सभोपदेशक 4
पाठ
सुलैमान सूर्य के नीचे चारों ओर देखता है और तीन दृश्य गिनता है। पहले, अत्याचार सहनेवालों के आँसू, जिन्हें दिलासा देनेवाला कोई नहीं। फिर, पड़ोसी से जलन के कारण की गई सारी मेहनत, जो "वायु को पकड़ना" है, और वह अकेला आदमी जिसके पास न बेटा है न भाई, फिर भी कमाना बंद नहीं करता। तीसरे, वह गरीब पर बुद्धिमान लड़का जो जिद्दी बूढ़े राजा से बेहतर है, पर जिसकी लोकप्रियता भी एक पीढ़ी में मिट जाती है। बीच में एक अलग सुर उठता है: दो एक से अच्छे हैं, गिरनेवाले को उठानेवाला चाहिए, और तीन तागे की डोरी जल्दी नहीं टूटती।
मर्म
ध्यान दें कि पहली आयत में एक वाक्य दो बार आता है: "उनको कोई शान्ति देनेवाला नहीं।" पहली बार पीड़ितों के लिए, दूसरी बार अत्याचारियों के लिए। यह दोहराव संयोग नहीं है। सुलैमान कह रहा है कि सत्ता के इस खेल में दोनों पक्ष खाली हाथ हैं; जिसके हाथ में शक्ति है वह भी बिना दिलासे का है। यही इस अध्याय का धर्मशास्त्रीय हृदय है: सूर्य के नीचे की दुनिया दिलासे पैदा नहीं कर सकती। न अत्याचार से, न परिश्रम से, न धन से, न राजनीतिक उत्थान से। मनुष्य के पास दिलासे का कोई घरेलू स्रोत नहीं है। अगर सांत्वना आएगी, तो वह बाहर से आनी होगी, ऊपर से, सूर्य के परे से।
सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में यह खाली जगह भरी जाती है। यशायाह में परमेश्वर कहते हैं कि वे अपनी प्रजा को शान्ति देंगे, और यीशु नासरत की सभा में खड़े होकर वही खंड पढ़कर कहते हैं कि यह आज पूरा हुआ। जो दिलासा सुलैमान को कहीं नहीं मिला, वह एक व्यक्ति में शरीर धारण करता है। और यूहन्ना में प्रभु पवित्र आत्मा को "सहायक", दिलासा देनेवाला कहते हैं, जो सदा रहेगा। सुलैमान की यह शिकायत इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह किसी सस्ते समाधान से इनकार करती है। वह जगह खाली छोड़ देती है, और सुसमाचार उसमें कोई सिद्धांत नहीं, एक चेहरा रखता है, जो पीड़ित के आँसुओं में भी बहा और अत्याचारी के लिए भी मरा।
दर्पण
आयत 4 चुभती है: सारा परिश्रम "अपने पड़ोसी से जलन के कारण।" ईमानदारी से पूछिए, आपकी पिछली बड़ी मेहनत का असली ईंधन क्या था? किसी सहकर्मी की तरक्की? रिश्तेदार का नया घर? किसी और के बच्चों के अंक? और आयत 8 का आदमी शायद सबसे डरावना है: वह कभी नहीं पूछता, "मैं किसके लिये परिश्रम करता हूँ?" यह सवाल न पूछना ही उसका अभिशाप है। हम भी व्यस्तता को इसलिए पालते हैं कि वह हमें यह सवाल पूछने से बचा लेती है। और आयत 6 की "चैन के साथ एक मुट्ठी" हमारी दो थकी मुट्ठियों पर हँसती है।
आज ही करें: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखें जिससे आप भीतर ही भीतर तुलना करते हैं, नाम के नीचे लिखें "मैं किसके लिये परिश्रम करता हूँ", और वह कागज़ हाथ में लेकर प्रभु से एक वाक्य में क्षमा माँगें।
पृष्ठभूमि
पहले सुननेवाले इस्राएली थे जो राजाओं के अधीन जीते थे, जहाँ अत्याचार अमूर्त विचार नहीं था बल्कि कर वसूलनेवाले का दरवाज़े पर आना था। उनकी दुनिया में परिवार ही सुरक्षा था; "न उसके बेटा है, न भाई है" सुनकर उनके रोंगटे खड़े हो जाते, क्योंकि बिना बेटे और भाई के आदमी का अर्थ था विरासत का अंत, वृद्धावस्था में कोई सहारा नहीं, कब्र पर कोई नाम लेनेवाला नहीं। आयत 11 की बात भी काव्य नहीं, व्यवहार थी: रात में ठंडी पहाड़ी में एक चादर के नीचे दो लोग गर्म रहते थे, अकेला काँपता था। और आयत 13-14 में बंदीगृह से निकलकर राजा बननेवाले की बात सुनकर उन्हें यूसुफ याद आता, पर सुलैमान उस कहानी का भी अंत मुरझाया हुआ बताता है।
विवरण
"जो डोरी तीन तागे से बटी हो वह जल्दी नहीं टूटती।" यह अकेला वाक्य है जिसे शादी के कार्डों पर छाप दिया गया है, और उसका असली बल खो गया है। संदर्भ देखिए: यहाँ बात प्रेम की नहीं, टूटने की है। सुलैमान गिनती बढ़ाता जाता है, एक, दो, तीन, क्योंकि वह जानता है कि अकेला तागा टूटेगा ही। यह कोमल नहीं, यथार्थवादी वाक्य है। और ध्यान दें, तीसरा तागा नामरहित है; सुलैमान यह नहीं कहता कि वह कौन है। मसीही पाठक के लिए यह चुप्पी सार्थक है: कलीसिया की हर बटी हुई रस्सी में एक तीसरा है जिसने कहा कि जहाँ दो या तीन इकट्ठे हैं, वहाँ वे बीच में हैं।
प्रश्न
पर आयत 2-3 को मीठा नहीं किया जा सकता। सुलैमान कहते हैं कि मरे हुए जीवितों से धन्य हैं, और उनसे भी अच्छा वह है जो कभी जन्मा ही नहीं। यह वचन परमेश्वर के वचन में है, और यह जीवन के विरुद्ध बोलता है। क्या हम इसे बस "मानवीय दृष्टिकोण" कहकर टाल दें? नहीं। यह उस आदमी की गवाही है जिसने अत्याचार को खुली आँखों देखा और झूठ बोलने से इनकार किया। बाइबल दर्द को नकारने की माँग नहीं करती। पर वह हमें यहाँ रुकने भी नहीं देती: वह मसीह की ओर बढ़ती है, जिसने जन्म न लेने का रास्ता नहीं चुना, बल्कि इसी सूर्य के नीचे आकर आँसू और क्रूस दोनों सहे। मौन में यही अंतर है।
चिंतन
आयत 8 का आदमी अपने से यह सवाल कभी नहीं पूछता: "मैं किसके लिये परिश्रम करता हूँ?" आपके जीवन में कौन-सी व्यस्तता है जो आपको इस सवाल से बचा रही है?
पहली आयत दो बार कहती है, "उनको कोई शान्ति देनेवाला नहीं।" आपके आसपास वह कौन है जिसके लिए इस हफ्ते आप ही वह दिलासा देनेवाला बन सकते हैं?
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Ecclesiastes 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
सभोपदेशक 4 का क्या अर्थ है?
सभोपदेशक 4 किस विषय में है?
सभोपदेशक 4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
सभोपदेशक 4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सभोपदेशक 4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ecclesiastes 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब उपदेशक ने कहा कि मरे हुए जीवितों से अधिक धन्य हैं, तब उसके पास कोई शान्ति देनेवाला न था। धन्यवाद कि आप वही शान्ति देनेवाले हैं जो हमारे आँसू गिनते हैं और सबसे भारी दिनों में भी हमें थामे रखते हैं।
पिता, लोगों की तालियाँ कितनी जल्दी थम जाती हैं, और नाम भी भुला दिए जाते हैं। मुझे बचा ले उस दौड़ से जहाँ मैं दूसरों की वाहवाही के लिए जीता हूँ। मेरा मन तेरी नज़र में ठहरे, क्योंकि जो तू देखता है वही सच में बना रहता है।
चैन के साथ एक मुट्ठी उससे अच्छी है, जो दोनों मुट्ठी परिश्रम और व्यर्थ के कामों से भरी हों।" सुलैमान ने देखा कि लोग जलन के कारण दिन रात दौड़ते हैं। दोनों हाथ भरे हैं, पर मन खाली है। तेरी एक मुट्ठी कम लग सकती है, फिर भी उसमें नींद है, हँसी है, अपनों के साथ बैठने का समय है। सोच, तू किस चीज़ के पीछे दौड़ रहा है, और क्या खो रहा है?
फिर यदि दो एक साथ सोएँ तो वे गर्म होंगे, परन्तु कोई अकेला कैसे गर्म हो सकता है?" ठंडी रात में यात्री अपनी चादर बाँट लेते थे। ध्यान दो, यहाँ कोई किसी को गर्मी देता नहीं, दोनों एक दूसरे से गर्म होते हैं। तुम्हें सिर्फ किसी की मदद नहीं चाहिए, तुम्हें पास चाहिए। किससे तुमने अपनी ठंडी रात छिपा रखी है?
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