बाइबल व्याख्या

1 कुरिन्थियों 13:13

बाइबल

पाठ

पौलुस भविष्यद्वाणी, भाषाओं और ज्ञान की गिनती कर चुका है और हर एक पर एक ही मुहर लगा चुका है: ये अधूरे हैं, ये मिट जाएँगे। फिर वह एक तीखा मोड़ लेता है और कहता है कि जो बचा रहता है, वह तीन है: "पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।" यानी कुरिन्थ की कलीसिया जिन वरदानों पर अपनी आत्मिक हैसियत टिकाए बैठी थी, वे सब समय की सीमा में बँधे हैं; और जिन तीन बातों को वे साधारण समझते थे, वही टिकने वाली हैं। और उन तीनों में भी एक सिर पर है। यह वाक्य तालिका नहीं, फैसला है।

मर्म

ध्यान दीजिए कि यह तिकड़ी पौलुस ने यहाँ गढ़ी नहीं; वह इसे पहले से जानता है। थिस्सलुनीकियों को लिखी अपनी सबसे पुरानी चिट्ठी में वह विश्वास के काम, प्रेम के परिश्रम और आशा के धीरज की याद करता है, और रोमियों में वह इन तीनों को उस राह पर पिरोता है जो धर्मी ठहराए जाने से होकर क्लेश और धीरज के बीच से गुजरती है। मतलब यह कि विश्वास, आशा और प्रेम पौलुस की भाषा में मसीही जीवन का पूरा ढाँचा हैं, उसकी तीन दिशाएँ: विश्वास पीछे उस क्रूस की ओर देखता है, आशा आगे उस दिन की ओर, और प्रेम अभी बगल में बैठे उस भाई की ओर जिसने आपका अपमान किया। पर "सबसे बड़ा" क्यों? क्योंकि आमने-सामने के उस दिन विश्वास देखना बन जाएगा और आशा पाना, जबकि प्रेम वही रहेगा जो वह है। प्रेम परमेश्वर के अपने स्वभाव का नाम है, इसलिए वह किसी नए युग में बेकार नहीं होता।

सूत्र

पद 4 को ज़ोर से पढ़िए और सुनिए कि वह कहाँ से आ रहा है: "प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है।" यह वाक्य पौलुस ने हवा से नहीं उठाया। जब मूसा को सीनै पर परमेश्वर अपना नाम बताते हैं, तो वे स्वयं को कोप करने में धीमा और अनुग्रह तथा करुणा से भरा हुआ कहते हैं। पुराने नियम का वह आत्म-परिचय यहाँ प्रेम की परिभाषा बनकर लौट आया है। इसका अर्थ यह है कि पौलुस मनुष्य की भावना का वर्णन नहीं कर रहा, वह परमेश्वर के चरित्र का चित्र खींच रहा है, और वह चित्र देह पाकर क्रूस तक चला गया। पद 4 से 7 में जिसका नाम "प्रेम" है, उसका चेहरा यीशु मसीह का है। इसीलिए यह तीनों में सबसे बड़ा है: वरदान युग के औज़ार हैं, प्रेम परमेश्वर की देह है।

दर्पण

आप जिस चीज़ पर अपनी आत्मिक हैसियत टिकाते हैं, वह क्या है? अच्छी तैयारी की हुई बाइबल अध्ययन की कक्षा? वह सेवा जिसके बिना कलीसिया लड़खड़ा जाएगी? वह धार्मिक समझ जिससे आप दूसरों की बात में गलती तुरंत पकड़ लेते हैं? पौलुस ठंडे स्वर में कहता है कि ये सब "मिट जाएगा", और जो बचेगा वह यह है कि आपने अपनी पत्नी की एक ही शिकायत को सत्रहवीं बार बिना झुँझलाए सुना या नहीं। पद 5 का वह छोटा वाक्य, "बुरा नहीं मानता", घर के, दफ़्तर के और परिवार के अधिकांश झगड़ों को काट देता है; क्योंकि हम में से ज़्यादातर लोग हिसाब रखते हैं, बस चुपचाप। आज ही उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसका हिसाब आप मन में रखे हुए हैं, उसके आगे लिखिए "बुरा नहीं मानता", और वह कागज़ फाड़ने से पहले उस व्यक्ति को एक छोटा, सच्चा संदेश भेज दीजिए।

एक बारीकी

"ये तीनों स्थायी हैं" में जो क्रिया है, वह यूनानी में मेनेइ है, अर्थात "बना रहता है, ठहरा रहता है"। दो बातें छिपी हैं। पहली, यह क्रिया एकवचन में है, मानो तीनों मिलकर एक ही चीज़ हों; विश्वास, आशा और प्रेम अलग-अलग गुण नहीं, एक ही जीवन की तीन भुजाएँ हैं। दूसरी, यही शब्द यीशु दाखलता की बात में बार-बार कहते हैं, "मुझ में बने रहो"। यानी ये तीनों टिकते इसलिए नहीं कि वे मज़बूत हैं, बल्कि इसलिए कि वे मसीह में बने रहने का ही रूप हैं। और पद 8 का "प्रेम कभी टलता नहीं" इसी का दूसरा पहलू है: जो मसीह में ठहरा है, वह युग बदलने पर भी नहीं गिरता।

श्रोता

कुरिन्थ की कलीसिया रैंकिंग की भाषा बहुत अच्छी तरह समझती थी। यह बंदरगाह-नगर था, जहाँ हैसियत सबसे बड़ी मुद्रा थी, और कलीसिया ने वही तराजू भीतर ले आया था: किसकी भाषा ज़्यादा ऊँची, किसका ज्ञान ज़्यादा गहरा, कौन किसका शिष्य। पौलुस उनकी ही पसंदीदा भाषा उठाता है, "सबसे बड़ा", और उसे उस चीज़ पर लगा देता है जिसे कोई प्रदर्शन में नहीं दिखा सकता। पद 2 में "पहाड़ों को हटा दूँ" सुनकर उनके कानों में शायद यीशु का वह कथन गूँजा होगा जो शिष्य दोहराते थे; और पौलुस कहता है, वह चमत्कारी विश्वास भी प्रेम के बिना शून्य है। यह उनके लिए तालियों वाला वचन नहीं था, यह उनकी पूरी सूची को उलट देने वाला वचन था।

कठिन प्रश्न

अगर पद 12 के अनुसार एक दिन हम "आमने-सामने" देखेंगे, तो विश्वास और आशा का क्या होगा? इब्रानियों कहता है कि विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय है, और रोमियों में पौलुस स्वयं लिखता है कि जो दिखाई दे रहा है उसकी आशा नहीं होती। तो फिर वे "स्थायी" कैसे हैं? सबसे ईमानदार उत्तर यह है कि पौलुस यहाँ सूची पूरी नहीं करता, वह तुलना करता है। शायद विश्वास तब भरोसे के रूप में बचा रहेगा और आशा उस अनंत गहराई के रूप में जिसमें परमेश्वर को जानना कभी खत्म नहीं होता। पर वह नहीं बताता। वह केवल इतना कहता है कि जिस दिन बाकी सब अपनी उपयोगिता खो देगा, प्रेम तब भी वही करता रहेगा जो वह आज कर रहा है। इस रहस्य को खुला छोड़ना ही उसका आदर है।

चिंतन

आपकी आत्मिक ज़िंदगी में ऐसा क्या है जिसे आप "स्थायी" मान बैठे हैं, पर पौलुस की सूची में वह "मिट जाएगा" के खाने में आता है?

पद 4 से 7 में से वह एक पंक्ति कौन-सी है जिसे पढ़ते समय आपके मन में तुरंत किसी एक चेहरे की याद आती है, और आप उस चेहरे के साथ इस सप्ताह क्या करेंगे?

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1 Corinthians 13:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 कुरिन्थियों 13:13 का क्या अर्थ है?
पौलुस भविष्यद्वाणी, भाषाओं और ज्ञान की गिनती कर चुका है और हर एक पर एक ही मुहर लगा चुका है: ये अधूरे हैं, ये मिट जाएँगे। फिर वह एक तीखा मोड़ लेता है और कहता है कि जो बचा रहता है, वह तीन है: "पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।" यानी कुरिन्थ की कलीसिया जिन वरदानों पर अपनी आत्मिक हैसियत टिकाए बैठी थी, वे सब समय की सीमा में बँधे हैं; और जिन तीन बातों को वे साधारण समझते थे, वही टिकने वाली हैं। और उन तीनों में भी एक सिर पर है। यह वाक्य तालिका नहीं, फैसला है।
1 कुरिन्थियों 13:13 किस विषय में है?
पद 4 को ज़ोर से पढ़िए और सुनिए कि वह कहाँ से आ रहा है: "प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है।" यह वाक्य पौलुस ने हवा से नहीं उठाया। जब मूसा को सीनै पर परमेश्वर अपना नाम बताते हैं, तो वे स्वयं को कोप करने में धीमा और अनुग्रह तथा करुणा से भरा हुआ कहते हैं। पुराने नियम का वह आत्म-परिचय यहाँ प्रेम की परिभाषा बनकर लौट आया है। इसका अर्थ यह है कि पौलुस मनुष्य की भावना का वर्णन नहीं कर रहा, वह परमेश्वर के चरित्र का चित्र खींच रहा है, और वह चित्र देह पाकर क्रूस तक चला गया। पद 4 से 7 में जिसका नाम "प्रेम" है, उसका चेहरा यीशु मसीह का है। इसीलिए यह तीनों में सबसे बड़ा है: वरदान युग के औज़ार हैं, प्रेम परमेश्वर की देह है।
1 कुरिन्थियों 13:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"ये तीनों स्थायी हैं" में जो क्रिया है, वह यूनानी में मेनेइ है, अर्थात "बना रहता है, ठहरा रहता है"। दो बातें छिपी हैं। पहली, यह क्रिया एकवचन में है, मानो तीनों मिलकर एक ही चीज़ हों; विश्वास, आशा और प्रेम अलग-अलग गुण नहीं, एक ही जीवन की तीन भुजाएँ हैं। दूसरी, यही शब्द यीशु दाखलता की बात में बार-बार कहते हैं, "मुझ में बने रहो"। यानी ये तीनों टिकते इसलिए नहीं कि वे मज़बूत हैं, बल्कि इसलिए कि वे मसीह में बने रहने का ही रूप हैं। और पद 8 का "प्रेम कभी टलता नहीं" इसी का दूसरा पहलू है: जो मसीह में ठहरा है, वह युग बदलने पर भी नहीं गिरता।
1 कुरिन्थियों 13:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अगर पद 12 के अनुसार एक दिन हम "आमने-सामने" देखेंगे, तो विश्वास और आशा का क्या होगा? इब्रानियों कहता है कि विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय है, और रोमियों में पौलुस स्वयं लिखता है कि जो दिखाई दे रहा है उसकी आशा नहीं होती। तो फिर वे "स्थायी" कैसे हैं? सबसे ईमानदार उत्तर यह है कि पौलुस यहाँ सूची पूरी नहीं करता, वह तुलना करता है। शायद विश्वास तब भरोसे के रूप में बचा रहेगा और आशा उस अनंत गहराई के रूप में जिसमें परमेश्वर को जानना कभी खत्म नहीं होता। पर वह नहीं बताता। वह केवल इतना कहता है कि जिस दिन बाकी सब अपनी उपयोगिता खो देगा, प्रेम तब भी वही करता रहेगा जो वह आज कर रहा है। इस रहस्य को खुला छोड़ना ही उसका आदर है।
1 कुरिन्थियों 13:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पद 4 से 7 में से वह एक पंक्ति कौन-सी है जिसे पढ़ते समय आपके मन में तुरंत किसी एक चेहरे की याद आती है, और आप उस चेहरे के साथ इस सप्ताह क्या करेंगे?
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1 Corinthians 13 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

वह सब बातें सह लेता है, सब बातों पर विश्वास करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है।" पौलुस यह उस कलीसिया को लिख रहा था जो आपस में बँटी हुई थी, जहाँ हर कोई अपनी वरदान गिना रहा था। प्रेम का काम ढक लेना है, उघाड़ना नहीं। सोचो, जिस इंसान की कमज़ोरी तुम सबसे अच्छी तरह जानते हो, क्या तुम उसे ढकते हो या दूसरों को बताते हो?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 1

पिता, धन्यवाद कि आपने मुझे सिखाया कि प्रेम के बिना मेरी सबसे सुंदर बातें भी केवल ठनठनाता हुआ पीतल और झंझनाती हुई झाँझ हैं। धन्यवाद कि आप मेरे शब्दों से पहले मेरे मन को देखते हैं, और अपने प्रेम से मेरी बोली को अर्थ देते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

परन्तु जब सिद्ध आएगा, तब अधूरा मिट जाएगा।"

तेरी अधूरी समझ, अधूरी प्रार्थनाएँ, अधूरे जवाब, ये मिटेंगे इसलिए नहीं कि वे बेकार थे, बल्कि इसलिए कि पूरा आ जाएगा। जैसे दीया सूरज उगने पर बुझा दिया जाता है, वह नाकाम नहीं हुआ, उसका काम पूरा हुआ। आज जो धुँधला दिखता है, उसे कसकर मत पकड़। जो आने वाला है, उसका इंतज़ार कर।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 9

पिता, मैं मानता हूँ कि मेरी समझ अधूरी है। बहुत कुछ है जो मैं जानना चाहता हूँ पर जान नहीं पाता। मुझे इस अधूरेपन के साथ जीना सिखा, भरोसे के साथ। जब उत्तर न मिलें, तब भी तेरा प्रेम मेरे लिए काफ़ी हो।

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