बाइबल व्याख्या

यहेजकेल 46

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

यहेजकेल के मन्दिर-दर्शन का यह अध्याय दरवाज़ों, बलियों और सीढ़ियों के बारे में है। भीतरी आँगन का पूर्वी फाटक छहों कामकाजी दिन बन्द रहेगा और केवल विश्रामदिन और नये चाँद के दिन खुलेगा; प्रधान उसके ओसारे तक आएगा, डेवढ़ी पर दण्डवत् करेगा और उसी रास्ते लौट जाएगा। साधारण लोग उत्तरी फाटक से आकर दक्षिणी से निकलेंगे, कभी उसी दरवाज़े से पीछे नहीं मुड़ेंगे। हर सुबह एक निर्दोष मेम्ना, तेल और मैदा चढ़ाया जाएगा। और फिर अचानक भूमि का कानून: प्रधान प्रजा की निज भूमि अंधेर से नहीं छीन सकता। अन्त में यहेजकेल को आँगन के कोनों की रसोइयाँ दिखाई जाती हैं, जहाँ बलिदानों का माँस पकाया जाएगा।

मर्म

इस अध्याय का धड़कता हुआ केन्द्र एक शब्द है: नासी, "प्रधान"। यहेजकेल उसे "राजा" नहीं कहते। बेबीलोन में बैठे बन्दियों ने सदियों तक दाऊद के घराने के राजाओं को देखा था जो मन्दिर को अपनी निजी संपत्ति समझते थे, याजकों को हटाते-लगाते थे, वेदी की आग तक अपनी पहुँच रखते थे। नए क्रम में वह आदमी फाटक के खम्भे के पास रुक जाता है। याजक उसका होमबलि तैयार करते हैं; वह भीतर नहीं घुसता। परमेश्वर की पवित्रता अब राजनीति का औज़ार नहीं। सत्ता की एक सीमा-रेखा पत्थर में खींच दी गई है, और वह रेखा एक डेवढ़ी है जिस पर शासक घुटने टेकता है। यही इस अध्याय का सुसमाचार है: परमेश्वर स्वयं अपने लोगों को उनके शासकों से बचाते हैं।

मुख्य सूत्र

आयत 18 को दो बार पढ़िए: "प्रजा का ऐसा कोई भाग प्रधान न ले, जो अंधेर से उनकी निज भूमि से छीना हो।" नाबोत की दाख की बारी याद आती है, जिसे आहाब ने झूठे मुकदमे से हड़प लिया था (1 राजा 21)। यहेजकेल 34 में परमेश्वर उन चरवाहों पर फूट पड़े थे जो भेड़ों को खाते थे, और कहा था कि वे स्वयं चरवाहा बनेंगे। यह अध्याय उस वचन का ठोस, ईंट-गारे वाला रूप है: एक शासक जो लोगों के "बीच होकर" आता-जाता है, उनसे ऊपर नहीं। इसी सूत्र के सिरे पर वह चरवाहा खड़ा है जो अपनी जान भेड़ों के लिये देता है, और जो बलि चढ़ाने वाला और बलि दोनों है।

दर्पण

हममें से हर कोई किसी का "प्रधान" है: माता-पिता, प्रबंधक, शिक्षक, बड़ा भाई, मंडली का अगुआ। इस पाठ का सवाल यह नहीं है कि आप कितनी भक्ति करते हैं, बल्कि यह कि आपकी भक्ति कहाँ रुकती है और आपका अधिकार कहाँ रुकता है। प्रधान भी बलि चढ़ाता है, भरपूर चढ़ाता है, छह मेम्ने और एक मेढ़ा; पर वह डेवढ़ी पार नहीं करता, और वह किसी की ज़मीन नहीं छूता। धार्मिकता का दिखावा और दूसरों की चीज़ों पर कब्ज़ा, ये दोनों एक ही आदमी में आराम से बैठ सकते हैं। यह अध्याय उस आराम को तोड़ता है।

आज ही वह एक चीज़ या रकम लौटा दीजिए जो आपने अपने पद, उम्र या रिश्ते के दबाव से किसी से ले ली थी; और अगर लौटाना मुमकिन न हो, तो उस व्यक्ति को दो पंक्तियों का संदेश भेजकर नाम लेकर स्वीकार कर लीजिए।

प्रश्न

फिर सवाल बचा रहता है: यह मन्दिर कभी बना नहीं। लौटे हुए बन्दियों ने जो भवन खड़ा किया, वह इन नापों का नहीं था, न वहाँ कोई "प्रधान" इस विधि से दण्डवत् करने आया। तो परमेश्वर ने इतनी बारीक नाप-जोख, तेल की तिहाई हीन तक, क्यों बताई? आसान जवाब यह है कि सब कुछ मसीह में "आत्मिक रूप से" पूरा हुआ, और उसमें सच्चाई है। मगर वह जवाब इस पाठ की ठोस ईंटों को बहुत जल्दी हवा बना देता है। मुझे लगता है हमें दोनों को थामना होगा: यह एक वास्तविक वादा था जिसकी पूर्ति परमेश्वर ने अपने ढंग से, अपने समय पर की, और यह एक ऐसा चित्र है जिसका पूरा आकार हम अभी नहीं देख पाते। यहेजकेल को भी नहीं दिखाया गया था कि कब।

श्रोता

कल्पना कीजिए: कबार नदी के किनारे बसी बस्ती, यहूदा से उखाड़े गए लोग, जिनके कानों में मन्दिर के जलने की आवाज़ अब भी गूँजती है। उनके पास न वेदी है, न याजक की सेवा, न सुबह का मेम्ना। और वे सुनते हैं: "प्रति भोर को तैयार किया जाए।" यह नियम नहीं, यह आश्वासन है, क्योंकि इसका मतलब है कि फिर कोई सुबह होगी जिसमें वेदी होगी। बन्दियों के लिये आयत 18 का अन्तिम वाक्य और भी चुभता था: "ऐसा न हो कि मेरी प्रजा के लोग अपनी-अपनी निज भूमि से तितर-बितर हो जाएँ।" तितर-बितर, यही तो उनकी हालत थी। परमेश्वर उस दर्द का नाम लेकर कहते हैं: ऐसा फिर नहीं होगा, और इस बार मैं शासकों के हाथ बाँध दूँगा।

एक बारीकी

आयत 20 पर रुकिए। रसोइयाँ भीतर ही बनाई गईं, "ऐसा न हो कि उन्हें बाहरी आँगन में ले जाने से साधारण लोग पवित्र ठहरें।" पहली नज़र में यह उलटा लगता है: पवित्र हो जाना खतरा कैसे? पर प्राचीन दुनिया में पवित्रता छूत की तरह फैलती थी, और जो चीज़ परमेश्वर के लिये अलग की गई हो, उसे लापरवाही से छूना जीवन का खतरा था। इसलिए कोनों में चूल्हे बने, चालीस हाथ लम्बे ओट, चार के चार एक ही नाप के। परमेश्वर की निकटता को सँभालकर रखा जाता है, टालकर नहीं। यह वही करुणा है जो बच्चे को आग के पास तक ले जाती है, मगर हाथ पकड़े रहती है।

मनन

आपके जीवन में वह "डेवढ़ी" कहाँ है जिसे आपका अधिकार पार नहीं करना चाहिए, और आप उसे कितनी बार पार कर जाते हैं?

अगर परमेश्वर हर सुबह के मेम्ने से बन्दियों को यह भरोसा दिला रहे थे कि फिर सुबह होगी, तो आज आपकी कौन सी निराशा में यह वचन सबसे ज़्यादा बोलता है?

Ezekiel में और गहराई से जानें

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The Message of Ezekiel

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Ezekiel

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Ezekiel 46 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यहेजकेल 46 का क्या अर्थ है?
यहेजकेल के मन्दिर-दर्शन का यह अध्याय दरवाज़ों, बलियों और सीढ़ियों के बारे में है। भीतरी आँगन का पूर्वी फाटक छहों कामकाजी दिन बन्द रहेगा और केवल विश्रामदिन और नये चाँद के दिन खुलेगा; प्रधान उसके ओसारे तक आएगा, डेवढ़ी पर दण्डवत् करेगा और उसी रास्ते लौट जाएगा। साधारण लोग उत्तरी फाटक से आकर दक्षिणी से निकलेंगे, कभी उसी दरवाज़े से पीछे नहीं मुड़ेंगे। हर सुबह एक निर्दोष मेम्ना, तेल और मैदा चढ़ाया जाएगा। और फिर अचानक भूमि का कानून: प्रधान प्रजा की निज भूमि अंधेर से नहीं छीन सकता। अन्त में यहेजकेल को आँगन के कोनों की रसोइयाँ दिखाई जाती हैं, जहाँ बलिदानों का माँस पकाया जाएगा।
यहेजकेल 46 किस विषय में है?
आयत 18 को दो बार पढ़िए: "प्रजा का ऐसा कोई भाग प्रधान न ले, जो अंधेर से उनकी निज भूमि से छीना हो।" नाबोत की दाख की बारी याद आती है, जिसे आहाब ने झूठे मुकदमे से हड़प लिया था (1 राजा 21)। यहेजकेल 34 में परमेश्वर उन चरवाहों पर फूट पड़े थे जो भेड़ों को खाते थे, और कहा था कि वे स्वयं चरवाहा बनेंगे। यह अध्याय उस वचन का ठोस, ईंट-गारे वाला रूप है: एक शासक जो लोगों के "बीच होकर" आता-जाता है, उनसे ऊपर नहीं। इसी सूत्र के सिरे पर वह चरवाहा खड़ा है जो अपनी जान भेड़ों के लिये देता है, और जो बलि चढ़ाने वाला और बलि दोनों है।
यहेजकेल 46 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही वह एक चीज़ या रकम लौटा दीजिए जो आपने अपने पद, उम्र या रिश्ते के दबाव से किसी से ले ली थी; और अगर लौटाना मुमकिन न हो, तो उस व्यक्ति को दो पंक्तियों का संदेश भेजकर नाम लेकर स्वीकार कर लीजिए।
यहेजकेल 46 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कल्पना कीजिए: कबार नदी के किनारे बसी बस्ती, यहूदा से उखाड़े गए लोग, जिनके कानों में मन्दिर के जलने की आवाज़ अब भी गूँजती है। उनके पास न वेदी है, न याजक की सेवा, न सुबह का मेम्ना। और वे सुनते हैं: "प्रति भोर को तैयार किया जाए।" यह नियम नहीं, यह आश्वासन है, क्योंकि इसका मतलब है कि फिर कोई सुबह होगी जिसमें वेदी होगी। बन्दियों के लिये आयत 18 का अन्तिम वाक्य और भी चुभता था: "ऐसा न हो कि मेरी प्रजा के लोग अपनी-अपनी निज भूमि से तितर-बितर हो जाएँ।" तितर-बितर, यही तो उनकी हालत थी। परमेश्वर उस दर्द का नाम लेकर कहते हैं: ऐसा फिर नहीं होगा, और इस बार मैं शासकों के हाथ बाँध दूँगा।
यहेजकेल 46 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में वह "डेवढ़ी" कहाँ है जिसे आपका अधिकार पार नहीं करना चाहिए, और आप उसे कितनी बार पार कर जाते हैं?
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Ezekiel 46 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 23

पिता, आपने अपने भवन के कोनों में भी चूल्हे बनवाए, जहाँ लोगों की भेंटें पकाई जातीं। मुझे भी याद दिलाइए कि छोटी और छिपी जगहों की सेवा आपकी नज़र में बेकार नहीं। मेरी रसोई, मेरा काम, मेरा हर साधारण दिन आपके लिए हो।

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