लूका 19:27
यह पाठ
दृष्टान्त का अन्तिम वाक्य। कुलीन मनुष्य राजपद पाकर लौट आया है, दासों का हिसाब हो चुका है, और अब वह उन नागरिकों की ओर मुड़ता है जिन्होंने उसके पीछे दूत भेजकर कहला दिया था, "हम नहीं चाहते, कि यह हम पर राज्य करे।" उसका आदेश छोटा है और उसमें कोई कंपन नहीं: "परन्तु मेरे उन बैरियों को जो नहीं चाहते थे कि मैं उन पर राज्य करूँ, उनको यहाँ लाकर मेरे सामने मार डालो।" यीशु इस वाक्य के बाद कुछ समझाते नहीं, कोई नरम उपसंहार नहीं जोड़ते। वे चुपचाप उठकर यरूशलेम की ओर आगे-आगे चल पड़ते हैं, उस नगर की ओर जहाँ उन्हें ही मार डाला जाएगा।
मूल बात
यह पद हमें वहाँ खड़ा करता है जहाँ खड़े होना हम टालते हैं: राज्य केवल निमंत्रण नहीं, अधिकार भी है। परमेश्वर का राज्य ऐसा प्रस्ताव नहीं जिसे हम विनम्रता से लौटा सकें और फिर भी सब कुछ पहले जैसा बना रहे। यहाँ विरोध पाप की किसी सूची से नहीं, एक इच्छा से परिभाषित होता है, "हम नहीं चाहते" कि यह हम पर राज्य करे। यही इस दृष्टान्त की चुभन है। ठीक उसी अध्याय में जक्कई का घर खुलता है और उद्धार भीतर आता है, और कुछ ही पंक्तियों बाद यीशु नगर को देखकर रोते हैं। वही आवाज़ जो खोए हुओं को ढूँढ़ती है, वही आवाज़ अन्त में निर्णय भी सुनाती है। करुणा और न्याय यहाँ दो परमेश्वर नहीं, एक ही प्रभु के दो चेहरे हैं, और हमें दोनों के सामने ठहरना सीखना है।
जोड़ने वाला सूत्र
बाइबल की कहानी में राजा का आना कभी तटस्थ घटना नहीं होती। मिस्र में परमेश्वर ने अपने लोगों को छुड़ाया और उसी रात फ़िरौन के घर में रोना मचा; वादा किया हुआ देश किसी के लिए घर बना और किसी के लिए अन्त। राज्य का आगमन सदा दो दिशाओं में काम करता है, क्योंकि जहाँ परमेश्वर राजा होते हैं वहाँ वे सब कुछ अपने हाथ में लेते हैं और किसी प्रतिद्वंद्वी सिंहासन को खड़ा नहीं रहने देते। यह दृष्टान्त उसी धारा में खड़ा है, पर एक मोड़ के साथ: जो राजा यह आदेश सुनाता है, वही राजा पद्यांश के ठीक बाद गदहे के बच्चे पर बैठकर नगर में प्रवेश करता है, हथियार के बिना, और वहाँ स्वयं मारा जाता है। क्रूस इस पद को रद्द नहीं करता; वह इसे असहनीय रूप से गम्भीर बना देता है। जिस राजा को ठुकराया जा रहा है, वह पहले अपने ही लहू से उस ठुकराने की कीमत चुकाता है।
दर्पण
"हम नहीं चाहते, कि यह हम पर राज्य करे।" यह वाक्य शायद ही कोई ऊँचे स्वर में कहता है। वह चुपचाप काम करता है। आप रविवार को उपासना में हैं, बाइबल रोज़ पढ़ते हैं, और फिर भी जीवन के कुछ कमरे हैं जहाँ दरवाज़े पर बिना लिखा हुआ बोर्ड टँगा है: यहाँ मैं निर्णय लेता हूँ। वह बैंक खाता हो सकता है, जिसके बारे में आप प्रार्थना में कभी बात नहीं करते। वह रिश्ता हो सकता है जिसमें आपने तय कर लिया है कि क्षमा का प्रश्न ही नहीं उठता। वह आपकी महत्वाकांक्षा हो सकती है, या आपका कैलेंडर, जिसमें हर चीज़ के लिए जगह है सिवाय उन लोगों के जिन्हें आप टालते हैं। ठुकराना प्रायः विद्रोह जैसा नहीं दिखता, वह केवल चुप्पी जैसा दिखता है। आज एक कागज़ पर वह एक क्षेत्र लिखिए जहाँ आपने प्रभु को प्रवेश नहीं करने दिया, और उस कागज़ को हाथ में लेकर ऊँचे स्वर में कहिए: "प्रभु, यहाँ भी आप राजा हैं।"
संदर्भ
यीशु यरीहो में हैं, यरूशलेम से लगभग एक दिन की दूरी पर, और भीड़ साँस रोके खड़ी है क्योंकि लोग समझते थे "कि परमेश्वर का राज्य अभी प्रगट होनेवाला है।" यही वह अपेक्षा है जिसे यह दृष्टान्त तोड़ता भी है और पूरा भी करता है। और यरीहो में ही एक महल खड़ा था जो हेरोदेस के पुत्र अरखिलाउस का था। उसी अरखिलाउस के बारे में सब जानते थे कि वह राजपद पाने रोम गया था, और यहूदी अगुवों का एक प्रतिनिधिमंडल उसके पीछे गया था कि यह व्यक्ति हम पर राज न करे; लौटकर उसने अपने विरोधियों से खूनी हिसाब चुकाया। यीशु अपने श्रोताओं की स्मृति से यह ढाँचा उठाते हैं। वे एक सुन्दर, धार्मिक उपमा नहीं चुनते, बल्कि वह कहानी जिसमें राजनीति, भय और वास्तविक लाशों की गंध है।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि आदेश कहाँ पूरा होना है: "उनको यहाँ लाकर मेरे सामने।" मृत्युदंड किसी दूर अंधेरे कोने में नहीं दिया जाता, किसी अनाम तंत्र द्वारा नहीं। राजा उन्हें अपने सामने लाने को कहता है। यह ब्योरा पूरे दृष्टान्त का भार उठाता है, क्योंकि वही शब्द "सामने" उन दासों के लिए भी सच था जो अपनी मुहरें लेकर आए और सुना गया: "हे उत्तम दास, तू धन्य है।" एक ही चेहरा, एक ही उपस्थिति, और दो बिलकुल भिन्न परिणाम। न्याय यहाँ व्यक्तिगत है। कोई भी अपने राजा से अपरिचित रहकर नहीं मरता; हर कोई उसकी आँखों में देखकर ही अपना निर्णय सुनता है। और शायद यही सबसे भारी बात है, कि अन्त में हम किसी नियम के नहीं, एक व्यक्ति के सम्मुख खड़े होंगे।
मुख्य पात्र
दृष्टान्त का केन्द्र वह कुलीन मनुष्य है जो राजपद पाने दूर देश जाता है। वह सौम्य नहीं है। तीसरा दास उसे "कठोर मनुष्य" कहता है और वह इनकार नहीं करता, केवल कहता है कि यदि तू मुझे ऐसा ही जानता था तो तूने उसके अनुसार क्यों नहीं किया। यह चित्र हमें असहज करता है, और शायद यही अभिप्राय है। यीशु अपने विषय में कोई चापलूस प्रतिमा नहीं गढ़ते। पर कहानी सुनाने वाले की ओर देखिए: वही व्यक्ति कुछ घंटों बाद नगर को देखकर रोता है और कहता है, "क्या ही भला होता, कि तू; हाँ, तू ही, इसी दिन में कुशल की बातें जानता।" यही पूरा चित्र है। राजा का अधिकार निर्दयी नहीं है; वह रोता हुआ अधिकार है। जो न्याय आँसुओं से होकर आता है, वह कठोरता नहीं, गम्भीरता है।
शास्त्र के अन्य स्वर
इसी अध्याय में, कुछ ही पंक्तियाँ पहले, यीशु जक्कई के घर में कहते हैं: "मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया है।" वही मनुष्य का पुत्र यहाँ बैरियों के विषय में आदेश सुनाता है। लूका ने ये दोनों वाक्य जानबूझकर पास-पास रखे हैं, मानो कह रहा हो: इन्हें अलग मत करो। खोजनेवाला प्रेम और अन्तिम निर्णय एक ही हृदय से निकलते हैं। और फिर पद चौवालीस में वह कारण आता है जो सब कुछ जोड़ देता है: "क्योंकि तूने वह अवसर जब तुझ पर कृपादृष्टि की गई न पहचाना।" न्याय का आधार कोई मनमानी नहीं, बल्कि एक ठुकराया हुआ अवसर है। कृपा जब सामने आकर खड़ी हो और उसे पहचाना न जाए, तो वह अपने आप किसी निर्णय में बदल जाती है।
पहले सुननेवाले
जो लोग यरीहो की सड़क पर खड़े थे, वे इस दृष्टान्त को राजनीतिक रूप से सुन रहे थे। उन्हें आशा थी कि यीशु यरूशलेम पहुँचकर रोम को उखाड़ फेंकेंगे और परमेश्वर का राज्य दिखाई देने लगेगा। वे अपने आप को उन विश्वासयोग्य दासों में गिनते थे और "बैरी" का अर्थ उनके लिए स्पष्ट था: बाहरवाले, अन्यजाति, अत्याचारी। यीशु उनके हाथ से यह आराम छीन लेते हैं। जिस नगर के लोग राजा को नहीं चाहते, वह उनका अपना नगर है, और जिस पर वे थोड़ी देर बाद "धन्य है वह राजा" पुकारेंगे, उसी को वे हफ्ते भर में ठुकरा देंगे। पहले श्रोताओं के लिए यह पद एक दर्पण था जिसमें उन्होंने शत्रु का चेहरा देखने की आशा की थी, और अपना पाया।
कठिन प्रश्न
क्या यह आदेश सचमुच यीशु के विषय में कुछ कहता है, या यह केवल कहानी का हिस्सा है? ईमानदारी यही माँगती है कि हम दोनों अतियों से बचें। यह कहना कि यह केवल अरखिलाउस का चित्र है और इससे परमेश्वर का कोई लेना-देना नहीं, पाठ को निगल जाना है; यीशु ने यह वाक्य दृष्टान्त के अन्त में, निर्णायक स्थान पर रखा। पर यह कहना भी गलत होगा कि परमेश्वर एक प्रतिशोधी निरंकुश शासक हैं, क्योंकि कुछ पंक्तियों बाद वही व्यक्ति रो रहा है। बीच में जो बचता है वह उत्तर नहीं, भार है। कृपा को अन्तहीन रूप से टालना सम्भव नहीं। कोई द्वार एक दिन बन्द होता है, और बाइबल इस बात को चिकनी भाषा में नहीं कहती। मैं इससे अधिक नहीं जानता, और मुझे लगता है कि इस न जानने में चुप रहना ही उचित है। जो राजा अपने बैरियों के लिए क्रूस पर चढ़ा, उसके हाथ में यह निर्णय है, और यही एकमात्र सान्त्वना है जो मैं यहाँ सच्चाई से दे सकता हूँ।
चिंतन के प्रश्न
मेरे जीवन का कौन सा कमरा ऐसा है जिसके बारे में मैं प्रार्थना में कभी बात नहीं करता, और यह चुप्पी वास्तव में क्या कह रही है?
यदि अन्तिम निर्णय किसी नियम के नहीं बल्कि एक चेहरे के सामने होगा, तो उस चेहरे की कल्पना करते समय मेरे भीतर क्या जागता है, भय या विश्राम, और क्यों?
यीशु ने नगर पर इसलिए रोया क्योंकि उसने कृपादृष्टि का अवसर नहीं पहचाना; इस सप्ताह परमेश्वर ने कहाँ मेरी ओर देखा और मैंने उसे अनदेखा कर दिया?
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Luke 19:27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यरूशलेम पास था, भीड़ के दिल में उम्मीद उबल रही थी, "परमेश्वर का राज्य अभी प्रगट होनेवाला है।" यीशु ने उनकी आशा को कुचला नहीं, पर उसे एक दृष्टान्त देकर धीरज सिखाया। हमारी जल्दबाजी भी ऐसी ही है, हम चाहते हैं कि परमेश्वर अभी, आज ही सब ठीक कर दे। पर वह बीच के समय को खाली नहीं छोड़ता, उसमें काम सौंपता है। तुम्हें जो सौंपा गया, क्या तुम उसमें विश्वासयोग्य हो?
यरूशलेम में प्रवेश करने से पहले यीशु ने अपने चेलों को यही एक जवाब सिखाया, "प्रभु को इसकी आवश्यकता है।" जिसने सारी सृष्टि बनाई, उसे एक उधार के गदहे की ज़रूरत पड़ी। सोच, तेरे पास जो छोटा सा है, वह भी उसके काम आ सकता है। सवाल यह है कि जब वह मांगे, तो तू रस्सी खोलने को तैयार है या नहीं?
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