यिर्मयाह 25
पाठ
तेईस साल। यिर्मयाह गिनकर बोलता है, जैसे कोई बूढ़ा शिक्षक अपनी कक्षा के सामने खड़ा होकर हिसाब माँगे: योशिय्याह के तेरहवें वर्ष से आज तक, सुबह-सुबह उठकर, बार-बार, "परन्तु तुम ने उसे नहीं सुना।" यहोयाकीम का चौथा वर्ष है, वही वर्ष जब बाबेल में नबूकदनेस्सर सिंहासन पर बैठा। अध्याय दो हिस्सों में चलता है: पहले यहूदा को सुनाया गया फैसला कि उत्तर के कुल आएँगे, देश सत्तर वर्ष बाबेल के अधीन रहेगा, और उसके बाद बाबेल का भी हिसाब होगा। फिर एक दृश्य: परमेश्वर यिर्मयाह के हाथ में क्रोध के दाखमधु का कटोरा थमाते हैं, और नबी उसे यरूशलेम से लेकर मिस्र, पलिश्ती नगरों, एदोम, सोर, अरब, एलाम, और अंत में "शेशक" तक, एक-एक जाति को पिलाता है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर नबूकदनेस्सर को क्या कहते हैं: "अपने दास बाबेल के राजा नबूकदनेस्सर"। यह वाक्य यहूदा के कानों में निन्दा जैसा लगा होगा। मूर्तिपूजक सम्राट परमेश्वर का दास? पर यहीं इस अध्याय का धर्मविज्ञान छिपा है: इतिहास किसी के हाथ से फिसला नहीं है। बाबेल की सेना परमेश्वर की हार का प्रमाण नहीं, उनके न्याय का औज़ार है। और औज़ार भी हिसाब से बाहर नहीं, क्योंकि सत्तर वर्ष बीतने पर उसी बाबेल को "अधर्म का दण्ड" मिलेगा। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर का क्रोध मनमाना गुस्सा नहीं, बल्कि मुकद्दमा है, जैसा पद 31 कहता है: "सब जातियों से यहोवा का मुकद्दमा है।" न्यायी अदालत में अपने ही लोगों से शुरुआत करता है, और फिर किसी को छोड़ता नहीं।
धागा
"देखो, जो नगर मेरा कहलाता है, मैं पहले उसी में विपत्ति डालने लगूँगा, फिर क्या तुम लोग निर्दोष ठहरके बचोगे?" यह तर्क पतरस अपनी पत्री में उठाता है: न्याय परमेश्वर के घर से आरम्भ होता है। पर बाइबल में कटोरे की कहानी यहीं नहीं रुकती। गतसमनी के बाग़ में एक व्यक्ति घुटनों पर गिरकर प्रार्थना करता है कि यह कटोरा टल जाए, और फिर उसे उठाकर पी जाता है। यिर्मयाह कटोरा जातियों को पिलाता है; यीशु मसीह उसे स्वयं पी जाते हैं। यह जोड़ ज़बरदस्ती का नहीं: वही शब्द, वही प्याला, वही जलजलाहट। और इसीलिए प्रकाशितवाक्य में कटोरा फिर लौटता है, उन पर जो क्रूस के नीचे खड़े होकर भी पीने से इनकार करते हैं।
दर्पण
तेईस साल एक लम्बा समय है। इतने में एक बच्चा जवान हो जाता है, एक करियर बन जाता है, एक आदत हड्डी बन जाती है। यिर्मयाह का अभियोग यह नहीं कि लोगों ने परमेश्वर को नकार दिया; वे मन्दिर जाते रहे। अभियोग यह है कि उन्होंने सुना नहीं, "न कान लगाया"। हममें से अधिकांश नास्तिकता से नहीं, बहरेपन से गिरते हैं: वह बात जो दस साल से भीतर खटक रही है और जिस पर हमने कभी कुछ नहीं किया। वह पैसा जिसका हिसाब साफ़ नहीं। वह रिश्ता जिसे हमने चुपचाप मरने दिया। वह दिनचर्या जिसमें प्रार्थना बस बची-खुची जगह भरती है। आज ही एक काग़ज़ पर वह एक बात लिखिए जो परमेश्वर आपसे वर्षों से कहते आ रहे हैं और जिसे आप टालते रहे हैं, और उसके नीचे लिख दीजिए कि इस सप्ताह आप उस पर क्या पहला कदम उठाएँगे।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में परमेश्वर को देखिए, और असहजता महसूस कीजिए। वे "बड़े यत्न से" नबी भेजते रहे, यानी लगातार, थकान की हद तक। यह उस परमेश्वर की तस्वीर है जो समझाने में अपमानित होने तक नहीं थकता। फिर अचानक स्वर बदलता है: "यहोवा ऊपर से गरजेगा… वह अपनी चराई के स्थान के विरुद्ध जोर से गरजेगा।" चरवाहा अपने ही चरागाह के विरुद्ध गरजता है। और पद 38 में वे "युवा सिंह के समान" अपनी माँद से निकलते हैं। यह वही प्रेम है जो अब हस्तक्षेप करता है, क्योंकि चुप रहना अब झूठ होता। परमेश्वर का क्रोध उनके चरित्र का अपवाद नहीं, उनकी सच्चाई का दूसरा चेहरा है।
कठिन प्रश्न
पद 33 पचाना आसान नहीं: लाशें पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक, कोई रोने वाला नहीं, कोई कब्र नहीं, "वे भूमि के ऊपर खाद के समान पड़ी रहेंगी।" यहाँ मासूम बच्चे भी होंगे। क्या यह अनुपात में है? पाठ हमें आसान उत्तर नहीं देता, और मुझे उसे चिकना करने का अधिकार नहीं। दो बातें कही जा सकती हैं: यह भाषा भविष्यद्वक्ता की है, युद्ध के यथार्थ को उसकी पूरी नग्नता में दिखाने वाली, न कि सजाकर। और दूसरी, पद 34 का "हे चरवाहों, हाय-हाय करो और चिल्लाओ" बताता है कि निशाना मुख्यतः वे हैं जिनके पास शक्ति थी। बाक़ी रहस्य है। उसे रहस्य ही रहने दीजिए, पर यह जानकर कि वह न्यायी स्वयं बाद में उसी कटोरे को पीने आया।
पहले सुनने वाले
सोचिए उस भीड़ को जो यरूशलेम में खड़ी सुन रही है। बाबेल अभी दूर है, कर्कमीश की लड़ाई अभी-अभी हुई है, और मन्दिर अपनी जगह खड़ा है, पत्थर पर पत्थर। उनके कानों में यह असम्भव लगा होगा: यह नगर? परमेश्वर का अपना नगर? और सूची में अपना नाम सबसे पहले सुनना, मिस्र और सोर और अरब से भी पहले, यह अपमान था। उन्हें लगता था चुनाव का अर्थ है सुरक्षा। यिर्मयाह उल्टा कहता है: चुनाव का अर्थ है पहले जवाबदेही। सत्तर वर्ष की बात भी उनके लिए दिलासा नहीं, सज़ा की पैमाइश थी, एक पूरी पीढ़ी का जीवन। पर उसी गिनती में एक छिपा हुआ वादा था: अंत तय है, यानी अनन्त नहीं।
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तेईस साल की कौन-सी बात आपके जीवन में अब तक "सुनी तो, पर कान नहीं लगाया" की श्रेणी में पड़ी है?
अगर परमेश्वर अपने ही घर से न्याय शुरू करते हैं, तो आपकी कलीसिया और आपके परिवार में इसका व्यावहारिक अर्थ क्या होगा?
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