बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 42

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

दिन भर एक ही ताना कानों में गूँजता है: "तेरा परमेश्वर कहाँ है?" यही इस भजन की चोट है। कवि मंदिर से दूर, यरदन और हेर्मोन के इलाके में पड़ा है, और प्यास से हाँफते हिरन की तरह जीवित परमेश्वर को तरसता है। उसे वे दिन याद आते हैं जब वह जयजयकार करती भीड़ के बीच परमेश्वर के भवन तक जाया करता था, और यह स्मृति उसे सांत्वना नहीं, शोक देती है। दो बार वह अपने ही प्राण से बहस करता है: "हे मेरे प्राण, तू क्यों गिरा जाता है?" और दोनों बार उत्तर वही है, आशा परमेश्वर पर टिकाए रख। बीच में लहरों में डूबने की तस्वीर है और रात में गाए जाने वाले गीत का वादा भी।

मर्म

यह भजन प्यास को आत्मा की सबसे सच्ची अवस्था बताता है। इब्रानी में जिस शब्द का अनुवाद "प्राण" हुआ है, वह नेफ़ेश है, जिसका मूल अर्थ गला भी है, वही अंग जो प्यास महसूस करता है। यानी मनुष्य कोई ऐसा प्राणी नहीं जो परमेश्वर को एक विकल्प की तरह चुनता है; वह गले तक खोखला है और केवल परमेश्वर से भरता है। यहाँ सृष्टि का धर्मशास्त्र और उद्धार का धर्मशास्त्र एक हो जाते हैं: जिसने हमें बनाया, वही हमारी प्यास भी है। और ध्यान दीजिए, कवि किसी अनुभव, किसी शांति, किसी उत्तर को नहीं तरसता। वह "जीविते परमेश्वर" को तरसता है। अनुग्रह का पहला चिह्न यही है, कि उपहासों के बीच भी प्यास मरी नहीं।

सूत्र

वाचा की भाषा इस भजन के नीचे बहती है। "यहोवा अपनी शक्ति और करुणा प्रगट करेगा" में जो शब्द करुणा के लिए है, वह वाचा-प्रेम है, वह निष्ठा जिसकी परमेश्वर ने इस्राएल से शपथ खाई थी। इसीलिए कवि शिकायत कर सकता है, "तू मुझे क्यों भूल गया?" शिकायत केवल वहीं संभव है जहाँ वादा पहले से हो। और यही सूत्र गतसमनी तक जाता है, जहाँ प्रभु यीशु ने लगभग इन्हीं शब्दों में कहा कि उनका प्राण शोक से भरा है (मरकुस 14:34)। जिस परित्याग को यह भजनकार गाता है, उसे मसीह ने पूरी गहराई तक पिया, ताकि हमारी प्यास किसी सूखे कुएँ पर न, बल्कि उन पर जा टिके जो स्वयं जीवन का जल हैं।

दर्पण

यह भजन उस श्रद्धालु का भ्रम तोड़ता है जो मानता है कि सच्चा विश्वासी उदास नहीं होता। यहाँ एक आदमी है जो कभी उपासना का अगुवा था, और अब आँसू ही उसका भोजन हैं। शायद आप वह हैं जिसकी नौकरी छूटी और रविवार को गाना मुँह में अटक जाता है। शायद घर में कोई बीमारी है और पड़ोसी की सहानुभूति भरी नज़र में वही सवाल छिपा है, "तेरा परमेश्वर कहाँ है?" भजनकार आपको तुरंत मुस्कुराने को नहीं कहता। वह अपने प्राण से बात करता है, उसे डाँटता भी है और आशा दिलाता भी है। विश्वास कभी-कभी यही है: अपने भीतर के उस हिस्से से बात करना जो हार मान चुका है।

श्रोता

पहले सुननेवाले कोरह के वंशज थे, मंदिर के गायक। उनके लिए यह गीत सैद्धांतिक नहीं था। इस्राएल में परमेश्वर की उपस्थिति एक स्थान से जुड़ी थी, सिय्योन के भवन से; तीर्थयात्रा केवल परंपरा नहीं, वाचा का ठोस अनुभव थी। इसलिए मंदिर से दूर होना परमेश्वर के मुख से दूर होना लगता था, और "मैं कब जाकर परमेश्वर को अपना मुँह दिखाऊँगा?" एक तड़प भरा कानूनी सवाल भी था। साथ ही, प्राचीन पूर्व में देवता की सामर्थ्य उसके उपासक की परिस्थिति से नापी जाती थी। शत्रुओं का ताना इसलिए धर्म पर नहीं, परमेश्वर की प्रतिष्ठा पर हमला था। हारा हुआ भक्त, हारा हुआ देवता, यही उनका तर्क था।

प्रश्न

तो क्या भजन के अंत तक कुछ बदलता है? ईमानदारी से, नहीं। पाँचवें और ग्यारहवें पद में वही सवाल, वही जवाब दोहराया जाता है, मानो पूरे संघर्ष के बाद आदमी वहीं खड़ा है जहाँ से चला था। शत्रु अब भी ताना मार रहे हैं, मंदिर अब भी दूर है। हम चाहते हैं कि भजन उद्धार की गवाही पर समाप्त हो, पर यह केवल आशा पर समाप्त होता है, और आशा भविष्य काल में बोलती है, "मैं फिर उसका धन्यवाद करूँगा।" शायद यही सबसे सच्ची बात है जो पवित्रशास्त्र दुख के बारे में कहता है: कुछ अंधेरे हल नहीं होते, उनमें से गुज़रा जाता है। बदला हुआ यह नहीं कि हालात सुधरे, बल्कि यह कि आदमी अब अकेला बड़बड़ा नहीं रहा, वह परमेश्वर से बोल रहा है।

पृष्ठभूमि

भौगोलिक संकेत साफ़ हैं: यरदन का उद्गम क्षेत्र, हेर्मोन के पहाड़, मिसगार की पहाड़ी। यह इस्राएल का उत्तरी छोर है, यरूशलेम से कोसों दूर। वहाँ बर्फ पिघलकर तेज़ धाराओं में गिरती है, और वही आवाज़ कवि की तस्वीर बन जाती है, "जल, जल को पुकारता है।" पहाड़ी झरनों का शोर उसे बाढ़ जैसा लगता है जिसमें वह डूब रहा है, और वह इन लहरों को परमेश्वर की ही लहरें कहता है। यह निर्वासन हो सकता है, बीमारी, या राजनीतिक भागदौड़; पाठ नहीं बताता। पर स्थिति स्पष्ट है, वह अपमानित है, शक्तिहीन है, और उपासना के समुदाय से कटा हुआ है, जो उस संस्कृति में सामाजिक मृत्यु के बराबर था।

चिंतन

आपके भीतर वह कौन-सा हिस्सा है जो "गिरा जाता है", और क्या आपने कभी उससे सीधे, नाम लेकर बात की है, जैसे भजनकार करता है?

आपकी प्यास आजकल किसकी है: परमेश्वर के दिए हुए हल की, या स्वयं जीवित परमेश्वर की?

Psalms में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Songs of Jesus

Timothy Keller

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Psalms 1-72

Derek Kidner

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Psalms 73-150

Derek Kidner

The second half of the psalter with the same loved precision.

Reflections on the Psalms

C.S. Lewis

Lewis thinking out loud about praise, cursing psalms and joy.

Psalms Volume 1

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Psalms 42 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 42 का क्या अर्थ है?
दिन भर एक ही ताना कानों में गूँजता है: "तेरा परमेश्वर कहाँ है?
भजन संहिता 42 किस विषय में है?
वाचा की भाषा इस भजन के नीचे बहती है। "यहोवा अपनी शक्ति और करुणा प्रगट करेगा" में जो शब्द करुणा के लिए है, वह वाचा-प्रेम है, वह निष्ठा जिसकी परमेश्वर ने इस्राएल से शपथ खाई थी। इसीलिए कवि शिकायत कर सकता है, "तू मुझे क्यों भूल गया?" शिकायत केवल वहीं संभव है जहाँ वादा पहले से हो। और यही सूत्र गतसमनी तक जाता है, जहाँ प्रभु यीशु ने लगभग इन्हीं शब्दों में कहा कि उनका प्राण शोक से भरा है (मरकुस 14:34)। जिस परित्याग को यह भजनकार गाता है, उसे मसीह ने पूरी गहराई तक पिया, ताकि हमारी प्यास किसी सूखे कुएँ पर न, बल्कि उन पर जा टिके जो स्वयं जीवन का जल हैं।
भजन संहिता 42 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पहले सुननेवाले कोरह के वंशज थे, मंदिर के गायक। उनके लिए यह गीत सैद्धांतिक नहीं था। इस्राएल में परमेश्वर की उपस्थिति एक स्थान से जुड़ी थी, सिय्योन के भवन से; तीर्थयात्रा केवल परंपरा नहीं, वाचा का ठोस अनुभव थी। इसलिए मंदिर से दूर होना परमेश्वर के मुख से दूर होना लगता था, और "मैं कब जाकर परमेश्वर को अपना मुँह दिखाऊँगा?
भजन संहिता 42 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भौगोलिक संकेत साफ़ हैं: यरदन का उद्गम क्षेत्र, हेर्मोन के पहाड़, मिसगार की पहाड़ी। यह इस्राएल का उत्तरी छोर है, यरूशलेम से कोसों दूर। वहाँ बर्फ पिघलकर तेज़ धाराओं में गिरती है, और वही आवाज़ कवि की तस्वीर बन जाती है, "जल, जल को पुकारता है।" पहाड़ी झरनों का शोर उसे बाढ़ जैसा लगता है जिसमें वह डूब रहा है, और वह इन लहरों को परमेश्वर की ही लहरें कहता है। यह निर्वासन हो सकता है, बीमारी, या राजनीतिक भागदौड़; पाठ नहीं बताता। पर स्थिति स्पष्ट है, वह अपमानित है, शक्तिहीन है, और उपासना के समुदाय से कटा हुआ है, जो उस संस्कृति में सामाजिक मृत्यु के बराबर था।
भजन संहिता 42 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी प्यास आजकल किसकी है: परमेश्वर के दिए हुए हल की, या स्वयं जीवित परमेश्वर की?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Psalms 42 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 11

पिता, धन्यवाद कि जब मेरा प्राण गिरा जाता है और भीतर ही भीतर व्याकुल होता है, तब भी आप मेरे उद्धारकर्ता और मेरे परमेश्वर बने रहते हैं। धन्यवाद उस आशा के लिए जो आपने मेरे मन में रखी है, कि मैं फिर आपकी स्तुति करूँगा।

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