बाइबल व्याख्या

अय्यूब 17

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

अय्यूब अपनी बात कब्र के किनारे से शुरू करता है: "मेरा प्राण निकलने पर है, मेरे दिन पूरे हो चुके हैं; मेरे लिये कब्र तैयार है।" चारों ओर ठट्ठा करनेवाले हैं, उसके अपने मित्र, जिनकी बहस उसे लगातार घेरे रहती है, और वह परमेश्वर से एक विचित्र माँग करता है: आप ही मेरे जामिन बनिए। फिर वह अपनी देह की दुर्दशा गिनाता है, मित्रों की बुद्धि को नकारता है, और अंत में अपनी आशा को खोजते हुए पाता है कि वह भी उसके साथ ही अधोलोक में उतरती जा रही है।

मर्म

यह अध्याय हमें एक ऐसे मनुष्य के भीतर बैठा देता है जो परमेश्वर पर विश्वास खोए बिना परमेश्वर से लड़ रहा है। पद 3 का अनुरोध लगभग असंभव है: अय्यूब परमेश्वर से कहता है कि आप ही मेरी ज़मानत दीजिए, आप ही मेरे और अपने बीच खड़े होकर गवाही दीजिए। जो न्यायी है, वही वकील बने। यहाँ धर्मशास्त्र का एक गहरा सत्य नंगे रूप में खुलता है: मनुष्य के पास परमेश्वर के सामने खड़े होने के लिए परमेश्वर के सिवा कोई सहारा नहीं। न मित्र, न तर्क, न अपना निर्दोष अतीत। यह पद हार नहीं, प्रार्थना है, और सबसे अंधेरे क्षण में की गई प्रार्थना अक्सर सबसे सच्ची होती है।

सूत्र

अय्यूब जिस जामिन को खोजता है, वह उसे नहीं मिलता। "कौन है जो मेरे हाथ पर हाथ मारे?" यह प्रश्न पुराने नियम में खुला छोड़ दिया गया है, और यह खुलापन ही उसकी शक्ति है। बाइबल इस रिक्त स्थान को जल्दी भरने की कोशिश नहीं करती। सदियों बाद यीशु मसीह उस स्थान पर आकर खड़े होते हैं जहाँ अय्यूब हाथ बढ़ाकर किसी को टटोल रहा था: वे परमेश्वर की ओर से आते हैं और मनुष्य की ओर से बोलते हैं, दोनों हाथ थामते हैं। परन्तु ध्यान दीजिए, अय्यूब को यह उत्तर नहीं मिला। उसे केवल माँग करने की अनुमति मिली। और यही आशा का बीज है: जो माँग परमेश्वर ने पूछने दी, वह अंत में व्यर्थ नहीं ठहरी।

दर्पण

पद 12 में अय्यूब अपने मित्रों पर एक तीखा आरोप लगाता है: "वे रात को दिन ठहराते; वे कहते हैं, अंधियारे के निकट उजियाला है।" यह वाक्य हमारी सांत्वना की भाषा को चीरकर रख देता है। जब किसी की नौकरी छूटती है, जब रिपोर्ट में कैंसर निकलता है, जब विवाह टूटता है, तो हम कितनी जल्दी कहते हैं, सब ठीक हो जाएगा, परमेश्वर की योजना है, सुबह होने ही वाली है। अय्यूब इसे झूठ कहता है, क्योंकि वह रात में जी रहा है और उसे रात को रात कहने की अनुमति चाहिए। दुःख में बैठे व्यक्ति के पास बैठने का अर्थ है उसके अंधेरे को अंधेरा मानना, न कि उसमें जबरन दीया जलाना।

विवरण

पद 14 पर रुकिए: "यदि मैंने सड़ाहट से कहा, 'तू मेरा पिता है,' और कीड़े से, 'तू मेरी माँ,' और 'मेरी बहन है।'" अय्यूब कब्र की भाषा को परिवार की भाषा में बदल देता है। जिस आदमी के बेटे-बेटियाँ एक ही दिन में मारे गए, वह अब अपना नया कुटुम्ब गिना रहा है: सड़न पिता, कीड़ा माता और बहन। इससे अधिक कड़वा व्यंग्य कठिन है, और इससे अधिक ईमानदार स्वीकारोक्ति भी। मनुष्य अकेला नहीं जी सकता, इसलिए यदि जीवितों में कोई नहीं बचा, तो वह मृत्यु से ही रिश्ता जोड़ लेता है। यह पद हमें बताता है कि दुःख कितना गहरा पैठता है: वह हमारी सबसे कोमल शब्दावली को भी अपने अधिकार में ले लेता है।

प्रश्न

पद 15 पूछता है, "तो मेरी आशा कहाँ रही? और मेरी आशा किसके देखने में आएगी?" और अध्याय बिना उत्तर समाप्त हो जाता है: आशा भी उसके साथ मिट्टी में उतर जाती है। यहाँ हमें सावधान रहना चाहिए। यह कहना आसान होगा कि अय्यूब भावुक हो गया था, या कि उसे पुनरुत्थान का पूरा ज्ञान नहीं था। परन्तु पवित्र आत्मा ने इन शब्दों को शास्त्र में रहने दिया, बिना सुधार, बिना नोट। इसका अर्थ है कि विश्वासी के मुँह से निकली निराशा भी परमेश्वर के लिए असहनीय नहीं है। कहीं-कहीं आशा दिखाई ही नहीं देती, और तब भी उसे खोजते रहना विश्वास है। पद 9 का "धर्मी लोग अपना मार्ग पकड़े रहेंगे" इसी अंधेरे में बोला गया वाक्य है, वादा नहीं, पकड़ है।

पृष्ठभूमि

अय्यूब के पहले पाठक उस दुनिया में रहते थे जहाँ मान-सम्मान जीवन से भी बड़ा था। "लोग मेरे मुँह पर थूकते हैं" पढ़कर वे केवल अपमान नहीं सुनते थे, बल्कि सामाजिक मृत्यु सुनते थे: बीमारी को दोष का प्रमाण माना जाता था, इसलिए अय्यूब का गलियों में उपमा बन जाना उसे समुदाय से बाहर कर देता था। उनके लिए यह भी चौंकानेवाला था कि एक दुःखी मनुष्य परमेश्वर से न्यायालय की भाषा में बात कर रहा है, जामिन माँग रहा है, अपने मित्रों की धर्मशिक्षा को अबुद्धिमानी कह रहा है। और शास्त्र ने इस आवाज़ को दबाया नहीं। जो समुदाय अपने दुःखियों को चुप कराता है, वह इस पुस्तक को ठीक से पढ़ नहीं सका।

चिंतन

आपके जीवन में कौन सी रात है जिसे आपने दूसरों के सामने, या स्वयं के सामने, दिन कहकर टाल दिया है?

अय्यूब की तरह परमेश्वर से ही जामिन माँगना आपकी प्रार्थना में कैसा लगेगा, यदि आप आज उस अंधेरे में खड़े हों?

Job में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Job: The Wisdom of the Cross

Christopher Ash

The most pastoral full length walk through suffering and the God who answers.

The Message of Job

David Atkinson

A compact companion for the hardest questions Job raises.

Job: An Introduction and Commentary

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A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Job

John Walton

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Job 17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

अय्यूब 17 का क्या अर्थ है?
अय्यूब अपनी बात कब्र के किनारे से शुरू करता है: "मेरा प्राण निकलने पर है, मेरे दिन पूरे हो चुके हैं; मेरे लिये कब्र तैयार है।" चारों ओर ठट्ठा करनेवाले हैं, उसके अपने मित्र, जिनकी बहस उसे लगातार घेरे रहती है, और वह परमेश्वर से एक विचित्र माँग करता है: आप ही मेरे जामिन बनिए। फिर वह अपनी देह की दुर्दशा गिनाता है, मित्रों की बुद्धि को नकारता है, और अंत में अपनी आशा को खोजते हुए पाता है कि वह भी उसके साथ ही अधोलोक में उतरती जा रही है।
अय्यूब 17 किस विषय में है?
अय्यूब जिस जामिन को खोजता है, वह उसे नहीं मिलता। "कौन है जो मेरे हाथ पर हाथ मारे?" यह प्रश्न पुराने नियम में खुला छोड़ दिया गया है, और यह खुलापन ही उसकी शक्ति है। बाइबल इस रिक्त स्थान को जल्दी भरने की कोशिश नहीं करती। सदियों बाद यीशु मसीह उस स्थान पर आकर खड़े होते हैं जहाँ अय्यूब हाथ बढ़ाकर किसी को टटोल रहा था: वे परमेश्वर की ओर से आते हैं और मनुष्य की ओर से बोलते हैं, दोनों हाथ थामते हैं। परन्तु ध्यान दीजिए, अय्यूब को यह उत्तर नहीं मिला। उसे केवल माँग करने की अनुमति मिली। और यही आशा का बीज है: जो माँग परमेश्वर ने पूछने दी, वह अंत में व्यर्थ नहीं ठहरी।
अय्यूब 17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 14 पर रुकिए: "यदि मैंने सड़ाहट से कहा, 'तू मेरा पिता है,' और कीड़े से, 'तू मेरी माँ,' और 'मेरी बहन है।'" अय्यूब कब्र की भाषा को परिवार की भाषा में बदल देता है। जिस आदमी के बेटे-बेटियाँ एक ही दिन में मारे गए, वह अब अपना नया कुटुम्ब गिना रहा है: सड़न पिता, कीड़ा माता और बहन। इससे अधिक कड़वा व्यंग्य कठिन है, और इससे अधिक ईमानदार स्वीकारोक्ति भी। मनुष्य अकेला नहीं जी सकता, इसलिए यदि जीवितों में कोई नहीं बचा, तो वह मृत्यु से ही रिश्ता जोड़ लेता है। यह पद हमें बताता है कि दुःख कितना गहरा पैठता है: वह हमारी सबसे कोमल शब्दावली को भी अपने अधिकार में ले लेता है।
अय्यूब 17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब के पहले पाठक उस दुनिया में रहते थे जहाँ मान-सम्मान जीवन से भी बड़ा था। "लोग मेरे मुँह पर थूकते हैं" पढ़कर वे केवल अपमान नहीं सुनते थे, बल्कि सामाजिक मृत्यु सुनते थे: बीमारी को दोष का प्रमाण माना जाता था, इसलिए अय्यूब का गलियों में उपमा बन जाना उसे समुदाय से बाहर कर देता था। उनके लिए यह भी चौंकानेवाला था कि एक दुःखी मनुष्य परमेश्वर से न्यायालय की भाषा में बात कर रहा है, जामिन माँग रहा है, अपने मित्रों की धर्मशिक्षा को अबुद्धिमानी कह रहा है। और शास्त्र ने इस आवाज़ को दबाया नहीं। जो समुदाय अपने दुःखियों को चुप कराता है, वह इस पुस्तक को ठीक से पढ़ नहीं सका।
अय्यूब 17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अय्यूब की तरह परमेश्वर से ही जामिन माँगना आपकी प्रार्थना में कैसा लगेगा, यदि आप आज उस अंधेरे में खड़े हों?
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Job 17 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 16

पिता, कभी कभी लगता है कि मेरी आशा मेरे साथ ही मिट्टी में दबी जा रही है। फिर भी मैं जानता हूँ कि तू अंधेरे गड्ढे में भी मेरे पास है। मेरी थकी हुई पुकार को सुन, और जहाँ मुझे कुछ नहीं दिखता, वहाँ तू मुझे थामे रख।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

अय्यूब अपने मित्रों से कहता है, "परन्तु तुम सब लौटकर आओ, मुझे तुम में एक भी बुद्धिमान नहीं मिलेगा।" वे बोलना जानते थे, दुःख बाँटना नहीं। सात दिन चुप बैठे रहे तब उनकी उपस्थिति मरहम थी, जब समझाने लगे तब चोट बन गई। किसी टूटे हुए के पास बैठकर पूछो: क्या मैं उसे उत्तर दे रहा हूँ, या साथ दे रहा हूँ?

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