सभोपदेशक 5:1
पाठ
मन्दिर की ओर जाती हुई सीढ़ियाँ, और उन पर चढ़ता हुआ एक आदमी। उपदेशक उसे रोकता है और कहता है: "जब तू परमेश्वर के भवन में जाए, तब सावधानी से चलना।" यह वाक्य किसी शिष्टाचार की सीख नहीं, बल्कि पाँव पर रखा हुआ हाथ है। फिर वह तराजू पर दो चीज़ें रखता है और तौलता है: एक ओर सुनने के लिये चुपचाप पास जाना, दूसरी ओर मूर्खों का बलिदान चढ़ाना। तराजू एक ही ओर झुकता है। और आख़िरी पंक्ति सबसे चुभती है: "क्योंकि वे नहीं जानते कि बुरा करते हैं।" जो लोग भेड़ लेकर, गीत गाते हुए, पूरे विश्वास के साथ भीतर जा रहे हैं, उन्हें ख़बर तक नहीं कि वे परमेश्वर के आँगन में पाप कर रहे हैं।
मर्म
यहाँ धर्म का सबसे ख़तरनाक रूप बेनक़ाब होता है: वह भक्ति जो बोलती बहुत है और सुनती बिलकुल नहीं। बलिदान बुरी चीज़ नहीं थी; परमेश्वर ने ही उसे ठहराया था। परन्तु मनुष्य के हाथ में हर पवित्र वस्तु सौदेबाज़ी में बदल सकती है, जैसे कहा जा रहा हो, "मैंने अपना हिस्सा चुका दिया, अब आप अपना दीजिए।" उपदेशक कहता है कि ऐसा उपासक स्वयं को धर्मी समझते हुए भीतर घुसता है और अनजाने में बुराई करता है, और यही अनजानापन उसका सबसे गहरा घाव है। परमेश्वर के भवन में जाने का अर्थ है किसी ऐसे के सामने खड़ा होना जो देता है, माँगता नहीं। इसलिए वहाँ पहला काम अर्पण नहीं, ध्यान है; पहला अंग हाथ नहीं, कान है। अगली आयत इसे और खोल देती है: "परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिए तेरे वचन थोड़े ही हों।"
सूत्र
इस चेतावनी के पीछे इस्राएल का पूरा इतिहास खड़ा है। परमेश्वर ने अपनी प्रजा को सबसे पहले जो आज्ञा दी थी, वह चढ़ाने की नहीं, सुनने की थी: "हे इस्राएल सुन।" वाचा का आरम्भ ही कान से होता है, क्योंकि परमेश्वर पहले बोलते हैं और मनुष्य उत्तर देता है। जब यह क्रम उलट जाता है, जब मनुष्य पहले बोलने लगता है और परमेश्वर को सुनने वाला बना देता है, तब उपासना धीरे-धीरे सौदे में बदल जाती है। भविष्यद्वक्ता इसी उलटे क्रम पर चिल्लाते रहे: बलिदानों से भरे आँगन और बहरे हृदय। और अन्त में परमेश्वर ने वही किया जो इस आयत की माँग है, उन्होंने स्वयं आकर बोला। यीशु मसीह मन्दिर में आए, बेचने वालों को बाहर निकाला, और स्वयं वह बलिदान बन गए जिसे कोई दोहरा नहीं सकता। इसलिए अब हम मन्दिर में हाथ भरकर नहीं, कान खोलकर जाते हैं।
दर्पण
रविवार की सुबह पर सोचिए। गाड़ी की चाबी, देर हो रही है, रास्ते में बच्चों को डाँट, और भीतर घुसते ही गीत के शब्द होंठों पर, जबकि मन अभी भी सोमवार की मीटिंग में अटका है। हम गाते हैं, हाथ उठाते हैं, चढ़ावा डालते हैं, प्रार्थना में लम्बे वाक्य बोलते हैं, और फिर वैसे ही बाहर निकल आते हैं जैसे भीतर गए थे। कुछ भी टूटा नहीं, कुछ भी बदला नहीं। सबसे भयावह बात यह नहीं कि हम ग़लत करते हैं, बल्कि यह कि हमें अच्छा लगता है। जो सभा चलाते हैं, उनके लिए यह और तीखा है: आप हर सप्ताह वचन तैयार करते हैं, पर कब आख़िरी बार वचन ने आपको तैयार किया? आज ही करें: बाइबल का एक छोटा अंश पढ़कर पाँच मिनट चुपचाप बैठिए, कुछ माँगे बिना, और उसके बाद एक ही वाक्य लिखिए जो आपने सुना।
प्रश्न
अगर मूर्ख "नहीं जानते कि बुरा करते हैं," तो मैं कैसे जानूँ कि मैं उनमें नहीं हूँ? यही इस आयत का काँटा है। जो पाप हमें दिखता है, उसकी हम तौबा कर सकते हैं; पर यह पाप अपनी अनदेखेपन में ही जीता है, और भक्ति की पोशाक पहनकर घूमता है। भीतर से इसकी जाँच सम्भव नहीं, क्योंकि जाँच करने वाला मन ही धोखा खाया हुआ है। उपदेशक कोई तसल्ली नहीं देता, वह बस एक दरवाज़ा खुला छोड़ता है: सुनना। जब आप सचमुच सुनते हैं, तब वचन आपको वहाँ छूता है जहाँ आपकी नज़र नहीं पहुँचती। इसका अर्थ है कि आत्म-परीक्षा से ज़्यादा भरोसेमंद है परमेश्वर के सामने चुप बैठना, और यह स्वीकार करना कि मेरी सबसे बड़ी समस्या शायद वही है जो मुझे अभी दिख नहीं रही।
एक बारीकी
"सुनने के लिये समीप जाना" पर रुकिए। इब्रानी में समीप आने की क्रिया है क़ाराव, और इसी जड़ से बना है वह शब्द क़ुरबान, जिसका अर्थ है चढ़ावा। बलिदान का पूरा विचार ही यही था: कुछ लेकर परमेश्वर के निकट आना। अब उपदेशक इसी शब्द को घुमा देता है। वह कहता है, निकट तो आओ, पर हाथ में भेड़ नहीं, कान लेकर आओ। तुम स्वयं ही चढ़ावा हो। यह छोटी-सी अदला-बदली पूरी उपासना का ढाँचा बदल देती है: परमेश्वर के पास आने का सबसे सच्चा तरीक़ा वह नहीं जिसमें मैं कुछ थमाता हूँ, बल्कि वह जिसमें मैं खुला खड़ा रहता हूँ।
अन्तर्पाठ
शमूएल ने शाऊल से यही कहा था जब वह लूट के पशु बलि के लिए बचा लाया: आज्ञा मानना बलिदान से भला है, और ध्यान देना मेढ़ों की चर्बी से। शाऊल को सचमुच लगा था कि उसने भक्ति की है; उसे मालूम ही नहीं था कि वह बुरा कर रहा है, ठीक उपदेशक के मूर्खों की तरह। और यीशु ने इसी सीढ़ी को अन्तिम न्याय तक बढ़ा दिया, जब उन्होंने उन लोगों की बात की जो "हे प्रभु, हे प्रभु" कहेंगे और चमत्कारों की सूची गिनाएँगे, पर उत्तर मिलेगा कि मैंने तुम्हें कभी जाना ही नहीं। दोनों जगह वही चेतावनी है: धार्मिक सक्रियता ईश्वर से निकटता का प्रमाण नहीं। सुनने वाला कान ही प्रमाण है।
मनन
आपकी पिछली प्रार्थना में आपके शब्दों और आपकी चुप्पी का अनुपात क्या था, और वह अनुपात परमेश्वर के बारे में आपकी किस धारणा को खोलता है?
यदि इस रविवार आपको केवल सुनने के लिए जाना हो, कुछ गाए, कहे या दिए बिना, तो भीतर क्या बेचैनी उठेगी, और वह बेचैनी किस बात की ओर इशारा करती है?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Ecclesiastes 5:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
सभोपदेशक 5:1 का क्या अर्थ है?
सभोपदेशक 5:1 किस विषय में है?
सभोपदेशक 5:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
सभोपदेशक 5:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सभोपदेशक 5:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ecclesiastes 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जब सम्पत्ति बढ़ती है, तो उसके खानेवाले भी बढ़ जाते हैं; और उसके स्वामी को इससे क्या लाभ, सिवाय इसके कि वह उसे अपनी आँखों से देखता रहे?" सुलैमान के पास सब कुछ था, फिर भी उसने पाया कि बहुत सारा धन केवल देखने के लिए रह जाता है। जो तू जोड़ रहा है, क्या तू उसे सचमुच भोग रहा है, या बस पहरा दे रहा है? परमेश्वर के हाथ से मिली रोटी खाने में जो चैन है, वह तिजोरी में नहीं मिलता।
जो व्यक्ति परमेश्वर के दिए हुए को खाता, पीता और अपने परिश्रम में सुख पाता है, उसके बारे में सुलैमान कहता है, "परमेश्वर उसे उसके मन के आनन्द में लगाए रखता है।" ध्यान दे, यह आनन्द दिनों की गिनती भुला देता है। जो मन कड़वाहट और हिसाब में उलझा है, वह हर बीता दिन गिनता रहता है। आज तेरी थाली में जो सादा रोटी है, क्या तू उसे परमेश्वर का उपहार मानकर खा सकता है?
राजा सिंहासन पर बैठता है, मुकुट पहनता है, आज्ञा देता है। पर उसकी थाली में रोटी किसी किसान के पसीने से आती है। "राजा भी खेत से लाभ उठाता है।"
कोई इतना ऊँचा नहीं जो मिट्टी पर निर्भर न हो। और मिट्टी परमेश्वर की है।
जिस काम को तू छोटा समझकर करता है, कहीं ऐसा न हो कि उसी पर किसी का जीवन टिका हो। और जो तेरे पास है, वह भी किसी के हाथों से आया है, तेरी योग्यता से नहीं।
जब तू परमेश्वर के लिये मन्नत माने, तब उसे पूरी करने में विलम्ब न करना; क्योंकि वह मूर्खों से प्रसन्न नहीं होता। जो मन्नत तू ने मानी है उसे पूरी करना।" संकट की घड़ी में मुँह से निकली बातें याद हैं? "प्रभु, बस इस बार बचा ले, फिर मैं..." राहत मिल गई, और वादा वहीं छूट गया। परमेश्वर भूलता नहीं। आज उसके सामने बैठ, और जो कहा था उसे पूरा कर।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें