बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 51

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

एक आदमी परमेश्वर के सामने खड़ा है और उसके हाथ में देने के लिए कुछ नहीं है, सिर्फ़ अपना अपराध। वह धुलाई माँगता है, मिटाने की माँग करता है, और स्वीकार करता है कि उसका पाप उसकी माता के गर्भ तक पीछे जाता है। बीच में वह कुछ ऐसा माँगता है जो माँगा ही नहीं जा सकता: "हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर।" अंत में वह बलिदानों की पूरी व्यवस्था को एक तरफ़ रखकर कहता है कि परमेश्वर के योग्य बलिदान टूटा मन है, और फिर भी वह सिय्योन की शहरपनाह और वेदी के लिए प्रार्थना करता है। यह भजन क्षमा की भीख से शुरू होकर गवाही, स्तुति और नगर के नवीनीकरण पर समाप्त होता है।

मूल मर्म

पद 4 खटकता है: "मैंने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया।" जिस स्त्री का पति मारा गया, उसका क्या? भजनकार मनुष्यों के विरुद्ध किए गए अन्याय को छोटा नहीं कर रहा; वह उसकी असली गहराई खोल रहा है। पाप पहले नियम-उल्लंघन नहीं, वाचा-तोड़ना है, उस परमेश्वर के साथ रिश्ते का विश्वासघात जिसने इस्राएल को अपना बनाया। इसलिए समाधान भी कोई मरम्मत नहीं हो सकता। पद 10 का "उत्पन्न कर" वही क्रिया है जो उत्पत्ति 1 में शून्य से सृष्टि के लिए इस्तेमाल होती है (इब्रानी बारा)। भजनकार सुधार नहीं, सृजन माँग रहा है। यही अनुग्रह का तर्क है: जहाँ मनुष्य के पास योगदान देने को कुछ नहीं बचा, वहाँ परमेश्वर की करुणा शून्य से शुरू करती है, जैसे उसने आदि में किया था।

जुड़ा हुआ सूत्र

भजन का अंत खटकता है। पद 16 कहता है परमेश्वर होमबलि से प्रसन्न नहीं होता, और पद 19 कहता है तब वह धार्मिकता के बलिदानों से प्रसन्न होगा। यह विरोधाभास नहीं, क्रम है। जब तक हृदय टूटा नहीं, वेदी पर चढ़ा पशु एक रिश्वत है; जब हृदय टूट जाता है, वही पशु आराधना बन जाता है। पुराना नियम यहाँ अपनी ही व्यवस्था की सीमा पर खड़ा है: बलिदान पाप ढाँप सकते हैं, नया मन नहीं बना सकते। इसी खाली जगह में मसीह आते हैं, जिनका शरीर तोड़ा गया ताकि हमारा मन नया रचा जाए, और जिनका आत्मा वही देता है जो भजनकार पद 11 में माँग रहा है। यह भजन इसलिए मसीह की ओर इशारा करता है क्योंकि यह अपनी ही प्रार्थना पूरी नहीं कर सकता।

दर्पण

हम अपने पापों को घटनाएँ बनाकर सँभाल लेते हैं। वह एक बुरा दिन था, वह टिप्पणी थकान में निकली, वह हिसाब ज़रा खींचतान में बन गया, वह रिश्ता "जटिल" था। पद 5 इस बचाव को काट देता है: समस्या मेरी परिस्थिति नहीं, मेरी जड़ है। यही बात राहत भी देती है, क्योंकि अब मुझे अपने चरित्र का वकील बनने की ज़रूरत नहीं। घर पर जिस आदत पर आपकी पत्नी या पति ने पाँच साल में दस बार बात की है, दफ़्तर में जिस व्यक्ति के बारे में आप जानकारी को हथियार बनाते हैं, बैंक खाते में जिस ख़र्च को आप किसी को नहीं दिखाते: भजनकार कहता है इन्हें सुधारने की नहीं, नया मन पाने की ज़रूरत है। आज एक काग़ज़ पर एक वाक्य में वह बात लिखिए जिसे आप अब तक "हालात" कहकर टालते रहे हैं, उसके नीचे पद 10 अपने हाथ से लिखिए, और दोनों वाक्य ज़ोर से बोलकर पढ़िए।

मुख्य पात्र

भजनकार की आवाज़ में एक विचित्र संयोजन है: वह पूरी तरह टूटा है और पूरी तरह निर्भीक। वह अपने बारे में कोई अच्छी बात नहीं कहता, फिर भी परमेश्वर से बहुत कुछ माँगता है, और माँगता आदेश की तरह है: मिटा दे, धो, उत्पन्न कर, मुझे सम्भाल। यह बेशर्मी नहीं, वाचा का भरोसा है। वह जानता है कि जिस परमेश्वर के विरुद्ध उसने पाप किया, वही परमेश्वर करुणा में विश्वासयोग्य है। और ध्यान दीजिए, उसकी प्रार्थना अपने आराम पर नहीं रुकती: पद 13 में वह पहले से सोच रहा है कि क्षमा पाने के बाद वह अपराधियों को परमेश्वर का मार्ग सिखाएगा। क्षमा पाया पापी सबसे विश्वसनीय शिक्षक होता है, क्योंकि वह जो बताता है, वह उसने चुकाया नहीं, पाया है।

अन्तर्पाठ

२ शमूएल 12 में नातान राजा के सामने खड़ा होकर कहता है, तू ही वह मनुष्य है, और दाऊद बस इतना कहता है कि उसने पाप किया है। भजन 51 उस एक वाक्य का विस्तार है, वह प्रार्थना जो राजमहल के भीतर आँसुओं में बनी। दूसरी गूँज नए नियम में है: लूका 18:13 का चुंगी लेनेवाला मन्दिर में सिर्फ़ इतना कहता है कि परमेश्वर उस पापी पर दया करे, और यीशु कहते हैं वही धर्मी ठहराया गया लौटा। दोनों जगह एक ही बात सामने आती है: परमेश्वर के सामने खाली हाथ आना ही एकमात्र सही मुद्रा है, और यही मुद्रा सबसे ज़्यादा पाकर लौटती है।

बारीकी

पद 7 में "जूफा" छोटा शब्द है, पर वह पूरे भजन को खोल देता है। जूफा एक मामूली झाड़ी थी जिसकी टहनी से लहू या जल छिड़का जाता था, कोढ़ी की शुद्धि में और लाश छूने से हुई अशुद्धता में। यानी इस्राएल का राजा अपने लिए वही अनुष्ठान माँग रहा है जो नगर के बाहर बैठे अछूत के लिए था। वह यह नहीं कहता कि मुझसे ग़लती हो गई; वह कहता है मैं अशुद्ध हूँ, मुझे छिड़काव चाहिए। और फिर वह जोड़ता है कि धोने के बाद वह हिम से भी अधिक श्वेत होगा, जो कोई ग्रे रंग नहीं है। अनुग्रह अपराध को हल्का नहीं करता, वह उसे मिटाता है।

चिंतन

आप अपने जीवन की किस बात को अब तक "कमज़ोरी" कहकर सँभाले हुए हैं, जिसे इस भजन के अनुसार "अधर्म" कहना ही ईमानदारी होगी?

यदि परमेश्वर आज आपमें "शुद्ध मन उत्पन्न" करें, तो कल सुबह आपके घर या काम में सबसे पहले क्या बदलेगा?

Psalms में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Songs of Jesus

Timothy Keller

A year of daily devotions through every psalm, ideal alongside your reading.

Psalms 1-72

Derek Kidner

Kidner's crisp notes have helped generations pray the psalms.

Psalms 73-150

Derek Kidner

The second half of the psalter with the same loved precision.

Reflections on the Psalms

C.S. Lewis

Lewis thinking out loud about praise, cursing psalms and joy.

Psalms Volume 1

Gerald Wilson

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

Psalms 51 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 51 का क्या अर्थ है?
एक आदमी परमेश्वर के सामने खड़ा है और उसके हाथ में देने के लिए कुछ नहीं है, सिर्फ़ अपना अपराध। वह धुलाई माँगता है, मिटाने की माँग करता है, और स्वीकार करता है कि उसका पाप उसकी माता के गर्भ तक पीछे जाता है। बीच में वह कुछ ऐसा माँगता है जो माँगा ही नहीं जा सकता: "हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर।" अंत में वह बलिदानों की पूरी व्यवस्था को एक तरफ़ रखकर कहता है कि परमेश्वर के योग्य बलिदान टूटा मन है, और फिर भी वह सिय्योन की शहरपनाह और वेदी के लिए प्रार्थना करता है। यह भजन क्षमा की भीख से शुरू होकर गवाही, स्तुति और नगर के नवीनीकरण पर समाप्त होता है।
भजन संहिता 51 किस विषय में है?
भजन का अंत खटकता है। पद 16 कहता है परमेश्वर होमबलि से प्रसन्न नहीं होता, और पद 19 कहता है तब वह धार्मिकता के बलिदानों से प्रसन्न होगा। यह विरोधाभास नहीं, क्रम है। जब तक हृदय टूटा नहीं, वेदी पर चढ़ा पशु एक रिश्वत है; जब हृदय टूट जाता है, वही पशु आराधना बन जाता है। पुराना नियम यहाँ अपनी ही व्यवस्था की सीमा पर खड़ा है: बलिदान पाप ढाँप सकते हैं, नया मन नहीं बना सकते। इसी खाली जगह में मसीह आते हैं, जिनका शरीर तोड़ा गया ताकि हमारा मन नया रचा जाए, और जिनका आत्मा वही देता है जो भजनकार पद 11 में माँग रहा है। यह भजन इसलिए मसीह की ओर इशारा करता है क्योंकि यह अपनी ही प्रार्थना पूरी नहीं कर सकता।
भजन संहिता 51 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजनकार की आवाज़ में एक विचित्र संयोजन है: वह पूरी तरह टूटा है और पूरी तरह निर्भीक। वह अपने बारे में कोई अच्छी बात नहीं कहता, फिर भी परमेश्वर से बहुत कुछ माँगता है, और माँगता आदेश की तरह है: मिटा दे, धो, उत्पन्न कर, मुझे सम्भाल। यह बेशर्मी नहीं, वाचा का भरोसा है। वह जानता है कि जिस परमेश्वर के विरुद्ध उसने पाप किया, वही परमेश्वर करुणा में विश्वासयोग्य है। और ध्यान दीजिए, उसकी प्रार्थना अपने आराम पर नहीं रुकती: पद 13 में वह पहले से सोच रहा है कि क्षमा पाने के बाद वह अपराधियों को परमेश्वर का मार्ग सिखाएगा। क्षमा पाया पापी सबसे विश्वसनीय शिक्षक होता है, क्योंकि वह जो बताता है, वह उसने चुकाया नहीं, पाया है।
भजन संहिता 51 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 7 में "जूफा" छोटा शब्द है, पर वह पूरे भजन को खोल देता है। जूफा एक मामूली झाड़ी थी जिसकी टहनी से लहू या जल छिड़का जाता था, कोढ़ी की शुद्धि में और लाश छूने से हुई अशुद्धता में। यानी इस्राएल का राजा अपने लिए वही अनुष्ठान माँग रहा है जो नगर के बाहर बैठे अछूत के लिए था। वह यह नहीं कहता कि मुझसे ग़लती हो गई; वह कहता है मैं अशुद्ध हूँ, मुझे छिड़काव चाहिए। और फिर वह जोड़ता है कि धोने के बाद वह हिम से भी अधिक श्वेत होगा, जो कोई ग्रे रंग नहीं है। अनुग्रह अपराध को हल्का नहीं करता, वह उसे मिटाता है।
भजन संहिता 51 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि परमेश्वर आज आपमें "शुद्ध मन उत्पन्न" करें, तो कल सुबह आपके घर या काम में सबसे पहले क्या बदलेगा?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Psalms 51 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

पाप ने दाऊद की ज़बान पर ताला लगा दिया था। जो कभी भजन लिखता था, वह अब चुप था। इसलिए वह कहता है, "हे प्रभु, मेरा मुँह खोल दे, तब मैं तेरा गुणगान करूँगा।" ध्यान दे, वह शब्द नहीं माँगता, होंठ खुलने माँगता है। क्या तेरी भी कोई बात है जिसने तेरी आराधना को चुप करा रखा है? उसे क्षमा करने वाले के सामने रख दे।

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल की व्याख्याएँ तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडल का उपयोग करता है। हम धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सही रहने का पूरा प्रयास करते हैं, फिर भी यह सॉफ़्टवेयर त्रुटि कर सकता है। इस साधन को अपने निजी बाइबल अध्ययन और कलीसिया के संगति जीवन का स्थान लेने वाला न समझें, बल्कि उनके सहायक के रूप में प्रयोग करें।

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

कंपनी?