बाइबल व्याख्या

लूका 18:9

बाइबल

पाठ

लूका इस दृष्टान्त की भूमिका में एक ऐसा वाक्य रखते हैं जो सुनने से पहले ही श्रोता को पहचान लेता है: "और उसने उनसे जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और दूसरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा।" यहाँ कहानी शुरू भी नहीं हुई, और निशाना पहले ही तय हो चुका है। यीशु किसी अनजान भीड़ को नहीं, बल्कि उन लोगों को संबोधित कर रहे हैं जिनके भीतर दो चीज़ें एक साथ बैठी हैं: अपनी धार्मिकता पर भरोसा, और दूसरों के प्रति तिरस्कार। ध्यान दीजिए, ये दो अलग-अलग दोष नहीं हैं। लूका इन्हें एक ही साँस में जोड़ते हैं, मानो एक से दूसरा अपने आप निकलता हो। जो अपने आप पर टिका है, वह अनिवार्य रूप से किसी न किसी को नीचे देखेगा।

मूल बात

यह वचन धार्मिकता के दो स्रोतों के बीच की दरार खोल देता है। "अपने ऊपर भरोसा रखना" का अर्थ केवल घमंड नहीं है; इसका अर्थ है कि परमेश्वर के सामने मेरी स्थिति मेरे अपने प्रदर्शन पर टिकी है। और जिस क्षण मेरी स्थिति मेरे प्रदर्शन पर टिकती है, उस क्षण दूसरों का खराब प्रदर्शन मेरे लिए ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि तुलना ही मेरा एकमात्र माप है। इसीलिए तिरस्कार कोई संयोगवश जुड़ी बुराई नहीं, वह आत्म-धार्मिकता का ईंधन है। सुसमाचार इस पूरे तंत्र को उलट देता है: धार्मिकता परमेश्वर की ओर से दी जाती है, इसलिए वह किसी से छीनकर नहीं मिलती। जहाँ अनुग्रह है, वहाँ दूसरे की गिरावट मेरे लिए राहत नहीं, दुःख बन जाती है। और यही जाँचने की सबसे ईमानदार कसौटी है कि मैं वास्तव में किस पर भरोसा कर रहा हूँ।

जुड़ा हुआ सूत्र

यह एक वाक्य पूरे बाइबल की उस धारा को छूता है जो आदम से लेकर मसीह तक चलती है: मनुष्य बार-बार अपनी स्थिति खुद बनाना चाहता है, और परमेश्वर बार-बार उसे मुफ्त में देना चाहते हैं। इसी अध्याय में दृष्टान्त का चुंगी लेनेवाला भजन संहिता 51 के शब्दों में गिड़गिड़ाता है, वही प्रार्थना जो दाऊद ने अपने सबसे बड़े पाप के बाद की थी: दया माँगना, सौदा नहीं करना। और अध्याय के अंत में यरीहो का अंधा भिखारी ठीक वही पुकार दोहराता है, "मुझ पर दया कर"। लूका जान-बूझकर इन दोनों को एक ही अध्याय में रखते हैं। जो कुछ नहीं ला सकता, वही सब कुछ पाता है। यही सुसमाचार का ढाँचा है, और मसीह का क्रूस इसी ढाँचे की नींव है: धार्मिकता कमाई नहीं जाती, उपहार में मिलती है।

दर्पण

तिरस्कार शायद ही कभी शोर मचाता है। वह उस हल्की-सी राहत में छिपा होता है जो तब महसूस होती है जब किसी सहकर्मी की गलती पकड़ी जाती है, या जब किसी और के बच्चे बिगड़ते दिखते हैं और आप चुपचाप अपने पालन-पोषण को सराहते हैं। वह उस स्वर में होता है जिससे आप अपने भाई की आर्थिक बदहाली पर टिप्पणी करते हैं, या उस मन ही मन बनी सूची में जो आप चर्च में बैठकर बनाते हैं: कौन नियमित है, कौन नहीं। जो लोग वचन पढ़ते हैं, प्रार्थना करते हैं, दान देते हैं, उन्हीं के लिए यह वचन सबसे ख़तरनाक है, क्योंकि उनके पास तुलना करने को बहुत सारा सामान होता है। ईमानदारी से पूछिए: आपकी शांति किस पर टिकी है, अनुग्रह पर या इस बात पर कि कुछ लोग आपसे नीचे हैं?

आज ही, दस मिनट के भीतर, एक कागज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आप मन ही मन तुच्छ जानते हैं, और उस नाम को देखते हुए ज़ोर से कहिए: "हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर।"

कठिन सवाल

इस वचन में एक जाल बिछा है जिससे निकलना आसान नहीं। जैसे ही मैं पढ़ता हूँ कि यीशु आत्म-धार्मिक लोगों को संबोधित कर रहे हैं, मेरे भीतर तुरंत यह विचार उठता है कि अच्छा हुआ मैं वैसा नहीं हूँ। और उसी क्षण मैं वही बन गया जिसकी निंदा हो रही है। आत्म-निरीक्षण से इस चक्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं, क्योंकि हर गहरी खुदाई मुझे अपनी विनम्रता पर गर्व करने का नया कारण देती है। दूसरा काँटा यह है कि यह वचन खुद लोगों को एक श्रेणी में डालता प्रतीत होता है। क्या यीशु भी वही कर रहे हैं जो वे मना कर रहे हैं? नहीं, और अंतर महीन पर निर्णायक है: वे इन लोगों की पीठ पीछे उनकी चर्चा नहीं करते, वे उनके सामने खड़े होकर बोलते हैं, ताकि वे बच जाएँ। इस जाल से निकलने का एकमात्र दरवाज़ा अपने भीतर नहीं, बाहर की ओर देखना है।

मुख्य पात्र

यहाँ केंद्रीय व्यक्ति दृष्टान्त के दोनों आदमियों में से कोई नहीं, बल्कि बोलनेवाले स्वयं यीशु हैं। ध्यान दीजिए वे क्या करते हैं: वे उन लोगों से मुँह नहीं मोड़ते जो दूसरों को तुच्छ जानते हैं। वे उन्हें छोड़ते नहीं, उन्हें कहानी सुनाते हैं। यह कठोरता नहीं, यह एक विशेष प्रकार का प्रेम है जो चापलूसी करने से इनकार करता है। और इसी अध्याय में वे अपने चेलों से कहते हैं कि यरूशलेम में उनका "उपहास करेंगे" और "उस पर थूकेंगे"। यानी जो तिरस्कार के विरुद्ध बोल रहे हैं, वे स्वयं तिरस्कार के सबसे निचले स्तर से होकर जाएँगे। वे तुच्छ जाने गए, ताकि तुच्छ जाननेवालों को धार्मिकता उपहार में मिल सके। यही उनका अधिकार है इस बात को कहने का।

पहले सुननेवाले

पहले श्रोताओं के कानों में "फरीसी" शब्द वह व्यंग्य नहीं रखता था जो आज हमारे लिए रखता है। वे समाज के सबसे गंभीर, सबसे अनुशासित, सबसे सम्मानित लोग थे। सप्ताह में दो बार उपवास करना और सारी कमाई का दसवाँ अंश देना व्यवस्था की माँग से कहीं ऊपर था। दूसरी ओर चुंगी लेनेवाला वास्तव में रोमी शासन का सहयोगी और आम आदमी की जेब काटनेवाला था, कोई मासूम बलि का बकरा नहीं। इसलिए जब यीशु ने यह भूमिका बाँधी, तो सुननेवालों को लगा होगा कि निशाना कहीं और है, किसी बेईमान पाखंडी पर। पर लूका साफ़ कहते हैं: निशाना उन पर था जो सचमुच धर्मपरायण थे। यह वचन धार्मिकता के विरुद्ध नहीं, धार्मिकता पर भरोसे के विरुद्ध है, और यही चोट सबसे गहरी लगती है।

मनन के प्रश्न

पिछले सप्ताह में किस व्यक्ति की असफलता ने आपको भीतर से थोड़ा हल्का महसूस कराया, और वह प्रतिक्रिया आपके भरोसे के बारे में क्या बताती है?

यदि आपकी सारी आत्मिक उपलब्धियाँ आज छिन जाएँ, तो परमेश्वर के सामने आपके पास खड़े होने के लिए क्या बचेगा?

Luke में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Luke For Everyone

N.T. Wright

Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.

The Message of Luke

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Follows Luke's careful account of the Savior for all nations.

Luke: An Introduction and Commentary

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Luke 18:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

लूका 18:9 का क्या अर्थ है?
लूका इस दृष्टान्त की भूमिका में एक ऐसा वाक्य रखते हैं जो सुनने से पहले ही श्रोता को पहचान लेता है: "और उसने उनसे जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और दूसरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा।" यहाँ कहानी शुरू भी नहीं हुई, और निशाना पहले ही तय हो चुका है। यीशु किसी अनजान भीड़ को नहीं, बल्कि उन लोगों को संबोधित कर रहे हैं जिनके भीतर दो चीज़ें एक साथ बैठी हैं: अपनी धार्मिकता पर भरोसा, और दूसरों के प्रति तिरस्कार। ध्यान दीजिए, ये दो अलग-अलग दोष नहीं हैं। लूका इन्हें एक ही साँस में जोड़ते हैं, मानो एक से दूसरा अपने आप निकलता हो। जो अपने आप पर टिका है, वह अनिवार्य रूप से किसी न किसी को नीचे देखेगा।
लूका 18:9 किस विषय में है?
यह एक वाक्य पूरे बाइबल की उस धारा को छूता है जो आदम से लेकर मसीह तक चलती है: मनुष्य बार-बार अपनी स्थिति खुद बनाना चाहता है, और परमेश्वर बार-बार उसे मुफ्त में देना चाहते हैं। इसी अध्याय में दृष्टान्त का चुंगी लेनेवाला भजन संहिता 51 के शब्दों में गिड़गिड़ाता है, वही प्रार्थना जो दाऊद ने अपने सबसे बड़े पाप के बाद की थी: दया माँगना, सौदा नहीं करना। और अध्याय के अंत में यरीहो का अंधा भिखारी ठीक वही पुकार दोहराता है, "मुझ पर दया कर"। लूका जान-बूझकर इन दोनों को एक ही अध्याय में रखते हैं। जो कुछ नहीं ला सकता, वही सब कुछ पाता है। यही सुसमाचार का ढाँचा है, और मसीह का क्रूस इसी ढाँचे की नींव है: धार्मिकता कमाई नहीं जाती, उपहार में मिलती है।
लूका 18:9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही, दस मिनट के भीतर, एक कागज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आप मन ही मन तुच्छ जानते हैं, और उस नाम को देखते हुए ज़ोर से कहिए: "हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर।"
लूका 18:9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहाँ केंद्रीय व्यक्ति दृष्टान्त के दोनों आदमियों में से कोई नहीं, बल्कि बोलनेवाले स्वयं यीशु हैं। ध्यान दीजिए वे क्या करते हैं: वे उन लोगों से मुँह नहीं मोड़ते जो दूसरों को तुच्छ जानते हैं। वे उन्हें छोड़ते नहीं, उन्हें कहानी सुनाते हैं। यह कठोरता नहीं, यह एक विशेष प्रकार का प्रेम है जो चापलूसी करने से इनकार करता है। और इसी अध्याय में वे अपने चेलों से कहते हैं कि यरूशलेम में उनका "उपहास करेंगे" और "उस पर थूकेंगे"। यानी जो तिरस्कार के विरुद्ध बोल रहे हैं, वे स्वयं तिरस्कार के सबसे निचले स्तर से होकर जाएँगे। वे तुच्छ जाने गए, ताकि तुच्छ जाननेवालों को धार्मिकता उपहार में मिल सके। यही उनका अधिकार है इस बात को कहने का।
लूका 18:9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले सप्ताह में किस व्यक्ति की असफलता ने आपको भीतर से थोड़ा हल्का महसूस कराया, और वह प्रतिक्रिया आपके भरोसे के बारे में क्या बताती है?
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Luke 18 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 34

यीशु ने साफ साफ बता दिया था कि उसे पकड़वाया जाएगा, मारा जाएगा और तीसरे दिन जी उठेगा। फिर भी लिखा है, "परन्तु वे इन बातों को न समझे, और यह बात उनसे छिपी रही, और जो कहा गया था वह उनकी समझ में न आया।" और ठीक इसके बाद एक अंधा पुकार उठता है कि वह देख सके। कभी कभी जो चलते फिरते हैं वही सबसे ज़्यादा अंधे होते हैं। तुझे क्या समझ नहीं आ रहा? उसी से माँग ले।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 13

धन्यवाद कि जब मैं दूर खड़ा होकर आँखें भी उठा नहीं पाता, तब भी तू सुनता है। उस चुंगी लेनेवाले की छोटी सी पुकार, "हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर," तूने ठुकराई नहीं। धन्यवाद कि मेरी टूटी हुई प्रार्थना भी तेरे सामने स्वीकार होती है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

यीशु ने यह दृष्टान्त उन लोगों से कहा, "जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं और दूसरों को तुच्छ जानते थे।" ध्यान दे, ये दो बातें साथ चलती हैं। जिस पल मैं अपनी धार्मिकता पर टिकता हूँ, उसी पल किसी और को नीचा देखना शुरू कर देता हूँ। अपने मन की जाँच का सबसे सच्चा पैमाना यही है: आज मैंने किसे तुच्छ समझा?

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