नीतिवचन 16:16
पाठ
यह वचन एक व्यापारी की तरह हिसाब लगाता है, पर उसका माल अजीब है। "बुद्धि की प्राप्ति शुद्ध सोने से क्या ही उत्तम है! और समझ की प्राप्ति चाँदी से बढ़कर योग्य है।" यहाँ बुद्धि की तुलना किसी नैतिक गुण से नहीं, बल्कि उस चीज़ से की गई है जिसे प्राचीन संसार सबसे ठोस, सबसे भरोसेमंद संपत्ति मानता था: तपाया हुआ सोना और तौला हुआ चाँदी। कहनेवाला यह नहीं कह रहा कि धन बुरा है। वह कह रहा है कि एक ऐसी वस्तु है जिसे पाने में लगाया गया जीवन सोने के ढेर पर बैठे जीवन से बेहतर सौदा है। यह भावुक प्रशंसा नहीं, यह मूल्य-सूची है, और उसमें आपका नाम भी दर्ज है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि दोनों पंक्तियों में क्रिया "प्राप्ति" है, अर्जन। बुद्धि विरासत में नहीं मिलती, वह मुफ़्त में हवा की तरह नहीं आती; उसे खरीदना पड़ता है, और उसकी कीमत समय, ध्यान, विनम्रता और सुधार सह लेने की तैयारी है। यही इस वचन की धार है। हम मानते हैं कि परमेश्वर से मिलनेवाली हर चीज़ बिना मोल की है, और उद्धार निश्चय ही अनुग्रह से है; परंतु उस अनुग्रह के भीतर जीना सीखना एक अर्जन है। इसी अध्याय में लिखा है कि "यहोवा मन को तौलता है" और "सच्चा तराजू और पलड़े यहोवा की ओर से होते हैं।" परमेश्वर स्वयं मूल्य तय करते हैं। इसलिए बुद्धि का मूल्य बाज़ार नहीं, सृष्टिकर्ता ठहराते हैं, और उनका तराजू कहता है: सोना हल्का है।
जोड़ने वाला सूत्र
नीतिवचन में बुद्धि कोई अमूर्त गुण नहीं रहती; अध्याय आठ में वह गली में खड़ी होकर पुकारती है, और सृष्टि के समय परमेश्वर के पास मौजूद है। यही कारण है कि नया नियम बिना खींचतान के यीशु मसीह को परमेश्वर की बुद्धि कहता है, वह जिसमें ज्ञान और बुद्धि के सारे भण्डार छिपे हैं। तब यह वचन एक नया रंग ले लेता है: सोने से उत्तम प्राप्ति अंततः कोई वस्तु नहीं, एक व्यक्ति है। और यीशु ने स्वयं यही सौदा एक कहानी में रखा, जब उन्होंने उस व्यापारी की बात की जिसने एक अनमोल मोती पाकर अपना सब कुछ बेच डाला। मूल्य-सूची वही है, केवल अब खरीदार को यह पता चलता है कि जिसे वह खरीद रहा है, उसने पहले उसे अपने लहू से मोल लिया।
दर्पण
यह वचन आपके बटुए में नहीं, आपके कैलेंडर में झाँकता है। पिछले महीने आपने पदोन्नति, निवेश या मकान की किस्त पर कितने घंटे सोचा, और अपने क्रोध के ढर्रे पर कितने मिनट? हम पैसे की योजना बनाते हैं और चरित्र को संयोग पर छोड़ देते हैं। बुद्धि की कीमत प्रायः असुविधाजनक रूप में आती है: वह सहकर्मी जो आपकी कमज़ोरी पर उंगली रखता है, वह जीवनसाथी जो वही पुरानी शिकायत दोहराता है, वह मित्र जिसकी सलाह आपने "वह मेरी परिस्थिति नहीं समझता" कहकर टाल दी। हर बार जब हम सुधार को अपमान समझकर लौटा देते हैं, हम सोने के बदले धूल चुन रहे होते हैं। और आगे इसी अध्याय में चेतावनी है: "ऐसा भी मार्ग है, जो मनुष्य को सीधा जान पड़ता है, परन्तु उसके अन्त में मृत्यु ही मिलती है।"
आज ही उस एक व्यक्ति को संदेश भेजिए जिसकी आलोचना आपने पिछली बार टाल दी थी, और उसमें केवल इतना लिखिए: "आपने जो कहा था, मैं उस पर सोच रहा हूँ। कृपया एक बात और साफ़ कहिए।"
एक बारीकी
"शुद्ध सोना" यूँ ही नहीं लिखा गया। इब्रानी में यहाँ जो शब्द है, वह उस सोने के लिए है जिसे आग में तपाकर मैल निकाला गया हो, सबसे खरा, सबसे महँगा। कहनेवाला तुलना को कमज़ोर नहीं करता; वह सोने का सबसे अच्छा नमूना मेज़ पर रखता है और फिर कहता है कि बुद्धि उससे भी ऊपर है। यह वैराग्य का उपदेश नहीं है, यह तुलनात्मक निवेश की बात है। जो सोना आग में तपकर खरा हुआ, उसे भी बुद्धि के सामने रखा जाए तो वह हल्का पड़ता है, क्योंकि सोना आपको दफ़नाए जाने तक ही साथ देता है, जबकि समझ आपके पैरों को उस मार्ग पर स्थिर रखती है जहाँ सोना किसी काम नहीं आता।
अन्य वचनों की गूँज
सुलैमान की अपनी कहानी इस वचन की जीवित व्याख्या है। गिबोन में जब परमेश्वर ने उससे कहा कि जो चाहे माँग ले, उसने धन या शत्रुओं का नाश नहीं, न्याय करने के लिए समझनेवाला मन माँगा, और उसे बाकी सब भी मिला। पर वही सुलैमान बाद में सोने और घोड़ों और स्त्रियों के ढेर में डूब गया, मानो उसने अपनी ही मूल्य-सूची भुला दी हो। इसलिए यह वचन केवल शुरुआत की प्रार्थना नहीं, आजीवन दोहराया जानेवाला हिसाब है। इसी अध्याय की एक और पंक्ति उसे रोज़ के व्यवहार में उतार देती है: "अन्याय के बड़े लाभ से, न्याय से थोड़ा ही प्राप्त करना उत्तम है।"
पृष्ठभूमि
अध्याय सोलह के ये वचन राजदरबार की गंध लिए हुए हैं। ठीक ऊपर की पंक्तियाँ राजा के क्रोध, उसकी प्रसन्नता और उसके न्याय की बात करती हैं। यानी यह उपदेश उन युवकों के लिए लिखा गया जो सत्ता के गलियारों में करियर बना रहे थे, जहाँ चढ़ने का सबसे तेज़ रास्ता चापलूसी, तौल में हेराफेरी और सही समय पर सही रिश्वत था। ऐसे माहौल में सोना केवल धन नहीं, सुरक्षा और पहुँच का नाम था। और ठीक वहीं शिक्षक कहता है: जिस चीज़ को यह पूरा तंत्र सबसे ऊँचा मानता है, वह दूसरे दर्जे की है। यह उस समय के कान में उतना ही चुभनेवाला वाक्य था जितना आज।
मनन के प्रश्न
पिछले तीस दिनों में आपने अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में जितना समय लगाया, उसका कितना हिस्सा आपने अपने चरित्र की किसी एक कमज़ोरी पर लगाया?
किस व्यक्ति की सच्ची बात को आप इसलिए अनसुना करते हैं क्योंकि उसे मानने की कीमत आपकी प्रतिष्ठा है?
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Proverbs 16 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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