बाइबल व्याख्या

आमोस 4

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सामरिया की सुख-सम्पन्न स्त्रियों को परमेश्वर "बाशान की गायों" कहकर पुकारते हैं: मोटी, तृप्त, और अपने पतियों से माँग करती हुईं, "ला, दे हम पीएँ!" उनकी प्याली भरती है क्योंकि कंगालों का कटोरा खाली किया जाता है। इसके बाद व्यंग्य की धार और तेज़ होती है: परमेश्वर उन्हें बेतेल और गिलगाल जाकर पूजा करने का न्यौता देते हैं, पर कहते हैं "आकर अपराध करो", क्योंकि यह सब उन्हें "भाता है", परमेश्वर को नहीं। फिर पाँच बार एक ही वाक्य लौटता है, हथौड़े की तरह: अकाल, सूखा, गेरूई, महामारी, विनाश, "तो भी तुम मेरी ओर फिरकर न आए।" अंत में चेतावनी: "अपने परमेश्वर के सामने आने के लिये तैयार हो जा!"

हृदय

यह अध्याय एक असहज बात कहता है: धर्म और अन्याय एक ही जीवन में आराम से साथ रह सकते हैं। सामरिया के लोग मंदिर छोड़कर नहीं भागे थे; वे भोर को चढ़ावा लाते थे, दशमांश देते थे, स्वेच्छाबलि की चर्चा चलाकर उसका प्रचार करते थे। समस्या भक्ति की कमी नहीं, भक्ति का उद्देश्य था: वह उन्हें "भाती" थी। पूजा आत्म-तुष्टि का साधन बन गई थी, परमेश्वर की ओर मुड़ने का मार्ग नहीं। और इसीलिए पाँच बार दोहराया गया वाक्य इतना भारी है। परमेश्वर ने संकट भेजे, पर दंड देने के लिए नहीं, लौटाने के लिए। जब लौटना नहीं हुआ, तब संकट भी व्यर्थ हो गए। सबसे डरावनी बात यहाँ अकाल नहीं है; सबसे डरावनी बात यह है कि अकाल के बाद भी कुछ नहीं बदला।

मुख्य सूत्र

"तो भी तुम मेरी ओर फिरकर न आए" वह खाली जगह है जिसे पूरा इतिहास भरने की कोशिश करता है। परमेश्वर भूख, सूखा और तलवार भेजते हैं और मनुष्य नहीं मुड़ता; अंत में वे अपने पुत्र को भेजते हैं, और पुत्र पहला ही शब्द यही बोलता है, "मन फिराओ"। आमोस का न्यौता "तैयार हो जा" मसीह में दो अर्थ पाता है: वही परमेश्वर जिनके सामने खड़ा होना असहनीय है, वही मसीह में हमसे मिलने आते हैं। पद 13 में जो "पहाड़ों का बनानेवाला" और "मनुष्य को उसके मन का विचार बतानेवाला" है, वही देह धारण करके हमारे बीच चला। यही सुसमाचार की विडंबना है: जिसका आना धमकी था, उसका आना ही हमारी आशा बन गया।

दर्पण

आपका जीवन टूटा नहीं है, यही आपकी सबसे बड़ी परीक्षा हो सकती है। वेतन आता है, बच्चे स्कूल जाते हैं, रविवार को आप उपस्थित रहते हैं, और आपको यह सब "भाता" है। पूछिए: आपकी सुविधा की कीमत कौन चुका रहा है? वह घरेलू सहायिका जिसका वेतन आपने तीन साल से नहीं बढ़ाया? वह कर्मचारी जिसे आप "फैमिली" कहते हैं पर छुट्टी नहीं देते? और जब जीवन में झटके आए, बीमारी, नौकरी का जाना, रिश्ते का टूटना, आपने क्या किया? ज़्यादातर हम मरम्मत करते हैं, मुड़ते नहीं। हम प्रार्थना बढ़ा देते हैं जब तक संकट टलता है, और फिर पुरानी पटरी पर लौट आते हैं। आमोस कहता है, यह लौटना नहीं है।

आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसकी मेहनत से आपका आराम चलता है और जिसे आप कम दे रहे हैं, और उसके नीचे वह एक ठोस राशि या कदम लिखिए जो आप इस महीने बदलेंगे।

अंतर्पाठ

यशायाह 1 में परमेश्वर वही बात कहते हैं, और भी सीधी: बलिदानों से वे थक गए हैं, और समाधान है "अनाथ का न्याय चुकाओ, विधवा का मुक़द्दमा लड़ो।" आमोस और यशायाह मिलकर एक ही चेतावनी देते हैं: उपासना कभी अन्याय का ढक्कन नहीं बन सकती। दूसरी ओर लूका 13 में यीशु उन लोगों की बात करते हैं जिन पर मीनार गिरी, और कहते हैं कि वे दूसरों से बड़े पापी नहीं थे; पर "यदि मन न फिराओगे तो तुम सब भी इसी रीति से नाश होगे।" वही तर्क, वही करुणा। आपदा स्वयं उत्तर नहीं देती; वह एक प्रश्न पूछती है। आमोस का इस्राएल पाँच बार वह प्रश्न सुनकर भी चुप रहा।

मुख्य पात्र

यहाँ मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और वे हमें असहज करते हैं। वे व्यंग्य करते हैं, शपथ खाते हैं, गायों का रूपक चुनते हैं जो अपमानजनक है। पर उनके क्रोध के भीतर एक ज़िद है जो प्रेम की है: पाँच बार वे कोशिश करते हैं। पाँच बार दरवाज़ा खटखटाते हैं। वे उन्हें "आग से निकाली हुई लकड़ी के समान" छोड़ते हैं, अर्थात् जलने से पहले खींच लेते हैं। यह वह परमेश्वर नहीं है जो सज़ा देकर संतुष्ट हो जाता है; यह वह परमेश्वर है जो मुड़ाव चाहता है और उसके न होने पर घायल होता है। और पद 13 याद दिलाता है कि यह कोई स्थानीय देवता नहीं: वह मनुष्य के मन के विचार जानता है, और उसका नाम "सेनाओं का परमेश्वर यहोवा" है।

पृष्ठभूमि

आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तरी राज्य इस्राएल, यारोबाम द्वितीय का शासन। सीमाएँ सुरक्षित थीं, व्यापार फल-फूल रहा था, सामरिया पर्वत पर हाथीदाँत से सजे घर बन रहे थे। बेतेल और गिलगाल राजकीय पूजा-स्थल थे, जहाँ धर्म और राष्ट्रीय गर्व एक हो गए थे। समृद्धि को ईश्वरीय अनुमोदन माना जाता था। इसी बीच छोटे किसान कर्ज़ में डूबकर अपनी ज़मीन और स्वतंत्रता खो रहे थे। आमोस बाहर का आदमी था, दक्षिण यहूदा से आया चरवाहा, जिसका कोई भविष्यद्वक्ता-वंश नहीं था। उसने राजधानी के धार्मिक केंद्र में खड़े होकर वह कहा जो कोई दरबारी नहीं कहता। तीस साल बाद अश्शूर आया और सामरिया मिट गया।

चिंतन

पिछले पाँच वर्षों में आपके जीवन में कौन सा झटका आया, और उसने आपको वास्तव में बदला या आपने केवल व्यवस्था सुधार ली?

आपकी उपासना में क्या ऐसा है जो मुख्यतः इसलिए है कि वह आपको "भाता" है?

Amos में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Amos

Alec Motyer

The lion roars: God's passion for justice preached without compromise.

Joel and Amos: An Introduction and Commentary

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Hosea, Amos, Micah

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Amos 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

आमोस 4 का क्या अर्थ है?
सामरिया की सुख-सम्पन्न स्त्रियों को परमेश्वर "बाशान की गायों" कहकर पुकारते हैं: मोटी, तृप्त, और अपने पतियों से माँग करती हुईं, "ला, दे हम पीएँ!
आमोस 4 किस विषय में है?
"तो भी तुम मेरी ओर फिरकर न आए" वह खाली जगह है जिसे पूरा इतिहास भरने की कोशिश करता है। परमेश्वर भूख, सूखा और तलवार भेजते हैं और मनुष्य नहीं मुड़ता; अंत में वे अपने पुत्र को भेजते हैं, और पुत्र पहला ही शब्द यही बोलता है, "मन फिराओ"। आमोस का न्यौता "तैयार हो जा" मसीह में दो अर्थ पाता है: वही परमेश्वर जिनके सामने खड़ा होना असहनीय है, वही मसीह में हमसे मिलने आते हैं। पद 13 में जो "पहाड़ों का बनानेवाला" और "मनुष्य को उसके मन का विचार बतानेवाला" है, वही देह धारण करके हमारे बीच चला। यही सुसमाचार की विडंबना है: जिसका आना धमकी था, उसका आना ही हमारी आशा बन गया।
आमोस 4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसकी मेहनत से आपका आराम चलता है और जिसे आप कम दे रहे हैं, और उसके नीचे वह एक ठोस राशि या कदम लिखिए जो आप इस महीने बदलेंगे।
आमोस 4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहाँ मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और वे हमें असहज करते हैं। वे व्यंग्य करते हैं, शपथ खाते हैं, गायों का रूपक चुनते हैं जो अपमानजनक है। पर उनके क्रोध के भीतर एक ज़िद है जो प्रेम की है: पाँच बार वे कोशिश करते हैं। पाँच बार दरवाज़ा खटखटाते हैं। वे उन्हें "आग से निकाली हुई लकड़ी के समान" छोड़ते हैं, अर्थात् जलने से पहले खींच लेते हैं। यह वह परमेश्वर नहीं है जो सज़ा देकर संतुष्ट हो जाता है; यह वह परमेश्वर है जो मुड़ाव चाहता है और उसके न होने पर घायल होता है। और पद 13 याद दिलाता है कि यह कोई स्थानीय देवता नहीं: वह मनुष्य के मन के विचार जानता है, और उसका नाम "सेनाओं का परमेश्वर यहोवा" है।
आमोस 4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले पाँच वर्षों में आपके जीवन में कौन सा झटका आया, और उसने आपको वास्तव में बदला या आपने केवल व्यवस्था सुधार ली?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Amos 4 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

बेतेल को आकर अपराध करो, और गिलगाल में आकर बहुतायत से अपराध करो!" परमेश्वर यहाँ व्यंग्य कर रहे हैं। लोग भोर होते ही बलिदान ले आते थे, दशमांश भी समय पर देते थे, पर गरीब को कुचलते थे। उनकी आराधना ही उनका पाप बन गई थी। सोचो, कहीं तुम्हारी नियमित भक्ति भी किसी अनदेखे अन्याय को ढकने का परदा तो नहीं बन गई?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

तो भी तुम मेरी ओर न फिरे," यहोवा की यह वाणी है। यही एक वाक्य अध्याय में बार-बार लौटता है, जैसे कोई पिता थककर भी पुकारना न छोड़े। बारियाँ सूखीं, अंजीर टिड्डियाँ खा गईं, पर परमेश्वर को फसल की नहीं, तेरे लौटने की चिंता थी। सोच, जो नुकसान तुझे अभी खल रहा है, कहीं वह घर का दरवाज़ा तो नहीं?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 3

पिता, धन्यवाद कि आप चुप नहीं रहते। जब सुख और आराम में हमारा मन कठोर होने लगता है, आप साफ़ शब्दों में चेतावनी देते हैं, "यहोवा की यह वाणी है।" धन्यवाद कि यह चेतावनी आज हमारे कानों तक पहुँची है, ताकि हम समय रहते लौट आएँ और दीन लोगों की सुध लें।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

प्यास ने उन्हें चलाया, एक नगर से दूसरे नगर तक, पर तृप्ति कहीं न मिली। पाँव तो हिले, मन न फिरा। परमेश्वर कहते हैं, "तो भी तुम मेरी ओर न फिरे।" कभी-कभी हमारी अधूरी प्यास कोई सज़ा नहीं, बुलाहट होती है। तू किस-किस कुएँ पर दौड़ रहा है, जबकि जीवित जल देनेवाला तेरे लौटने की बाट जोह रहा है?

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