भजन संहिता 123
पाठ
दास की आँखें मालिक के हाथ पर टिकी रहती हैं, दासी की आँखें स्वामिनी के हाथ पर; न चेहरे पर, न आवाज़ पर, बल्कि हाथ पर, क्योंकि हाथ ही संकेत देता है, हाथ ही रोटी देता है और हाथ ही मारता है। यही इस छोटे से भजन की पूरी तस्वीर है। गायक स्वर्ग में विराजमान परमेश्वर की ओर आँखें उठाता है, फिर "मैं" से "हम" में बदल जाता है, और दो बार वही पुकार दोहराता है: "हम पर दया कर, हे यहोवा, हम पर कृपा कर।" कारण साफ़ है: "हम अपमान से बहुत ही भर गए हैं।" सुखी लोगों का उपहास और अहंकारियों की तिरस्कार भरी हँसी, बस इतना ही बोझ है, और वही काफ़ी है।
मर्म
ध्यान दीजिए, यह भजन परमेश्वर से बदला नहीं माँगता। मज़ाक उड़ाने वालों पर आग गिराने की प्रार्थना नहीं है। केवल "दया"। यह भजन मानता है कि जो अपमानित है, उसके पास अधिकार का कोई दावा नहीं बचा; उसके पास केवल याचना बची है। दास-स्वामी की उपमा हमें असहज करती है, और करनी भी चाहिए, क्योंकि वह ठीक यही कहना चाहती है: यहाँ कोई सौदेबाज़ी नहीं हो रही। जो आँखें हाथ पर टिकी हैं, वे न समय तय करती हैं, न तरीका। "जब तक वह हम पर दया न करे" में एक अनिश्चित प्रतीक्षा छिपी है, और साथ ही एक दृढ़ निश्चय भी: हम दूसरी ओर नहीं देखेंगे। विश्वास यहाँ उत्तर पाने का भरोसा नहीं, देखते रहने का संकल्प है।
सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में परमेश्वर बार-बार उन्हीं के पक्ष में खड़े होते हैं जिनके पास केवल आँखें बची हैं। मिस्र में दासों की कराह ऊपर पहुँची, और परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाया; यह भजन उसी स्मृति पर जीता है। फिर मसीह आते हैं, जो स्वयं "दास का रूप" लेकर अपमान और उपहास से भर गए, क्रूस के नीचे खड़े अहंकारियों की हँसी सहते हुए। यहाँ उपमा पलट जाती है: जिसकी आँखें पिता के हाथ पर टिकी थीं, वही हाथ उसके लिए मौन रहा, ताकि हमारे लिए खुल जाए। इसलिए मसीही इस भजन को अनाथ होकर नहीं गाता। जिस हाथ की ओर वह देखता है, वह हाथ अब घायल है, और वह घाव ही दया का प्रमाण है।
दर्पण
अपमान का बोझ बहुत ही आधुनिक चीज़ है। दफ़्तर की उस मीटिंग में जहाँ आपकी बात को हल्के से टाल दिया गया; परिवार के उस समूह में जहाँ आपके विश्वास को पिछड़ापन कहकर हँसी उड़ाई जाती है; उस रिश्तेदार के सामने जिसके पास पैसा है और इसलिए राय भी है। "सुखी लोगों का उपहास" आज भी सबसे चुभने वाला हथियार है, क्योंकि वह आपको गिराता नहीं, छोटा करता है। और हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया यह होती है कि हम अपनी इज़्ज़त खुद वापस छीनने निकल पड़ते हैं, तर्क से, तानों से, सफलता दिखाकर। यह भजन हाथ नीचे करवाता है और आँखें ऊपर उठवाता है। आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके तानों ने आपको छोटा किया, और उस नाम को सामने रखकर ज़ोर से कहिए, "हम पर दया कर, हे यहोवा।"
शास्त्र का अंतर्संवाद
भजन 121 में भी आँखें उठती हैं, पर पहाड़ों की ओर, और वहाँ से प्रश्न उठता है कि सहायता कहाँ से आएगी; यहाँ प्रश्न ख़त्म हो चुका है, आँखें सीधे सिंहासन पर हैं। यात्रा के इन भजनों में यह एक क़दम आगे बढ़ना है। दूसरी गूँज नहेमायाह की पुस्तक में सुनाई देती है: शहरपनाह बनाते लौटे हुए बंदी सम्बल्लत और तोबियाह के ठहाकों का निशाना बनते हैं, और नहेमायाह ठीक इसी भजन की भाषा में प्रार्थना करता है कि हमारा अपमान सुना जाए। और नए नियम में यह पुकार मसीह के पैरों तक पहुँचती है: सड़क किनारे बैठा अंधा, दूर खड़े कोढ़ी, मंदिर में सिर झुकाए चुंगी लेने वाला, सब एक ही वाक्य बोलते हैं, "मुझ पर दया कर।" और उन्हीं के बारे में यीशु कहते हैं कि वे धर्मी ठहरकर घर गए।
श्रोताओं का चेहरा
यह "यात्रा का गीत" है, यरूशलेम चढ़ते तीर्थयात्रियों का। सम्भवतः निर्वासन से लौटे हुए लोग, जो अपने ही देश में छोटे, ग़रीब और मज़ाक के पात्र थे। उनका मंदिर पुराने मंदिर के सामने फीका था, उनकी शहरपनाह अधूरी, उनके पड़ोसी सम्पन्न और व्यंग्य में निपुण। "सुखी लोग" उनके लिए कोई अमूर्त श्रेणी नहीं थी, वे चेहरे थे जिन्हें वे नाम से जानते थे। और दास-दासी की उपमा उनके लिए रूपक नहीं, रोज़मर्रा का दृश्य था: घर के कोने में खड़ा सेवक, जिसकी नज़र मालकिन के हाथ के हल्के इशारे पर टिकी है। वे गाते-गाते चढ़ाई चढ़ते थे और इस भजन में अपनी पूरी सामाजिक स्थिति को परमेश्वर के सामने रख देते थे, बिना उसे सुंदर बनाए।
कठिन प्रश्न
"जब तक वह हम पर दया न करे" में एक काँटा है। और अगर वह समय बहुत लम्बा हो जाए? भजन इसका उत्तर नहीं देता, और यही उसकी ईमानदारी है। यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने तुरंत सुन लिया; भजन इसी प्रतीक्षा में ख़त्म होता है, अपमान से भरे हुए जीव के साथ। दास के पास यही विकल्प है: वह मालिक का हाथ हिलने पर मजबूर नहीं कर सकता। हम इसे जल्दी से "परमेश्वर का समय सबसे अच्छा होता है" कहकर ढाँप देते हैं, पर यह भजन इतनी आसानी नहीं देता। वह केवल इतना कहता है कि आँखें हटाना सबसे बड़ा नुक़सान होगा, क्योंकि जिस दिन हम अन्यत्र देखने लगेंगे, उस दिन दया आएगी भी तो हम उसे पहचानेंगे नहीं।
मनन के प्रश्न
किस अपमान को आप अब तक परमेश्वर के सामने रखने के बजाय स्वयं सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, और क्यों?
अगर आपकी आँखें सचमुच "हाथ" पर टिकी होतीं, तो इस सप्ताह आपका कौन-सा निर्णय बदल जाता?
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Psalms 123 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 123 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 123 किस विषय में है?
भजन संहिता 123 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 123 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 123 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 123 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मैं अपनी नज़र तुझ पर टिकाता हूँ। इधर उधर देखकर थक गया हूँ, हर जगह हल ढूँढ़ा पर मन शांत नहीं हुआ। तू ऊपर से सब देखता है, और मेरी छोटी सी ज़िंदगी भी तेरी नज़र से छूटी नहीं। आज बस तेरी ओर देखना मुझे सिखा दे।
धन्यवाद, प्रभु, कि जब तानों और अपमान से मन भर जाता है, तब भी हम आँखें उठाकर तुझसे कह सकते हैं, "हम पर अनुग्रह कर।" तेरा द्वार कभी बंद नहीं होता, तेरी दया हर सुबह नई मिलती है, और तूने हमारी दबी हुई पुकार भी सुनी है।
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