निर्गमन 5
पाठ
मूसा और हारून पहली बार फ़िरौन के दरबार में खड़े होते हैं और परमेश्वर का संदेश रखते हैं: "मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे, कि वे जंगल में मेरे लिये पर्व करें।" फ़िरौन इनकार करता है, और उससे भी बढ़कर, वह बदला लेता है: ईंटों की गिनती वही रहेगी, पर पुआल अब वह नहीं देगा। इस्राएली सारे मिस्र में भूसा बटोरने बिखर जाते हैं, उनके सरदार मार खाते हैं, और अंत में वही लोग मूसा को कोसते हैं जिनके छुटकारे के लिये वह आया था। अध्याय एक शिकायत पर बंद होता है, मूसा की शिकायत परमेश्वर से: "तूने अपनी प्रजा का कुछ भी छुटकारा नहीं किया।"
मर्म
"यहोवा कौन है कि मैं उसका वचन मानकर इस्राएलियों को जाने दूँ?" फ़िरौन का यह सवाल पूरी निर्गमन-पुस्तक का सवाल बन जाता है, और विडंबना यह है कि वह इसे तिरस्कार में पूछता है, पर परमेश्वर इसे गंभीरता से लेते हैं। शेष अध्याय इसी प्रश्न का उत्तर हैं, धीरे-धीरे, दस बार, समुद्र के किनारे तक। यहाँ मर्म यह है: परमेश्वर के वचन के आने पर हालात पहले बिगड़ते हैं। मुक्ति की पहली आवाज़ राहत नहीं लाती, वह टकराव लाती है। हम चाहते हैं कि परमेश्वर का हस्तक्षेप सीधी रेखा में सुधार हो; यह पाठ उस चाह को तोड़ता है और खुला छोड़ देता है कि क्यों। पाठ इसका उत्तर नहीं देता। वह केवल कहता है: ऐसा हुआ, और परमेश्वर इसके भीतर ही काम कर रहे थे।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि फ़िरौन क्या इनकार करता है: श्रम से नहीं, आराधना से छुट्टी। "पर्व करें", "बलिदान करें" यही माँग है। दासता का असली घाव यह नहीं कि लोग थके हैं, बल्कि कि उनके पास परमेश्वर के लिये समय नहीं है। छुटकारा हमेशा किसी चीज़ से और किसी के लिये होता है; इस्राएल मिस्र से निकलता है ताकि सीनै पर परमेश्वर के सामने खड़ा हो सके। यही सूत्र क्रूस तक चलता है। मसीह भी उस रास्ते से गुज़रे जहाँ आज्ञाकारिता ने पहले चीज़ों को बिगाड़ा, जहाँ पिता की भेजी हुई सेवा में उन्होंने पूछा, "हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" मूसा की शिकायत उसी परंपरा की शुरुआत है: परमेश्वर के भेजे हुए लोग अक्सर पहले भार उठाते हैं, फिर जय देखते हैं।
दर्पण
आपने कभी परमेश्वर की आज्ञा मानी और पाया कि उससे सब कुछ कठिन हो गया? आपने सच बोला और दफ़्तर में अलग-थलग पड़ गए। आपने किसी रिश्ते में क्षमा का पहला कदम लिया और जवाब में और ठंडापन मिला। आपने पैसे के मामले में ईमानदारी चुनी और अब हिसाब पूरा नहीं बैठता। इस्राएली सरदारों की तरह हमारे भीतर भी वही आवाज़ उठती है: यह जो हमें बुला रहा है, इसी ने हमें मुश्किल में डाला। और यह पाठ उस आवाज़ को दबाता नहीं। वह उसे दर्ज करता है, इस्राएल की गाली और मूसा का प्रश्न दोनों बाइबल में सुरक्षित हैं। परमेश्वर ऐसी शिकायतों से नाराज़ होकर मुँह नहीं मोड़ते। पर वे तुरंत समझाते भी नहीं। बीच का यह समय, जहाँ ईंटें बढ़ती हैं और उत्तर नहीं आता, विश्वास का असली मैदान है।
प्रसंग
यह ईसा-पूर्व दूसरी सहस्राब्दी का मिस्र है, दुनिया की सबसे संगठित शक्ति। फ़िरौन केवल राजा नहीं, देवता माना जाता था; उसके सामने "इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यह कहता है" कहना राजद्रोह के बराबर था। ईंट बनाना नील की मिट्टी और कटे भूसे का काम था: भूसा मिट्टी को बाँधता और सूखने पर दरार से बचाता। पुआल छीनकर गिनती वही रखना कोई मनमानी क्रूरता नहीं थी, यह हिसाब से किया गया दमन था, ताकि लोगों के पास सोचने, संगठित होने, आशा करने का समय ही न बचे। और व्यवस्था चतुर थी: मार इस्राएली सरदारों पर पड़ती है, अपने ही लोगों के मुखिया पर। दमन तब सबसे गहरा होता है जब वह पीड़ितों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देता है।
श्रोता
जिन्होंने यह वृत्तांत पहली बार सुना, वे जंगल में चलने वाली पीढ़ी थे, या बाद में बेबीलोन की बंधुआई में बैठे लोग। उनके लिये यह अध्याय पुराना इतिहास नहीं, आत्म-परिचय था। वे जानते थे कि छुटकारे की घोषणा और छुटकारे के अनुभव के बीच एक लंबा, अंधेरा गलियारा होता है। उन्होंने यह भी सुना जो हम अक्सर चूक जाते हैं: फ़िरौन इस्राएलियों को "आलसी" कहता है, इब्रानी में निर्पीम, "ढीले पड़े हुए"। साम्राज्य आराधना की चाह को कामचोरी के रूप में पढ़ता है। जो लोग सब्त की आज्ञा पाकर जीने लगे थे, उनके कानों में यह गहरा उतरा: संसार तुम्हारे परमेश्वर के लिये रखे गए समय को हमेशा आलस्य कहेगा।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का केंद्रीय मनुष्य मूसा है, और वह चमकता नहीं। वह चालीस साल भेड़ें चराने के बाद बड़ी झिझक से भेजा गया था, और पहला ही प्रयास विफल होता है। पर देखिए वह कहाँ जाता है: "तब मूसा ने यहोवा के पास लौटकर कहा, 'हे प्रभु, तूने इस प्रजा के साथ ऐसी बुराई क्यों की? और तूने मुझे यहाँ क्यों भेजा?'" वह भागता नहीं, वह भूमिका नहीं छोड़ता, वह परमेश्वर के मुँह पर अपना आरोप रखता है। यह अविश्वास नहीं; यह उस आदमी की प्रार्थना है जो परमेश्वर को इतना सच मानता है कि उनसे लड़ सकता है। और अध्याय यहीं रुक जाता है, बिना उत्तर, बिना सांत्वना। कभी-कभी विश्वास का सबसे ईमानदार रूप यही होता है: प्रश्न लेकर उसी दरवाज़े पर लौट आना जिसने हमें भेजा था।
चिंतन
जिस आज्ञाकारिता के बाद आपकी परिस्थिति बिगड़ी, क्या आप उसे परमेश्वर के सामने शिकायत बनाकर रख सके, या आपने चुपचाप उन पर भरोसा करना छोड़ दिया?
आपके जीवन में कौन या क्या आपके आराधना के समय को "आलस्य" कहता है, और आप उसका उत्तर कैसे देते हैं?
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Exodus 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Exodus 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
धन्यवाद प्रभु, कि मूसा जब निराशा में तुझसे कह उठा, "तूने अपनी प्रजा को कुछ भी नहीं छुड़ाया," तब भी तूने उसे ठुकराया नहीं। तेरा धन्यवाद कि मेरी शिकायतें और उलझनें भी तुझसे कहने की छूट मुझे है, और तू सुनता है।
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