यिर्मयाह 21
पाठ
घिरे हुए यरूशलेम की गलियों से दो आदमी चलते हैं: पशहूर और याजक सपन्याह, राजा सिदकिय्याह के दूत। उनका संदेश छोटा है और उम्मीद से भरा हुआ: "हमारे लिये यहोवा से पूछ।" शायद परमेश्वर फिर कोई आश्चर्यकर्म करें, जैसे पहले करते आए हैं, और नबूकदनेस्सर की सेना रातोंरात हट जाए। यिर्मयाह का उत्तर वह दरवाज़ा बन्द कर देता है: परमेश्वर स्वयं इस नगर के विरुद्ध लड़ेंगे, बाबेल के साथ नहीं बल्कि बाबेल की ओर से। फिर एक भयानक विकल्प: जो नगर में रहेगा वह मरेगा, जो आत्मसमर्पण कर देगा वह जीएगा। और अन्त में दाऊद के घराने से एक पुरानी, अनसुनी माँग: "भोर को न्याय चुकाओ।"
मर्म
सबसे डरावना वाक्य कोई युद्ध का वर्णन नहीं, बल्कि यह है: "मैं स्वयं हाथ बढ़ाकर और बलवन्त भुजा से… तुम्हारे विरुद्ध लड़ूँगा।" यह ठीक वही भाषा है जिससे इस्राएल मिस्र से छुड़ाया गया था, वही बढ़ी हुई भुजा, वही बल। अब वह भुजा दूसरी दिशा में उठी है। सिदकिय्याह "आश्चर्यकर्मों" की आशा करता है, पर भूल जाता है कि आश्चर्यकर्म परमेश्वर के चरित्र से निकलते हैं, किसी राष्ट्रीय विशेषाधिकार से नहीं। जब वाचा का लोग वाचा की शर्तों को रौंद देता है, तब परमेश्वर की विश्वासयोग्यता उद्धार के रूप में नहीं, न्याय के रूप में प्रकट होती है। यही इस अध्याय का कठोर हृदय है: परमेश्वर पक्षपाती नहीं, वे धर्मी हैं। और धार्मिकता कभी-कभी उस ओर खड़ी होती है जहाँ हम उसे खड़ा नहीं देखना चाहते।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि क्रोध के बीचोंबीच परमेश्वर एक दरवाज़ा खुला छोड़ देते हैं: "मैं तुम्हारे सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का मार्ग भी बताता हूँ।" पर जीवन का मार्ग अपमानजनक है, उसमें हथियार डालकर शत्रु के पास निकल जाना है। बचना है, मगर हारकर। यह व्यवस्थाविवरण की पुरानी पुकार की गूँज है, जहाँ मूसा ने लोगों के आगे जीवन और मृत्यु रखी थी; पर यहाँ जीवन केवल समर्पण के रास्ते मिलता है। और इसी पैटर्न में मसीह की छाया है। क्रूस पर वह "दाऊद का घराना" खड़ा हुआ जिसने दया न पाने का दण्ड स्वयं पर ले लिया, ताकि हमारे लिए जीवन का मार्ग बचे। आज भी उद्धार उसी अपमानजनक दरवाज़े से आता है: हथियार डाल देना, अपनी किलेबन्दी छोड़ना, और जीना।
दर्पण
पद 13 हमारी असली बीमारी पकड़ता है: "हम पर कौन चढ़ाई कर सकेगा, और हमारे वासस्थान में कौन प्रवेश कर सकेगा?" यह वाक्य हर उस आदमी का है जिसने अपने चारों ओर दीवारें बना ली हैं। बचत खाता, नौकरी की सुरक्षा, घर का ताला, सही चर्च की सदस्यता, साफ़-सुथरा नैतिक रिकॉर्ड। हम अपनी चट्टान पर बैठकर सोचते हैं कि अब हम अभेद्य हैं। और सिदकिय्याह की तरह हम प्रार्थना तब करते हैं जब सेना दरवाज़े पर आ चुकी होती है, पहले नहीं। परमेश्वर का उत्तर पद 12 में है, और वह पूजा-पाठ नहीं माँगता: "लुटे हुए को अंधेर करनेवाले के हाथ से छुड़ाओ।" आज, अगले दस मिनट में, एक ऐसे व्यक्ति का नाम लिखिए जिसके साथ आपके दायरे में अन्याय हुआ है, और उसे एक संदेश भेजकर पूछिए कि असल में हुआ क्या।
मुख्य पात्र
सिदकिय्याह इस दृश्य में कभी सामने नहीं आता। वह दूत भेजता है, स्वयं नहीं आता। वह परमेश्वर से "पूछता" है पर सुनने नहीं आता, और यही उसका पूरा चरित्र है: एक आदमी जो दूरी से धर्म चलाना चाहता है। उसकी भाषा में "कदाचित्" है, शायद, संभवतः; पश्चाताप का एक शब्द नहीं, पाप का एक स्वीकार नहीं। वह चमत्कार चाहता है, परिवर्तन नहीं। और यही सबसे मानवीय बात है, क्योंकि हम सब यही चाहते हैं: परिस्थिति बदले, हम नहीं। सिदकिय्याह को इतिहास एक कमज़ोर राजा के रूप में याद रखता है, पर उसकी कमज़ोरी सैन्य नहीं थी। वह आज्ञा मानने से डरता था, और डर उसे अन्त तक बीच में लटकाए रखता है।
प्रश्न
पद 7 पढ़कर साँस रुक जाती है: "उन पर न तो वह तरस खाएगा, न कुछ कोमलता दिखाएगा और न कुछ दया करेगा।" क्या परमेश्वर सचमुच दया रोक सकते हैं? और पद 6 में पशु भी मरते हैं, जिन्होंने कुछ नहीं किया। इसे चिकना करना बेईमानी होगी। न्याय, जब आता है, तो निशाना बाँधकर नहीं आता; वह नगर पर आता है, और नगर में बच्चे भी हैं। यिर्मयाह स्वयं इस पर रोता है, और उसका रोना परमेश्वर के विरुद्ध नहीं, परमेश्वर के हृदय के भीतर से है। शायद उत्तर यही है कि पाप कभी निजी नहीं रहता; जो राजा और नेता दशकों तक लुटे हुए को नहीं छुड़ाते, उनका ऋण पूरा समाज चुकाता है। पर यह उत्तर आराम नहीं देता। देना भी नहीं चाहिए।
संदर्भ
यह लगभग 588 ईसा पूर्व है, यिर्मयाह के लम्बे सेवाकाल का अन्तिम दौर। नबूकदनेस्सर की सेना यरूशलेम के चारों ओर घेरा डाल चुकी है, कुएँ और खेत बाहर रह गए हैं, नगर के भीतर अनाज घट रहा है और महामारी फैलने को है। सिदकिय्याह स्वयं बाबेल का बिठाया हुआ राजा था, जिसने शपथ तोड़कर विद्रोह किया; उसके दरबार में मिस्र की सहायता पर भरोसा करने वाला गुट भारी था। पद 13 का "समथर देश की चट्टान" यरूशलेम का अपना अहंकार है, वह नगर जो अपने पहाड़ी किलों और मन्दिर की उपस्थिति के कारण स्वयं को अजेय मानता था। इसी अभिमान के बीच यिर्मयाह, एक अकेला, अलोकप्रिय आवाज़, वह कहता है जिसे कोई नहीं सुनना चाहता।
चिन्तन
आपके जीवन की कौन-सी "चट्टान" है, वह सुरक्षा जिसके बारे में आप चुपचाप मानते हैं कि "हम पर कौन चढ़ाई कर सकेगा"?
सिदकिय्याह की तरह आप किस बात में चाहते हैं कि परमेश्वर परिस्थिति बदल दें, जबकि वे शायद आपसे बदलने को कह रहे हैं?
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Jeremiah 21 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
सिदकिय्याह ने खुद आकर नहीं पूछा, उसने दूत भेजे। और यिर्मयाह का उत्तर शुरू होता है, "तुम सिदकिय्याह से कहो।" परमेश्वर तब भी बोलता है, पर वह बात वैसी नहीं जैसी राजा चाहता था। सोचो, क्या तुम भी संकट में ही उससे पूछते हो, और वही सुनना चाहते हो जो तुमने पहले से तय कर रखा है?
सिदकिय्याह ने वर्षों यिर्मयाह की एक न सुनी, पर जब नबूकदनेस्सर की सेना फाटक तक आ पहुँची, तब उसने याजक भेजकर कहलाया, "हमारे लिये यहोवा से पूछ।" संकट ने उसकी जबान खोल दी, पर मन नहीं बदला। सोच, कहीं तेरी प्रार्थना भी सिर्फ आपातकाल का दरवाजा तो नहीं? परमेश्वर तुझसे संकट से पहले भी बात करना चाहता है।
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