के साथ सह-शासक रहा, यानी उसने सत्ता तब सँभाली जब राजमहल में एक अलग-थलग, अशुद्ध घोषित राजा रहता था। वह चेतावनी उसकी आँखों के सामने जीती-जागती थी। उसका निर्माण-कार्य राजनीतिक भी है और आध्यात्मिक भी: मन्दिर का ऊपरवाला फाटक पूजा की व्यवस्था का प्रतीक, ओपेल की शहरपनाह राजधानी की सुरक्षा, जंगलों के गढ़ व्यापार-मार्गों पर नियंत्रण। अम्मोनियों से सौ किक्कार चाँदी और हज़ारों कोर गेहूँ और जौ का कर बताता है कि यहूदा क्षेत्रीय शक्ति बन चुका था। पर ध्यान दें, वह कर केवल तीन साल आया। समृद्धि भी अस्थायी थी।
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2 Chronicles 27 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

योताम ने अपने पिता की गलती से सीखा। उज्जियाह घमंड में मन्दिर में घुसा था, पर योताम के बारे में लिखा है, "तौभी वह यहोवा के मन्दिर में न घुसा।" उसने सीमा का आदर किया। फिर भी आगे लिखा है, "परन्तु प्रजा के लोग तब भी बिगड़े हुए थे।" राजा की भक्ति प्रजा के मन नहीं बदल सकी। आपकी प्रार्थना किसी और के लिए रास्ता खोल सकती है, पर चलना उसे खुद पड़ेगा। और आपको भी।

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