बाइबल व्याख्या

यिर्मयाह 20:14

बाइबल

पाठ

स्तुति के गीत की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी। एक ही वाक्य पहले यिर्मयाह ने कहा था, "यहोवा के लिये गाओ; यहोवा की स्तुति करो!" और अब वही मुँह कहता है: "श्रापित हो वह दिन जिसमें मैं उत्पन्न हुआ! जिस दिन मेरी माता ने मुझ को जन्म दिया वह धन्य न हो!" यह कोई क्षणिक चिढ़ नहीं है। यिर्मयाह अपने जन्मदिन पर श्राप उँडेल रहा है, उस दिन पर जिसे हर परिवार में आशीष का दिन गिना जाता था। वह परमेश्वर को श्राप नहीं देता, न अपनी माता को; वह उस घड़ी को निशाना बनाता है जिसने उसे इस बुलाहट और इस दर्द के भीतर खड़ा कर दिया। आगे की आयतें इसी चीख को और गहरा करती हैं, और अध्याय बिना किसी सुलह के, बिना किसी "परन्तु" के खत्म हो जाता है।

मूल बात

यह आयत हमें परमेश्वर के बारे में कुछ ऐसा बताती है जो हम प्रायः मानने से डरते हैं: वे इस तरह की भाषा को अपने वचन में जगह देते हैं। यिर्मयाह की यह चीख सेंसर नहीं की गई, न सुधारी गई, न किसी धर्मशास्त्रीय टिप्पणी से ढकी गई। जो परमेश्वर हृदय और मन के ज्ञाता हैं (आयत 12), वे यह भी जानते हैं कि उनका सेवक अपने अस्तित्व से थक चुका है, और वे उसे अपने सामने से हटाते नहीं। यहाँ उद्धार का कोई तर्क नहीं दिया जाता, कोई सांत्वना नहीं फेंकी जाती। इसका अर्थ यह है कि वाचा का सम्बन्ध इतना मजबूत है कि वह कड़वाहट को सह सकता है। विश्वास का विपरीत निराशा नहीं, चुप्पी है। यिर्मयाह चुप नहीं हुआ; उसने अपना अंधकार भी उन्हीं के सामने उँडेला जिनसे वह शिकायत कर रहा था, और यही उसकी भक्ति का सबसे कच्चा, सबसे सच्चा रूप है।

साझा सूत्र

यिर्मयाह की यह चीख बाइबल में अकेली नहीं खड़ी। अय्यूब ने भी अपने जन्मदिन को श्राप दिया था, और दोनों बार परमेश्वर ने उस श्राप को वचन में रहने दिया, मानो वे कह रहे हों कि उनके लोगों को मुस्कुराकर दुख सहने की कोई बाध्यता नहीं। पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। एक और भविष्यद्वक्ता गतसमनी में मुँह के बल गिरकर कहेगा कि उसका प्राण मृत्यु तक शोकित है, और क्रूस पर पूछेगा कि उसे क्यों छोड़ दिया गया। यिर्मयाह चाहता था कि उसका जन्म न हुआ होता; मसीह जानते हुए जन्मे कि यही अन्त होगा। जो श्राप यिर्मयाह दिन पर उँडेलता है, वह अपने ऊपर ले लेते हैं। इसलिए हमारी सबसे अंधेरी प्रार्थना भी अनसुनी नहीं गिरती: वह उस व्यक्ति के कानों में गिरती है जो उस अंधकार के भीतर से होकर गुज़र चुका है।

दर्पण

आप शायद वह वाक्य जानते हैं जिसे आपने कभी ज़ोर से नहीं कहा। वह सोमवार की सुबह आता है जब स्कूल या दफ्तर का दरवाज़ा खोलना पहाड़ लगता है। वह उस कमरे में आता है जहाँ हर महीने फिर से पता चलता है कि गर्भ नहीं ठहरा। वह उस बिस्तर के किनारे आता है जहाँ शरीर ने साथ देना छोड़ दिया है, और उस मेज़ पर जहाँ कर्ज़ के कागज़ पड़े हैं। "मैं पैदा ही क्यों हुआ।" और फिर तुरन्त शर्म आती है, क्योंकि हमें सिखाया गया है कि विश्वासी ऐसा नहीं सोचते। यही झूठा गर्व यिर्मयाह यहाँ तोड़ देता है। वह मंदिर का भविष्यद्वक्ता है और वह यह कह रहा है, परमेश्वर के सामने, परमेश्वर की ही भाषा में। आज दस मिनट के लिए किसी बन्द कमरे में जाइए और वह एक वाक्य, जो आपके भीतर सालों से दबा है, ज़ोर से परमेश्वर से कहिए, बिना अन्त में "पर मुझे भरोसा है" जोड़े।

प्रश्न

क्या यह पाप है? यह प्रश्न टालने लायक नहीं। यिर्मयाह उस जीवन को श्राप दे रहा है जिसे परमेश्वर ने दिया, और वह दाई को भी नहीं बख्शता। कोई भी ईमानदार पाठक यह नहीं कह सकता कि यह आदर्श प्रार्थना है। पर ध्यान दीजिए कि परमेश्वर उत्तर नहीं देते, न डाँटते हैं, न सान्त्वना देते हैं। अध्याय खुले घाव की तरह बन्द होता है। हमें यह मानना होगा कि बाइबल हर बात को सुलझाकर नहीं छोड़ती। जो हम जानते हैं वह यह है: यिर्मयाह अगले दिन फिर बोला, और दशकों तक बोलता रहा। कभी-कभी परमेश्वर का उत्तर शब्द नहीं, बल्कि अगली सुबह होती है, जिसमें सेवक जीवित पाया जाता है और काम अभी बाकी है।

एक बारीकी

ग़ौर कीजिए कि यिर्मयाह गर्भ का ज़िक्र करता है। आयत 17 में वह चाहता है कि उसकी माता का गर्भाशय ही उसकी कब्र होता। यही वह शब्द है जिससे उसकी पूरी कहानी शुरू हुई थी: अध्याय 1 में परमेश्वर ने कहा था कि गर्भ में रचे जाने से पहले ही उन्होंने उसे जान लिया और जातियों का भविष्यद्वक्ता ठहराया। जो जगह उसकी बुलाहट की नींव थी, वही अब उसे कब्र के रूप में चाहिए। यह संयोग नहीं; यह आदमी अपनी बुलाहट की सबसे पवित्र स्मृति को उलटकर रख रहा है। और यही बताता है कि दर्द कितना गहरा है: जब विश्वास टूटता है, तो वह ठीक उसी बिंदु पर टूटता है जहाँ वह सबसे मज़बूत था।

पहले सुननेवाले

जिन लोगों ने यह पहली बार सुना, उनके लिए जन्म का समाचार गाँव भर की खुशी थी। पिता को बेटा होने की खबर देना सम्मान का काम था, और निःसन्तानता शर्म मानी जाती थी। बच्चे वृद्धावस्था की सुरक्षा थे, वंश का भविष्य थे, वाचा की निरन्तरता का चिह्न थे। ऐसे समाज में अपने जन्म के दिन को श्राप देना केवल उदासी नहीं, लगभग निन्दा थी। और फिर भी यह शब्द उन लोगों के बीच सुरक्षित रखे गए जो जल्द ही बाबेल जाने वाले थे, जो अपने बच्चों को तलवार से मरते देखेंगे और वहाँ बैठकर पूछेंगे कि हम पैदा ही क्यों हुए। उनके लिए यह आयत कलंक नहीं, साथ थी: हमारा भविष्यद्वक्ता भी यहीं तक पहुँचा था, और परमेश्वर ने उसे नहीं छोड़ा।

मनन के प्रश्न

वह कौन-सा वाक्य है जिसे आप परमेश्वर से कहने के बजाय दबा देते हैं, और किसने आपको सिखाया कि उसे दबाना ही भक्ति है?

यिर्मयाह की चीख और उससे एक आयत पहले की स्तुति, दोनों एक ही दिन के हो सकते हैं। आपके भीतर ये दोनों इस समय कहाँ-कहाँ मौजूद हैं?

Jeremiah में और गहराई से जानें

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The Message of Jeremiah

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Jeremiah, Lamentations

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Jeremiah 20:14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यिर्मयाह 20:14 का क्या अर्थ है?
स्तुति के गीत की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी। एक ही वाक्य पहले यिर्मयाह ने कहा था, "यहोवा के लिये गाओ; यहोवा की स्तुति करो!" और अब वही मुँह कहता है: "श्रापित हो वह दिन जिसमें मैं उत्पन्न हुआ! जिस दिन मेरी माता ने मुझ को जन्म दिया वह धन्य न हो!" यह कोई क्षणिक चिढ़ नहीं है। यिर्मयाह अपने जन्मदिन पर श्राप उँडेल रहा है, उस दिन पर जिसे हर परिवार में आशीष का दिन गिना जाता था। वह परमेश्वर को श्राप नहीं देता, न अपनी माता को; वह उस घड़ी को निशाना बनाता है जिसने उसे इस बुलाहट और इस दर्द के भीतर खड़ा कर दिया। आगे की आयतें इसी चीख को और गहरा करती हैं, और अध्याय बिना किसी सुलह के, बिना किसी "परन्तु" के खत्म हो जाता है।
यिर्मयाह 20:14 किस विषय में है?
यिर्मयाह की यह चीख बाइबल में अकेली नहीं खड़ी। अय्यूब ने भी अपने जन्मदिन को श्राप दिया था, और दोनों बार परमेश्वर ने उस श्राप को वचन में रहने दिया, मानो वे कह रहे हों कि उनके लोगों को मुस्कुराकर दुख सहने की कोई बाध्यता नहीं। पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। एक और भविष्यद्वक्ता गतसमनी में मुँह के बल गिरकर कहेगा कि उसका प्राण मृत्यु तक शोकित है, और क्रूस पर पूछेगा कि उसे क्यों छोड़ दिया गया। यिर्मयाह चाहता था कि उसका जन्म न हुआ होता; मसीह जानते हुए जन्मे कि यही अन्त होगा। जो श्राप यिर्मयाह दिन पर उँडेलता है, वह अपने ऊपर ले लेते हैं। इसलिए हमारी सबसे अंधेरी प्रार्थना भी अनसुनी नहीं गिरती: वह उस व्यक्ति के कानों में गिरती है जो उस अंधकार के भीतर से होकर गुज़र चुका है।
यिर्मयाह 20:14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
क्या यह पाप है? यह प्रश्न टालने लायक नहीं। यिर्मयाह उस जीवन को श्राप दे रहा है जिसे परमेश्वर ने दिया, और वह दाई को भी नहीं बख्शता। कोई भी ईमानदार पाठक यह नहीं कह सकता कि यह आदर्श प्रार्थना है। पर ध्यान दीजिए कि परमेश्वर उत्तर नहीं देते, न डाँटते हैं, न सान्त्वना देते हैं। अध्याय खुले घाव की तरह बन्द होता है। हमें यह मानना होगा कि बाइबल हर बात को सुलझाकर नहीं छोड़ती। जो हम जानते हैं वह यह है: यिर्मयाह अगले दिन फिर बोला, और दशकों तक बोलता रहा। कभी-कभी परमेश्वर का उत्तर शब्द नहीं, बल्कि अगली सुबह होती है, जिसमें सेवक जीवित पाया जाता है और काम अभी बाकी है।
यिर्मयाह 20:14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
जिन लोगों ने यह पहली बार सुना, उनके लिए जन्म का समाचार गाँव भर की खुशी थी। पिता को बेटा होने की खबर देना सम्मान का काम था, और निःसन्तानता शर्म मानी जाती थी। बच्चे वृद्धावस्था की सुरक्षा थे, वंश का भविष्य थे, वाचा की निरन्तरता का चिह्न थे। ऐसे समाज में अपने जन्म के दिन को श्राप देना केवल उदासी नहीं, लगभग निन्दा थी। और फिर भी यह शब्द उन लोगों के बीच सुरक्षित रखे गए जो जल्द ही बाबेल जाने वाले थे, जो अपने बच्चों को तलवार से मरते देखेंगे और वहाँ बैठकर पूछेंगे कि हम पैदा ही क्यों हुए। उनके लिए यह आयत कलंक नहीं, साथ थी: हमारा भविष्यद्वक्ता भी यहीं तक पहुँचा था, और परमेश्वर ने उसे नहीं छोड़ा।
यिर्मयाह 20:14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यिर्मयाह की चीख और उससे एक आयत पहले की स्तुति, दोनों एक ही दिन के हो सकते हैं। आपके भीतर ये दोनों इस समय कहाँ-कहाँ मौजूद हैं?
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Jeremiah 20 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 5

पिता, जो कुछ हमने जमा किया है वह पल भर में हाथ से निकल सकता है। मुझे सिखा कि मैं अपनी सुरक्षा धन या नाम में न ढूँढूँ, बल्कि तुझमें। जब कुछ छिन जाए, तब भी मेरा मन डगमगाए नहीं, क्योंकि तू मेरे पास बना रहता है।

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