बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 85

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

भजन की शुरुआत बीते हुए कल की गवाही से होती है: "हे यहोवा, तू अपने देश पर प्रसन्न हुआ, याकूब को बँधुवाई से लौटा ले आया है।" परमेश्वर ने अधर्म क्षमा किया, पाप ढाँप दिए, अपना भड़का हुआ कोप दूर किया। पर पद 4 में सुर अचानक बदल जाता है, और वही गाने वाला समुदाय गिड़गिड़ाने लगता है: हमको पुनः स्थापित कर, क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा? फिर, पद 8 में, एक अकेली आवाज़ चुप होकर कान लगाती है, और जो उत्तर मिलता है वह किसी राजनीतिक वचन जैसा नहीं, बल्कि एक दृश्य जैसा है: करुणा और सच्चाई का मिलन, धर्म और मेल का चुम्बन, धरती से उगती सच्चाई और आकाश से झुकता धर्म, और अंत में ज़मीन अपनी उपज देती हुई।

मर्म

इस भजन को समझने के लिए उस धूल भरे यहूदा की कल्पना कीजिए जहाँ लोग लौट तो आए थे, पर लौटना ही सब कुछ नहीं था। बँधुवाई खत्म, मगर दीवारें अधूरी, फसल पतली, पड़ोसी ताकतवर, और मंदिर पहले वाले की छाया मात्र। यही इस भजन का धर्मशास्त्रीय दिल है: उद्धार का आरम्भ हो चुका है, पर उसका पूरा होना अभी बाकी है, और विश्वास इसी खाली जगह में साँस लेता है। इसलिए प्रार्थना याददाश्त से शुरू होती है, क्योंकि जो परमेश्वर एक बार क्षमा कर चुके हैं उन्हीं से दोबारा माँगने का अधिकार बनता है। और ध्यान दीजिए, माँग अच्छी फसल से पहले यह है कि "तू हमको फिर न जिलाएगा"। सच्ची बहाली बाहरी हालात का सुधार नहीं, परमेश्वर के साथ रिश्ते का पुनर्जीवन है; बाकी सब, उपज समेत, उसी के पीछे चलता है।

जोड़ने वाला धागा

पद 10 और 11 का दृश्य केवल कविता नहीं, यह परमेश्वर के सामने खड़ी सबसे पुरानी उलझन का हल है: क्षमा और न्याय एक साथ कैसे रहें? अगर परमेश्वर सच्चे हैं तो पाप को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते; अगर करुणामय हैं तो दोषी को छोड़ नहीं सकते। लौटे हुए यहूदियों के लिए यह सिर्फ़ सिद्धांत नहीं था, उनका पूरा इतिहास इसी तनाव में जला था। भजनकार कहता है कि एक दिन ये दोनों आमने-सामने आकर गले मिलेंगे। और ध्यान दीजिए दिशा पर: सच्चाई पृथ्वी में से उगती है, धर्म स्वर्ग से झुकता है, यानी मिलन का स्थान ज़मीन है, आसमान नहीं। यूहन्ना के सुसमाचार की पहली आयतें ठीक यही कहती हैं, कि वचन देह बनकर हमारे बीच बसा, अनुग्रह और सच्चाई से भरपूर। जो इस भजन में दो गुण थे, वे मसीह में एक व्यक्ति बन गए।

दर्पण

हममें से बहुतों की ज़िंदगी पद 1 और पद 4 के बीच की पट्टी में बीतती है। वह लत टूट चुकी है, पर मन अब भी खाली लगता है। वह रिश्ता बच गया, माफ़ी भी माँगी गई, फिर भी रात के खाने की मेज़ पर ठंडापन बैठा रहता है। नौकरी मिल गई, कर्ज़ घट गया, पर भीतर कोई जान नहीं लौटी। ऐसे में सबसे बड़ा खतरा यह मान लेना है कि परमेश्वर का काम बस इतना ही था और आगे कुछ नहीं। यह भजन आपको वहाँ से उठाता है: बीती करुणा याद करना शिकायत का विकल्प नहीं, बल्कि दोबारा माँगने का आधार है। आज एक काग़ज़ पर एक वाक्य में वह एक बात लिखिए जो परमेश्वर ने आपके जीवन में बीते सालों में सचमुच की, उसे ज़ोर से पढ़िए, और फिर उसी साँस में पद 4 की प्रार्थना बोलिए: "हे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर, हमको पुनः स्थापित कर।"

बारीकी

"धर्म और मेल ने आपस में चुम्बन किया हैं।" उस ज़माने में चुम्बन कोई रोमानी इशारा नहीं था। यह सार्वजनिक दृश्य था: दो अधिकारी दरबार में मिलते, दो कुल वाचा बाँधते, मेज़बान अतिथि का स्वागत करता, और यह सब देखने वालों के सामने होता था, क्योंकि इसका अर्थ था कि अब इनके बीच कोई मुकदमा बाकी नहीं। भजनकार इन चार शब्दों को, करुणा (इब्रानी में हेसेद, वाचा निभाने वाली वफ़ादार प्रीति), सच्चाई, धर्म और मेल, दरबारी अधिकारियों की तरह आँगन में उतार देता है। जो लोग अदालतों, कर्ज़ों और ताकतवर पड़ोसियों के बीच जी रहे थे, उन्हें सुनाई दिया कि परमेश्वर के दरबार में झगड़ा निपट चुका है। और जहाँ ऊपर यह मेल हो जाए, वहाँ नीचे ज़मीन भी अपनी उपज देने लगती है।

प्रश्न

पद 3 कहता है कि परमेश्वर ने अपना भड़का हुआ कोप दूर कर दिया, और ठीक दो पंक्तियों बाद पद 5 रोता है, "क्या तू हम पर सदा कोपित रहेगा?" यह विरोधाभास भजन में बना रहता है, और वह इसे सुलझाता नहीं। क्षमा मिल चुकी थी, फिर भी हालात क्षमा जैसे नहीं लगते थे। क्या परमेश्वर ने मन बदल लिया, या यह लोगों का अनुभव था जो धर्मशास्त्र से पीछे चल रहा था? पद 8 में एक चेतावनी छिपी है, कि वे फिर मूर्खता न करने लगें, यानी शान्ति मिल तो सकती है और गँवाई भी जा सकती है। इसका ईमानदार उत्तर यही है कि कुछ देरी का कारण हमें नहीं बताया जाता। भजन उस अँधेरे को रौशन नहीं करता, बस उसमें कान लगाकर बैठना सिखाता है।

मुख्य पात्र

इस भजन का असली पात्र परमेश्वर हैं, और पहले तीन पदों की सारी क्रियाएँ उन्हीं की हैं: वे प्रसन्न हुए, वे लौटा लाए, उन्होंने क्षमा किया, ढाँपा, रोष शान्त किया। यह कोई भावहीन, दूर बैठा देवता नहीं है; इसका क्रोध सच्चा है, क्योंकि इसका प्रेम सच्चा है, और जो किसी बात से नाराज़ नहीं होता वह किसी से प्रेम भी नहीं करता। पर इस भजन का परमेश्वर क्रोध में टिकता नहीं, वह मुड़ता है। और अंतिम चित्र सबसे कोमल है: वे चलते हैं, आगे-आगे धर्म चलता है, और पीछे उनके पाँवों के चिन्ह रह जाते हैं जिन पर उनकी प्रजा चल सके। यह वह परमेश्वर है जो उद्धार देकर चले नहीं जाते, बल्कि रास्ता बनाकर साथ चलते हैं।

चिंतन

आपके जीवन में वह कौन सी जगह है जहाँ परमेश्वर का काम शुरू तो हुआ पर अधूरा लगता है, और आप उस अधूरेपन को शिकायत बनाते हैं या प्रार्थना?

पद 8 कहता है, "मैं कान लगाए रहूँगा।" इस हफ़्ते आपकी ज़िंदगी में कौन सी आवाज़ें परमेश्वर की बात सुनने की जगह घेर रही हैं?

Psalms में और गहराई से जानें

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The Songs of Jesus

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Psalms 85 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 85 का क्या अर्थ है?
भजन की शुरुआत बीते हुए कल की गवाही से होती है: "हे यहोवा, तू अपने देश पर प्रसन्न हुआ, याकूब को बँधुवाई से लौटा ले आया है।" परमेश्वर ने अधर्म क्षमा किया, पाप ढाँप दिए, अपना भड़का हुआ कोप दूर किया। पर पद 4 में सुर अचानक बदल जाता है, और वही गाने वाला समुदाय गिड़गिड़ाने लगता है: हमको पुनः स्थापित कर, क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा?
भजन संहिता 85 किस विषय में है?
पद 10 और 11 का दृश्य केवल कविता नहीं, यह परमेश्वर के सामने खड़ी सबसे पुरानी उलझन का हल है: क्षमा और न्याय एक साथ कैसे रहें? अगर परमेश्वर सच्चे हैं तो पाप को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते; अगर करुणामय हैं तो दोषी को छोड़ नहीं सकते। लौटे हुए यहूदियों के लिए यह सिर्फ़ सिद्धांत नहीं था, उनका पूरा इतिहास इसी तनाव में जला था। भजनकार कहता है कि एक दिन ये दोनों आमने-सामने आकर गले मिलेंगे। और ध्यान दीजिए दिशा पर: सच्चाई पृथ्वी में से उगती है, धर्म स्वर्ग से झुकता है, यानी मिलन का स्थान ज़मीन है, आसमान नहीं। यूहन्ना के सुसमाचार की पहली आयतें ठीक यही कहती हैं, कि वचन देह बनकर हमारे बीच बसा, अनुग्रह और सच्चाई से भरपूर। जो इस भजन में दो गुण थे, वे मसीह में एक व्यक्ति बन गए।
भजन संहिता 85 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"धर्म और मेल ने आपस में चुम्बन किया हैं।" उस ज़माने में चुम्बन कोई रोमानी इशारा नहीं था। यह सार्वजनिक दृश्य था: दो अधिकारी दरबार में मिलते, दो कुल वाचा बाँधते, मेज़बान अतिथि का स्वागत करता, और यह सब देखने वालों के सामने होता था, क्योंकि इसका अर्थ था कि अब इनके बीच कोई मुकदमा बाकी नहीं। भजनकार इन चार शब्दों को, करुणा (इब्रानी में हेसेद, वाचा निभाने वाली वफ़ादार प्रीति), सच्चाई, धर्म और मेल, दरबारी अधिकारियों की तरह आँगन में उतार देता है। जो लोग अदालतों, कर्ज़ों और ताकतवर पड़ोसियों के बीच जी रहे थे, उन्हें सुनाई दिया कि परमेश्वर के दरबार में झगड़ा निपट चुका है। और जहाँ ऊपर यह मेल हो जाए, वहाँ नीचे ज़मीन भी अपनी उपज देने लगती है।
भजन संहिता 85 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस भजन का असली पात्र परमेश्वर हैं, और पहले तीन पदों की सारी क्रियाएँ उन्हीं की हैं: वे प्रसन्न हुए, वे लौटा लाए, उन्होंने क्षमा किया, ढाँपा, रोष शान्त किया। यह कोई भावहीन, दूर बैठा देवता नहीं है; इसका क्रोध सच्चा है, क्योंकि इसका प्रेम सच्चा है, और जो किसी बात से नाराज़ नहीं होता वह किसी से प्रेम भी नहीं करता। पर इस भजन का परमेश्वर क्रोध में टिकता नहीं, वह मुड़ता है। और अंतिम चित्र सबसे कोमल है: वे चलते हैं, आगे-आगे धर्म चलता है, और पीछे उनके पाँवों के चिन्ह रह जाते हैं जिन पर उनकी प्रजा चल सके। यह वह परमेश्वर है जो उद्धार देकर चले नहीं जाते, बल्कि रास्ता बनाकर साथ चलते हैं।
भजन संहिता 85 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पद 8 कहता है, "मैं कान लगाए रहूँगा।" इस हफ़्ते आपकी ज़िंदगी में कौन सी आवाज़ें परमेश्वर की बात सुनने की जगह घेर रही हैं?
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Psalms 85 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

हे यहोवा, अपनी करुणा हमें दिखा, और अपना किया हुआ उद्धार हमें दे।" यह प्रार्थना उन लोगों की है जो लौट तो आए थे, पर टूटे हुए थे। बंधन खत्म हो चुका था, फिर भी दिल खाली था। शायद तेरी हालत भी ऐसी हो, बाहर से सब ठीक, भीतर सूखा। माँग ले, दिखावा मत कर। वह करुणा दिखाने से कभी पीछे नहीं हटता।

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