यहेजकेल 9:6
पाठ
आदेश किसी सेनापति की तरह ठंडा और स्पष्ट है: बूढ़े, जवान, कुँवारियाँ, बच्चे, स्त्रियाँ, किसी को मत छोड़ो। केवल वे बचें जिनके माथे पर वह चिन्ह है जो सन का वस्त्र पहने पुरुष ने लगाया। और फिर वह वाक्य जो सबसे अधिक चुभता है: "और मेरे पवित्रस्थान ही से आरम्भ करो।" न्याय बाहर की गलियों से नहीं, मन्दिर के आँगन से शुरू होता है, और सबसे पहले उन पुरनियों से जो भवन के सामने खड़े थे।
मर्म
हम मान बैठते हैं कि परमेश्वर की उपस्थिति एक सुरक्षा-कवच है: जहाँ मन्दिर है, वहाँ बचाव है। यह पद उस धारणा को उलट देता है। पवित्रता कोई निष्क्रिय गुण नहीं, वह जलती हुई वास्तविकता है, और जो उसके सबसे निकट खड़ा है वह सबसे अधिक उत्तरदायी है। यरूशलेम का पाप यह नहीं था कि वह परमेश्वर से दूर था, बल्कि यह कि उसने परमेश्वर के घर को अपने पापों का आवरण बना लिया था। साथ ही, उसी न्याय के भीतर एक चिन्ह है। परमेश्वर अंधाधुंध नहीं मारते; वे पहले गिनते हैं, पहचानते हैं, चिन्हित करते हैं। कठोरता और करुणा यहाँ एक ही आदेश में साथ खड़ी हैं, और यही इस दृश्य को असहनीय भी बनाता है और सहनीय भी।
सूत्र
चिन्ह लगाने वाला पुरुष पहले आता है, मारने वाले उसके पीछे। यह क्रम संयोग नहीं। जहाँ भी परमेश्वर न्याय करते हैं, वहाँ पहले वे एक बचाव का उपाय रखते हैं: मिस्र में द्वार की चौखट पर लहू, यहाँ माथे पर चिन्ह। और यह रेखा मसीह तक जाती है, जो पवित्रस्थान के बाहर, नगर के फाटक के बाहर मारे गए, ताकि न्याय की तलवार उन पर गिरे जिन पर वह गिरनी नहीं थी। यहेजकेल में चिन्ह उन्हें मिला जो "साँसें भरते और दुःख के मारे चिल्लाते हैं", यानी जिनका हृदय पाप से टूटा था। मसीह में वही टूटा हृदय अब लहू से चिन्हित है, हमारे अपने शोक से नहीं।
दर्पण
यह पद उस भरोसे को खोदकर बाहर निकालता है जो हम अपनी धार्मिक स्थिति में रखते हैं। आप रविवार को नियमित हैं, शायद समूह चलाते हैं, शायद प्राचीन हैं। यहेजकेल के पुरनिए भी भवन के सामने खड़े थे, और आरम्भ उन्हीं से हुआ। सवाल यह नहीं कि आप कहाँ खड़े हैं, बल्कि यह कि जो घृणित काम आपके चारों ओर हो रहे हैं, उन पर आप साँसें भरते हैं या उनके अभ्यस्त हो चुके हैं। दफ्तर में जो झूठ सामान्य हो गया है, परिवार में जो कड़वाहट सजी-सजाई चलती है, पैसे के जो समझौते अब चुभते नहीं। सुन्नपन ही सबसे खतरनाक स्थिति है, क्योंकि चिन्ह उन्हें मिला जो अब भी दुःख से चिल्ला सकते थे।
मुख्य पात्र
इस दृश्य में केन्द्र में परमेश्वर हैं, और उनका चित्र आरामदायक नहीं। वे करूबों पर से उठकर भवन की डेवढ़ी पर आ खड़े हुए हैं, मानो जाने से पहले रुककर देख रहे हों। उनकी आवाज़ में कोई कँपकँपी नहीं: "किसी पर दया न करना और न कोमलता से काम करना।" पर वही परमेश्वर पहले लेखनी वाले पुरुष को भेजते हैं, और आगे इसी अध्याय में यहेजकेल की चीख सुनते हैं, उसे चुप नहीं कराते। यह क्रोध किसी चिड़चिड़े देवता का नहीं; यह उस पति का दुःख है जिसका घर वेश्यालय बना दिया गया। परमेश्वर की पवित्रता उनकी प्रीति का ही दूसरा नाम है, और इसीलिए वह इतनी जलती है।
प्रसंग
यह दर्शन लगभग 592 ईसा पूर्व का है। यहेजकेल स्वयं बाबेल में निर्वासित है, कबार नदी के किनारे बसे बंदी समुदाय के बीच, और दर्शन में उसे यरूशलेम ले जाया जाता है। वहाँ के लोग अब भी कहते थे कि मन्दिर खड़ा है, इसलिए नगर गिर नहीं सकता। मन्दिर परिसर में शासक वर्ग, याजक और नगर के पुरनिए एक ही सामाजिक जाल के धागे थे; भवन के सामने खड़ा होना प्रतिष्ठा का चिह्न था। उत्तरी फाटक से आना भी अर्थपूर्ण है, क्योंकि आक्रमण हमेशा उत्तर से आते थे। और शवों से आँगन भरना, यह याजकीय दृष्टि से सबसे बड़ा अपमान था: जो स्थान अशुद्धता से सबसे अधिक बचाया जाता था, वही अशुद्ध किया जा रहा है।
अन्तर्पाठ
पहला प्रतिध्वनि मिस्र की है, जहाँ नाश करने वाला उन घरों से आगे बढ़ गया जिन पर चिह्न था। यहेजकेल में वही ढाँचा है, पर उलटी दिशा में: अब चिन्हित लोग इस्राएल के भीतर एक अल्पसंख्यक हैं, और नाश परमेश्वर के अपने घर से आरम्भ होता है। दूसरा संबंध प्रकाशितवाक्य से है, जहाँ माथे पर मुहर लगाए गए दास सुरक्षित रखे जाते हैं और यहेजकेल का सन का वस्त्र पहने पुरुष फिर दिखाई देता है। बीच में पतरस की पंक्ति खड़ी है कि न्याय का आरम्भ परमेश्वर के घराने से होता है। तीनों मिलकर एक ही बात कहते हैं: परमेश्वर अपने लोगों को छूट नहीं देते, वे उन्हें चिन्हित करते हैं।
आपके आसपास ऐसा क्या हो रहा है जिस पर आप कभी "साँसें भरते" थे, पर अब नहीं भरते?
यदि न्याय पवित्रस्थान से आरम्भ होता है, तो आपकी अपनी सेवा या जिम्मेदारी में कौन सी बात है जिसे आप परमेश्वर के सामने खुला रखने से बचते रहे हैं?
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