निर्गमन 34
पाठ
सोने के बछड़े की मूर्ति के बाद, जब वाचा की तख्तियाँ टूट चुकी थीं, परमेश्वर मूसा से कहते हैं कि वह पत्थर की दो नई तख्तियाँ गढ़े और अकेला पर्वत पर चढ़ आए। वहाँ परमेश्वर बादल में उतरकर अपना नाम पुकारते हैं: दयालु, अनुग्रहकारी, धीरजवन्त, परन्तु दोषी को निर्दोष न ठहरानेवाले। मूसा भूमि पर झुककर विनती करता है कि परमेश्वर इस हठीली जाति के बीच होकर चलें, और परमेश्वर फिर वाचा बाँधते हैं, आज्ञाएँ दोहराते हैं, और चालीस दिन बाद मूसा चमकते चेहरे के साथ नीचे उतरता है, इतना चमकता कि लोग डर जाते हैं और उसे ओढ़ना डालना पड़ता है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर अपने आप को किस तरह परिचित कराते हैं। मूसा ने महिमा देखने की माँग की थी, और उत्तर में उसे एक नाम मिलता है, एक चरित्र: "यहोवा, यहोवा, परमेश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य।" यहाँ "करुणा" के पीछे इब्रानी शब्द ख़ेसेद है, जिसका अर्थ केवल भावुक दया नहीं, बल्कि वाचा के प्रति अटल निष्ठा है, वह वफ़ादारी जो टूटे रिश्ते को भी नहीं छोड़ती। परमेश्वर की महिमा उनकी शक्ति के प्रदर्शन में नहीं, उनकी क्षमा करने की तत्परता में प्रकट होती है। और साथ ही वाक्य का दूसरा हिस्सा खटकता है: "दोषी को वह किसी प्रकार निर्दोष न ठहराएगा।" कृपा सस्ती नहीं है। यही दोनों वाक्य पूरे बाइबल की धुरी बन जाते हैं।
सुनहरा धागा
यह तनाव, कि परमेश्वर क्षमा करते हैं पर दोष को अनदेखा नहीं करते, अध्याय 34 में हल नहीं होता। मूसा को यह तनाव उठाकर जीना पड़ता है। यूहन्ना अपने सुसमाचार की भूमिका में जानबूझकर इसी नाम को उठाता है जब वह कहता है कि वचन देहधारी हुआ, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण; वही जोड़ी जो सीनै पर पुकारी गई थी, अब एक व्यक्ति में चलती-फिरती दिखती है। और जहाँ मूसा केवल विनती कर सकता था, "हमारे अधर्म और पाप को क्षमा कर," वहाँ मसीह क्रूस पर वह स्थान लेते हैं जहाँ दोष निर्दोष नहीं ठहराया जाता, बल्कि उठाया जाता है। तख्तियाँ मूसा गढ़ता है, लिखते परमेश्वर हैं; टूटी वाचा का नवीकरण सदा परमेश्वर की पहल है, और उसकी अंतिम कीमत वे स्वयं चुकाते हैं।
दर्पण
मूसा की विनती में एक शब्द है जो चुभता है: "ये लोग हठीले तो हैं।" वह अपने लोगों के बारे में कोई भ्रम नहीं पालता, और फिर भी उनके लिए खड़ा होता है। हम अक्सर उलटा करते हैं: अपने बारे में भ्रम पालते हैं और दूसरों के हठ पर क्रोध करते हैं। उस सहकर्मी के बारे में सोचिए जिसने आपका भरोसा तोड़ा, उस रिश्तेदार के बारे में जिसका फ़ोन आप नहीं उठाते। और अपने बारे में भी: वही पाप जो आप बीस साल से लड़ रहे हैं, वह बछड़ा जिसे आप गला-गला कर बनाते हैं। इस अध्याय का सुसमाचार यह है कि परमेश्वर दूसरी बार लिखने को तैयार हैं। आज पद 6 और 7 को धीरे-धीरे ज़ोर से पढ़िए, और फिर अपने नाम के साथ कहिए: "मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर, और मुझे अपना निज भाग मानकर ग्रहण कर।"
पहले सुननेवाले
जो इसे पहली बार सुन रहे थे, वे वही लोग थे या उनके बच्चे, जिन्होंने बछड़े के आगे नाचा था और जिनमें से हज़ारों मारे गए थे। उनके कानों में यह प्रश्न बजता था: क्या परमेश्वर अब भी हमारे साथ चलेंगे, या हम कनान की ओर अकेले जाएँगे? इसलिए मूसा की सबसे बड़ी माँग भूमि नहीं, उपस्थिति है। और इसीलिए मूसा का चमकता चेहरा उनके लिए राहत और भय दोनों था: राहत कि परमेश्वर ने बात की, भय कि जिस महिमा से वे बछड़े के दिन बच गए थे, वह अब भी जीवित है और उनके शिविर में लौट आई है। कनानी वेदियों और विवाह-सम्बन्धों की कठोर चेतावनियाँ उन्हें अमूर्त नियम नहीं, अपने ताज़ा गिरने की व्याख्या लगती थीं।
कठिन प्रश्न
पद 7 का अंत आसानी से निगला नहीं जाता: परमेश्वर "पितरों के अधर्म का दण्ड उनके बेटों वरन् पोतों और परपोतों को भी" देते हैं। हम इसे तुरंत मीठा नहीं कर सकते। पर गिनती पर ध्यान दीजिए: करुणा हज़ारों पीढ़ियों तक, दण्ड चौथी तक। यह समानता नहीं, विषमता है, और उसमें परमेश्वर का झुकाव दिखता है। फिर भी सवाल बचा रहता है, क्योंकि हम जानते हैं कि यह सच है; शराब, हिंसा, कड़वाहट पीढ़ियों में उतरती है। पाप कभी निजी नहीं रहता, वह विरासत बनता है। बाइबल बाद में इस पर सवाल उठाती है और सुधारती भी है, पर यहाँ वह हमें एक बेचैनी में छोड़ देती है: मेरे चुनाव मेरे बाद भी जीते हैं।
पृष्ठभूमि
घटना सीनै पर्वत पर घटती है, मिस्र से निकलने के कुछ महीनों बाद, बछड़े की घटना के तुरंत बाद। इस्राएल एक भगोड़ा दास-समूह है, बिना भूमि, बिना राजा, अपने परमेश्वर के अलावा किसी सुरक्षा के बिना। प्राचीन पूर्व में वाचाएँ राजा और प्रजा के बीच पत्थर पर लिखी जाती थीं, और वाचा तोड़ने का सामान्य परिणाम विनाश था, नवीनीकरण नहीं। इसीलिए पर्वत का सूना होना, न मनुष्य न पशु, और मूसा का अकेले चढ़ना इतना गंभीर है: यह एक राजदरबार है जिसमें एक मध्यस्थ अपने अपराधी लोगों की ओर से खड़ा है। पौलुस बाद में इसी ओढ़ने को उठाकर कहेगा कि मसीह में वह हटा दिया जाता है; महिमा अब एक चेहरे पर नहीं, उन सब पर जो विश्वास करते हैं।
चिंतन के प्रश्न
परमेश्वर ने अपना नाम पुकारते समय जो कहा, उसमें से कौन सा हिस्सा आपको सबसे कम विश्वसनीय लगता है, और क्यों?
आपके जीवन में किसके लिए आप मूसा की तरह खड़े होकर कह सकते हैं, "ये हठीले तो हैं, तो भी क्षमा कर"?
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Exodus 34 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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