अय्यूब 1
पाठ
ऊस देश में एक आदमी रहता था जिसके पास वह सब कुछ था जिसे हम आशीष कहते हैं: दस बच्चे, हजारों पशु, नौकर-चाकर, और पूरे पूर्वी देशों में सबसे बड़ा नाम। पर अय्यूब की पहचान उसकी सम्पत्ति नहीं थी, बल्कि यह कि वह "खरा और सीधा था और परमेश्वर का भय मानता और बुराई से परे रहता था," इतना कि वह अपने बच्चों के छिपे पापों के लिए भी भोर को उठकर होमबलि चढ़ाता था। फिर दृश्य अचानक बदल जाता है और हम स्वर्ग के दरबार में पहुँच जाते हैं, जहाँ शैतान एक प्रश्न उछालता है: "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?" अनुमति मिलती है, और चार दूत एक के बाद एक आकर अय्यूब का सब कुछ छीन लेते हैं। वह बागा फाड़ता है, सिर मुँड़ाता है, भूमि पर गिरता है, और आराधना करता है।
मर्म
यह अध्याय परमेश्वर के बारे में एक असहज सच्चाई खोलता है: वे अपने भक्त की भक्ति को दाँव पर लगने देते हैं। शैतान का प्रश्न सिर्फ अय्यूब पर आरोप नहीं है, वह परमेश्वर पर आरोप है, कि आपको कोई मुफ्त में नहीं चाहता, आपकी बाड़ हटा दीजिए तो आपका कोई उपासक नहीं बचेगा। पूरी पुस्तक इसी प्रश्न पर टिकी है। और ध्यान दीजिए कि परमेश्वर इस आरोप का उत्तर तर्क से नहीं, बल्कि एक जीवन से देते हैं। यहाँ धर्मशास्त्र किसी बहस में नहीं, एक टूटे हुए आदमी की धूल में लोटती देह में सिद्ध होता है। इसका अर्थ यह है कि सच्ची भक्ति की परीक्षा सुख में नहीं होती, और परमेश्वर इस परीक्षा से डरते नहीं। पर यह भी सच है कि अय्यूब को कभी स्वर्ग की वह बातचीत सुनाई नहीं देती। वह अँधेरे में ही आराधना करता है, और शायद यही इस अध्याय का सबसे गहरा शब्द है।
सूत्र
अय्यूब की कहानी उस धागे से जुड़ी है जो पूरे शास्त्र में चलता है: एक निर्दोष जन जो दूसरों के कारण दुख उठाता है, और जिसका दुख किसी बड़े प्रश्न का उत्तर बन जाता है। पहले अध्याय में ही अय्यूब याजक जैसा दिखता है, भोर को उठकर उन पापों के लिए बलि चढ़ाता है जो शायद हुए ही नहीं। वह अपने बच्चों और परमेश्वर के बीच खड़ा है। यह छाया आगे चलकर उस एक में पूरी होती है जो केवल दूसरों के लिए बलि नहीं चढ़ाता, स्वयं बलि बन जाता है। और एक और समानता चुभती है: जैसे अय्यूब को स्वर्ग की वह बातचीत सुनाई नहीं दी, वैसे ही गतसमनी के अँधेरे में यीशु मसीह को भी कोई स्वर्गीय व्याख्या नहीं मिली, केवल एक कटोरा और पिता की इच्छा। विश्वास का सबसे ऊँचा रूप हमेशा अधूरी जानकारी के साथ ही घटता है।
दर्पण
शैतान का शब्द "बाड़ा" हमें पकड़ लेता है, क्योंकि हम सब बाड़े बनाते हैं। बीमा, बचत, वार्षिक जाँच, बच्चों के स्कूल का चुनाव, वह नौकरी जो सुरक्षित लगती है। इनमें से कुछ भी गलत नहीं है। पर एक सवाल बाकी रहता है जिसे हम पूछने से डरते हैं: अगर परमेश्वर वह सब हटा दें जो उन्होंने दिया है, तो क्या बचेगा? मेरी प्रार्थना, या मेरी शिकायत? हम अक्सर बिना जाने सौदा करते हैं, ईमानदारी के बदले सुरक्षा, भक्ति के बदले भलाई। अय्यूब की धूल में लोटती देह उस सौदे को तोड़ देती है। आज एक काम कीजिए: कागज पर वह एक चीज लिखिए जिसे खोने से आप सबसे ज्यादा डरते हैं, नाम लेकर, और फिर उसे हाथ में लेकर ऊँचे स्वर में कहिए, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।"
शास्त्र की गूँज
लूका 22 में यीशु मसीह पतरस से कहते हैं कि शैतान ने उसे गेहूँ की तरह फटकने के लिए माँग लिया है, पर उन्होंने उसके विश्वास के लिए प्रार्थना की। वही ढाँचा है: माँग, अनुमति, सीमा। स्वर्ग में हमारे बारे में बातें होती हैं जिन्हें हम नहीं सुनते, और वे बातें प्रेम से खाली नहीं होतीं। दूसरी गूँज सभोपदेशक 5:15 से आती है, जहाँ वही सच्चाई ठंडे स्वर में कही गई है कि मनुष्य नंगा आता है और नंगा लौटता है। सभोपदेशक इसे व्यर्थता कहता है; अय्यूब उसी सच्चाई को घुटनों पर आराधना में बदल देता है। एक ही तथ्य, दो बिल्कुल अलग हृदय। फर्क तथ्य में नहीं, उस नाम में है जिसे अय्यूब जोड़ता है।
एक बारीकी
चार बार, ठीक एक ही शब्दों में, वाक्य दोहराया जाता है: "और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।" और तीन बार लेखक बीच में डालता है, "वह अभी यह कह ही रहा था।" यह केवल शैली नहीं, यह क्रूरता का व्याकरण है। अय्यूब को साँस लेने की जगह नहीं मिलती, एक शोक को महसूस करने का समय नहीं मिलता कि दूसरा आ गिरता है। जिसने कभी लगातार बुरी खबरें झेली हैं, वह इस लय को पहचानता है: फोन बजता है, फिर बजता है, फिर बजता है। और उस निर्दयी लय के अंत में एक अकेला शब्द खड़ा है, "तब अय्यूब उठा।" उठा, गिरा, और आराधना की। शोक और आराधना यहाँ एक ही गति के दो हिस्से हैं।
मुख्य पात्र
अय्यूब को समझने के लिए पद 5 सबसे ज्यादा बताता है। वह चिंतित पिता है, "कदाचित् मेरे बच्चों ने पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया हो," और इस कदाचित् के लिए वह हर बार बलि चढ़ाता है। यह भय से पैदा हुई भक्ति भी हो सकती थी, पर पद 21 दिखाता है कि उसकी जड़ें कहीं गहरी हैं। वह वस्त्र फाड़ता है और सिर मुँड़ाता है, यानी वह पत्थर नहीं बनता, वह पूरी तरह टूटता है। धीरज का मतलब भावनाशून्यता नहीं। और पद 22 सावधानी से लिखा गया है: उसने "मूर्खता से दोष" नहीं लगाया। अगले अध्यायों में वह कड़वे सवाल पूछेगा, परमेश्वर से लड़ेगा, न्याय माँगेगा। वह पाप नहीं होगा। यहाँ हमें एक ऐसा मनुष्य मिलता है जिसकी श्रद्धा उसके प्रश्नों को दबाती नहीं, उन्हें उठाने की हिम्मत देती है।
चिंतन के प्रश्न
अगर आज आपकी "बाड़" का एक हिस्सा हटा दिया जाए, तो सबसे पहले आपके मुँह से क्या निकलेगा, और वह आपकी भक्ति के बारे में क्या कहता है?
अय्यूब बिना किसी व्याख्या के आराधना करता है। आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा अभी भी बिना व्याख्या के पड़ा है, और क्या आप उसे समझे बिना परमेश्वर के सामने रख सकते हैं?
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Job 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 1 का क्या अर्थ है?
अय्यूब 1 किस विषय में है?
अय्यूब 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अय्यूब 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वह अब तक कह ही रहा था, कि" यही वाक्य चौथी बार दोहराया जाता है। दुख ने अय्यूब को साँस लेने का एक पल भी नहीं दिया। कभी तेरे साथ भी ऐसा हुआ है, कि एक बोझ उठाया नहीं और दूसरा आ गिरा? ध्यान दे, आखिरी खबर उन बच्चों के बारे में थी जो साथ बैठे खा-पी रहे थे। खुशी के बीच ही तूफान आया। फिर भी अय्यूब झुककर दंडवत करता है।
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