बाइबल व्याख्या

1 इतिहास 12

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सिकलग के दिनों से लेकर हेब्रोन के उत्सव तक, यह अध्याय उन लोगों की सूची है जो दाऊद के पास आए, जब वह अभी राजा नहीं, केवल भगोड़ा था। पहले गिने-चुने बिन्यामीनी और गादी, फिर यहूदा और बिन्यामीन के कुछ लोग, फिर मनश्शे के हजारों के मुखिए, और अंत में सब गोत्रों के लाखों हथियारबंद लोग, जो "सच्चे मन से" दाऊद को राजा बनाने आए। समापन तीन दिन के भोजन पर होता है, जहाँ गदहों और ऊँटों पर लदकर रोटी, अंजीर, दाखमधु और तेल आता है, "क्योंकि इस्राएल में आनन्द मनाया जा रहा था।"

मर्म

ध्यान दीजिए कि सूची कहाँ से शुरू होती है: "शाऊल के भाइयों में से बिन्यामीनी" (पद 2)। जो गोत्र दाऊद का सबसे स्वाभाविक शत्रु था, उसी से पहले नाम आते हैं। परमेश्वर का राज्य ऐसे ही बनता है, खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि उस खिंचाव से जो परमेश्वर स्वयं हृदय में डालते हैं। और यह राज्य धीरे-धीरे बनता है, "प्रतिदिन लोग दाऊद की सहायता करने को उसके पास आते रहे, यहाँ तक कि परमेश्वर की सेना के समान एक बड़ी सेना बन गई" (पद 22)। यहाँ कोई एक नाटकीय चमत्कार नहीं है। बस आना, रोज़ आना, जब तक कि भगोड़े का छोटा दल परमेश्वर की सेना न बन जाए। क्या परमेश्वर का काम हमारे बीच भी इसी गति से होता है, इतना धीमा कि हम उसे चमत्कार कहना भूल जाते हैं?

जोड़ने वाला सूत्र

पद 18 में एक शब्द छिपा है जो हिंदी अनुवाद में दब जाता है। "आत्मा अमासै में समाया" के पीछे इब्रानी क्रिया लावश है, जिसका अर्थ है "वस्त्र पहनना"। आत्मा ने अमासै को पहन लिया, जैसे कोई चोला पहनता है। वही शब्द गिदोन के लिए न्यायियों 6:34 में आता है, और वहाँ भी एक डरे हुए आदमी से अचानक आश्वस्त वाणी निकलती है। अमासै कोई भविष्यवक्ता नहीं था, वह एक योद्धा था, पर उसके मुँह से निकला: "हे दाऊद! हम तेरे हैं; हे यिशै के पुत्र! हम तेरी ओर के हैं।" अभिषिक्त राजा के चारों ओर एक जन इकट्ठा होता है, और वह इकट्ठा होना आत्मा का काम है। यही पैटर्न पिन्तेकुस्त तक चलता है, जहाँ दूसरे अभिषिक्त, यीशु मसीह, के चारों ओर आत्मा फिर एक जन को गढ़ता है।

दर्पण

दाऊद का पहला वाक्य संदेह का है, न कि स्वागत का: "यदि तुम मेरे पास मित्रभाव से… परन्तु जो तुम मुझे धोखा देकर मेरे शत्रुओं के हाथ पकड़वाने आए हो…" (पद 17)। जो आदमी वर्षों से भाग रहा है, वह हर आते हुए कदम में खतरा सुनता है। आप भी शायद यही करते हैं। वह सहकर्मी जो अचानक दयालु हो गया, वह रिश्तेदार जो सालों बाद संदेश भेजता है, वह नया व्यक्ति जो आपके समूह में बैठना चाहता है; आप पहले उसका मकसद तौलते हैं, फिर दिल। और कभी-कभी यह समझदारी होती है। पर दाऊद अपने संदेह के बावजूद दरवाज़ा खुला रखता है, और उन्हीं संदिग्धों को "अपने दल के मुखिए" ठहरा देता है। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके इरादों पर आपको संदेह है, और उसके लिए नाम लेकर दो मिनट प्रार्थना कीजिए।

प्रश्न

पद 19 कड़वा है। मनश्शेई दाऊद के पास तब भागे "जब वह पलिश्तियों के साथ होकर शाऊल से लड़ने को गया"। यह इतिहास की किताब दाऊद को आदर्श राजा के रूप में चित्रित करती है, फिर भी यहाँ वह इस्राएल के सबसे बड़े शत्रु की सेना में अपने ही राजा के विरुद्ध खड़ा है। वृत्तांत इसकी सफाई नहीं देता, न निंदा करता है। पलिश्ती सरदारों के अविश्वास ने ही उसे उस भयानक दिन से बचाया। तो क्या परमेश्वर ने दाऊद के समझौते के बीच से उसे बचाया, या उसके समझौते के बावजूद? पाठ चुप है। और शायद यह चुप्पी ही हमें ईमानदार बनाती है: हमारी अपनी कहानियों में भी वे मोड़ हैं जहाँ हम नहीं जानते कि हमारी चालाकी काम आई या परमेश्वर की दया ने हमें हमारी ही चालाकी से बचा लिया।

मुख्य पात्र

इस भीड़ के बीच इस्साकार के दो सौ प्रधान एक अजीब चमक छोड़ जाते हैं: "जो समय को पहचानते थे, कि इस्राएल को क्या करना उचित है" (पद 32)। कोई हथियार गिना नहीं जाता, कोई शेर जैसा मुँह या हिरण जैसी गति नहीं। उनकी शक्ति विवेक है, यह जानना कि यह कौन-सा क्षण है। बाकी सब पाँति बाँधना जानते हैं; ये जानते हैं कि पाँति बाँधने का समय आ गया है या नहीं। और उनके "सब भाई उनकी आज्ञा में रहते थे", यानी एक समुदाय ने माना कि समझ भी एक प्रकार की सेवा है। कलीसिया में ऐसे लोग दुर्लभ हैं। वे नारे नहीं लगाते, वे प्रतीक्षा करते हैं और फिर ठीक समय पर बोलते हैं।

श्रोताओं का चित्र

जिन्होंने यह सूची पहली बार पढ़ी, वे बंधुआई से लौटे हुए लोग थे, एक टूटा-फूटा समुदाय जिसके पास न राजा था, न सेना, न गोत्रों की वह पूरी गिनती। उनके कानों में ये संख्याएँ सांत्वना थीं और चुभन भी। सांत्वना, क्योंकि यहाँ सभी बारह गोत्र, यहाँ तक कि यरदन पार के रूबेनी और गादी भी, एक राजा के चारों ओर खड़े हैं, "सच्चे मन से"। चुभन, क्योंकि वह एकता अब कहीं नहीं थी। और अंत में तीन दिन का वह भोजन, मैदा, अंजीर, किशमिश, दाखमधु, तेल, जिसे पढ़ते हुए भूखे लौटे हुए लोगों ने शायद आँसू पोंछे होंगे। उनके लिए यह अतीत का वर्णन नहीं, एक वादा था: परमेश्वर फिर इकट्ठा कर सकते हैं, और फिर मेज़ सजा सकते हैं।

मनन के प्रश्न

जिस "छोटे" और धीमे काम को परमेश्वर आपके जीवन या आपकी कलीसिया में कर रहे हैं, उसे आप चमत्कार कहने से क्यों हिचकते हैं?

इस्साकार के लोगों की तरह "समय को पहचानना" आपके लिए इस सप्ताह क्या माँगता है, बोलना या चुप रहना?

1 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

1 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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1 Chronicles 12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 इतिहास 12 का क्या अर्थ है?
सिकलग के दिनों से लेकर हेब्रोन के उत्सव तक, यह अध्याय उन लोगों की सूची है जो दाऊद के पास आए, जब वह अभी राजा नहीं, केवल भगोड़ा था। पहले गिने-चुने बिन्यामीनी और गादी, फिर यहूदा और बिन्यामीन के कुछ लोग, फिर मनश्शे के हजारों के मुखिए, और अंत में सब गोत्रों के लाखों हथियारबंद लोग, जो "सच्चे मन से" दाऊद को राजा बनाने आए। समापन तीन दिन के भोजन पर होता है, जहाँ गदहों और ऊँटों पर लदकर रोटी, अंजीर, दाखमधु और तेल आता है, "क्योंकि इस्राएल में आनन्द मनाया जा रहा था।"
1 इतिहास 12 किस विषय में है?
पद 18 में एक शब्द छिपा है जो हिंदी अनुवाद में दब जाता है। "आत्मा अमासै में समाया" के पीछे इब्रानी क्रिया लावश है, जिसका अर्थ है "वस्त्र पहनना"। आत्मा ने अमासै को पहन लिया, जैसे कोई चोला पहनता है। वही शब्द गिदोन के लिए न्यायियों 6:34 में आता है, और वहाँ भी एक डरे हुए आदमी से अचानक आश्वस्त वाणी निकलती है। अमासै कोई भविष्यवक्ता नहीं था, वह एक योद्धा था, पर उसके मुँह से निकला: "हे दाऊद!
1 इतिहास 12 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 19 कड़वा है। मनश्शेई दाऊद के पास तब भागे "जब वह पलिश्तियों के साथ होकर शाऊल से लड़ने को गया"। यह इतिहास की किताब दाऊद को आदर्श राजा के रूप में चित्रित करती है, फिर भी यहाँ वह इस्राएल के सबसे बड़े शत्रु की सेना में अपने ही राजा के विरुद्ध खड़ा है। वृत्तांत इसकी सफाई नहीं देता, न निंदा करता है। पलिश्ती सरदारों के अविश्वास ने ही उसे उस भयानक दिन से बचाया। तो क्या परमेश्वर ने दाऊद के समझौते के बीच से उसे बचा
1 इतिहास 12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
जिन्होंने यह सूची पहली बार पढ़ी, वे बंधुआई से लौटे हुए लोग थे, एक टूटा-फूटा समुदाय जिसके पास न राजा था, न सेना, न गोत्रों की वह पूरी गिनती। उनके कानों में ये संख्याएँ सांत्वना थीं और चुभन भी। सांत्वना, क्योंकि यहाँ सभी बारह गोत्र, यहाँ तक कि यरदन पार के रूबेनी और गादी भी, एक राजा के चारों ओर खड़े हैं, "सच्चे मन से"। चुभन, क्योंकि वह एकता अब कहीं नहीं थी। और अंत में तीन दिन का वह भोजन, मैदा, अंजीर, किशमिश, दाखमधु, तेल, जिसे पढ़ते हुए भूखे लौटे हुए लोगों ने शायद आँसू पोंछे होंगे। उनके लिए यह अतीत का वर्णन नहीं, एक वादा था: परमेश्वर फिर इकट्ठा कर सकते हैं, और फिर मेज़ सजा सकते हैं।
1 इतिहास 12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
इस्साकार के लोगों की तरह "समय को पहचानना" आपके लिए इस सप्ताह क्या माँगता है, बोलना या चुप रहना?
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1 Chronicles 12 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

आठवाँ योहानान, नौवाँ एलजाबाद।" बस इतना ही। न कोई कहानी, न कोई बड़ा काम, सिर्फ़ नाम और नंबर। फिर भी परमेश्वर ने इन्हें लिखवा रखा, क्योंकि ये उस समय दाऊद के पास आए जब वह जंगल में छिपा हुआ था और उसके साथ खड़े होने में जोखिम था।

तू भी शायद आठवाँ ही है, किसी गिनती में खोया हुआ। पर जिसने योहानान का नाम याद रखा, वह तेरी वफ़ादारी भी भूलता नहीं।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 30

पिता, धन्यवाद कि एप्रैमियों में से वे बीस हजार आठ सौ शूरवीर अपने अपने पितरों के घराने में नामी थे। धन्यवाद कि आप हमारे घरों में भी ऐसे साहसी जन खड़े करते हैं, जिनका नाम चुपचाप की वफादारी से बनता है और जो सही समय पर आपके काम के लिए तैयार रहते हैं।

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