गिनती 36
पाठ
गिलाद के घराने के मुखिया मूसा के पास आते हैं, एक व्यावहारिक चिंता लेकर: सलोफाद की बेटियों को पिता का भाग तो मिल गया, परन्तु यदि वे दूसरे गोत्र में ब्याही जाएँ तो वह भूमि सदा के लिए मनश्शे के हाथ से निकल जाएगी, और जुबली के वर्ष में भी वापस नहीं आएगी। मूसा यहोवा से आज्ञा पाकर उत्तर देते हैं, और उत्तर में दोनों बातें साथ रहती हैं: "जो वर जिसकी दृष्टि में अच्छा लगे वह उसी से ब्याही जाए; परन्तु वे अपने मूलपुरुष ही के गोत्र के कुल में ब्याही जाएँ।" पाँचों बहनें ऐसा ही करती हैं, अपने चचेरे भाइयों से ब्याह करती हैं, और भाग मनश्शे के भीतर बना रहता है। और इसी शान्त, लगभग नीरस विवरण पर गिनती की पूरी पुस्तक समाप्त हो जाती है, मोआब के अराबा में, यरदन के किनारे, देश में प्रवेश से एक कदम पहले।
मर्म
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर यहाँ किस बात की चिंता करते हैं। चालीस वर्ष के भटकाव, बलवे, महामारी और न्याय के बाद, अन्तिम अध्याय ज़मीन के एक टुकड़े के बारे में है जो किसी परिवार के हाथ से निकल सकता है। यह छोटी बात लगती है, परन्तु यहीं वाचा का पूरा भार टिका है: भाग केवल सम्पत्ति नहीं, यह प्रतिज्ञा का ठोस रूप है, परमेश्वर के वचन का नक्शे पर उतरा हुआ चिह्न। जो परमेश्वर अपने वादे को इतनी गम्भीरता से लेते हैं कि वे एक कुल की सीमा-रेखा तक की रक्षा करते हैं, वे अपने लोगों को हवा में लटकी आशा नहीं देते। और ध्यान दीजिए कि उत्तर में स्वतंत्रता भी बची रहती है: बेटियों की पसंद मिटाई नहीं जाती, केवल एक सीमा के भीतर रखी जाती है। परमेश्वर की व्यवस्था इच्छा को कुचलती नहीं, उसे टिकाऊ बनाती है।
सूत्र
गिनती की पुस्तक ज़मीन की सीमा पर खत्म होती है, और ज़मीन की सीमा पर ही परमेश्वर की एक ज़िद दिखाई देती है: जो उन्होंने दिया है, वह वापस नहीं छिनना चाहिए। जुबली की व्यवस्था (लैव्यव्यवस्था 25) इसी ज़िद का उत्सव है, हर पचासवें वर्ष हर भाग अपने घराने में लौट आता है, क्योंकि भूमि अन्ततः परमेश्वर की है और मनुष्य केवल उसका पालक है। यहाँ चिंता यही है कि एक ऐसा छेद न बन जाए जिससे जुबली भी भाग वापस न ला सके। और यहीं से एक धागा नए नियम तक जाता है, जहाँ विश्वासियों को ऐसी मीरास का वचन मिलता है जो मुरझाती नहीं और जिसे कोई गोत्र-बदल छीन नहीं सकता। मसीह में भाग की रक्षा कानून की बाड़ से नहीं, स्वयं उनके जीवित रहने से होती है।
दर्पण
यह अध्याय उस जगह उँगली रखता है जहाँ हम सबसे कम आत्मिक होते हैं: ज़मीन का कागज़, पिता की वसीयत, भाइयों के बीच बँटवारा, वह प्लॉट जिसके कारण दो परिवार दस साल से नहीं बोलते। गिलाद के मुखिया कोई खलनायक नहीं हैं; वे वही डर बोल रहे हैं जो हमारे भीतर भी बैठा है, कि जो मेरा है वह घट जाएगा। परमेश्वर उस डर को झिड़कते नहीं, उसे व्यवस्था देते हैं। परन्तु ध्यान दीजिए, वे भाग को कभी "अधिकार" की भाषा में अकेला नहीं छोड़ते; वह सदा किसी से मिला हुआ है। आज अपने घर का कोई एक कागज़ हाथ में लीजिए, मकान का, ज़मीन का या बैंक का, और उसे थामे हुए ऊँची आवाज़ में कहिए: "यह मेरा भाग है, और यह आपके हाथ से मिला है", और उसी साँस में उस एक व्यक्ति का नाम लेकर प्रार्थना कीजिए जिसके साथ इसी चीज़ को लेकर तनाव है।
श्रोता
जो लोग यह सुन रहे थे, उनके पास एक इंच भी ज़मीन नहीं थी। वे तम्बुओं में रहते थे, यरदन के पूर्व, और उन्हें ऐसे नियम सुनाए जा रहे थे जैसे नक्शा पहले से खिंच चुका हो। यह विश्वास की एक अजीब कसरत है: उस विरासत के झगड़े का समाधान सुनना जो अभी मिली ही नहीं। उनके कानों में "गोत्र" कोई ठंडा शब्द नहीं था, वह उनकी पहचान, सुरक्षा और स्मृति थी; गोत्र से भाग निकल जाना मानो पुरखों का नाम मिट जाना था। और सलोफाद की बेटियों के नाम, महला, तिर्सा, होग्ला, मिल्का और नोवा, दूसरी बार गिनाए जाते हैं। एक ऐसे समाज में जहाँ स्त्रियों के नाम शायद ही दर्ज होते थे, यह दोहराव अपने आप में एक घोषणा है।
प्रश्न
पर ईमानदारी से: क्या यहाँ बेटियों की जीत थोड़ी छोटी नहीं कर दी गई? अध्याय सत्ताईस में उन्होंने साहस करके भाग माँगा और पाया; यहाँ पुरुष आते हैं, और यहोवा कहते हैं, "यूसुफियों के गोत्री ठीक कहते हैं", और उनके विवाह की परिधि सिकुड़ जाती है। हाँ, "जो वर जिसकी दृष्टि में अच्छा लगे" बना रहता है, परन्तु एक बाड़ के भीतर। क्या यह न्याय है या समझौता? पाठ इसका उत्तर नहीं देता, और मुझे इसे चिकना कर देना ईमानदार नहीं लगता। शायद यही सच्चाई है कि परमेश्वर की व्यवस्था टूटे हुए ढाँचों के भीतर काम करती है, उन्हें एक साथ थामती भी है और धीरे-धीरे खोलती भी। बहनें मान जाती हैं। पाठ उनकी भावना नहीं बताता। उस मौन में कुछ है जिसे जल्दी भरना नहीं चाहिए।
संदर्भ
स्थान: मोआब का अराबा, यरीहो के सामने, यरदन के तट पर। समय: चालीस वर्ष के भटकाव का अंतिम पड़ाव, जब पहली पीढ़ी मर चुकी है और दूसरी गिनती हो चुकी है। भूमि चिट्ठी डालकर बाँटी जानी है, गोत्र और कुल के अनुसार, ताकि हर घराने का हिस्सा उसके नाम से जुड़ा रहे। विवाह इस समाज में दो व्यक्तियों का निजी मामला नहीं था, वह सम्पत्ति, वंश और शक्ति का पुनर्वितरण था। इसलिए बेटियों के विवाह का सवाल तुरंत भूमि का सवाल बन जाता है। और पुस्तक का अन्तिम वाक्य इसी को मुहर लगाता है: ये आज्ञाएँ मूसा के द्वारा दी गईं, वहीं, नदी के किनारे, प्रवेश से ठीक पहले।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा "भाग" आप अपनी मेहनत का फल मानते हैं, और यदि आप उसे मिला हुआ मानकर देखें तो उसके बारे में आपकी बातचीत कैसे बदल जाएगी?
पाँच बहनें बिना किसी दर्ज शिकायत के मान गईं; क्या आपके जीवन में कोई ऐसी सीमा है जिसे परमेश्वर ने रखा है और आप उसके भीतर अब तक चुपचाप नहीं रह पाए?
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