1 यूहन्ना 1:6
पाठ
यूहन्ना एक ऐसे दावे को पकड़ता है जो उसके पाठकों के मुँह में था: "उसके साथ हमारी सहभागिता है।" वह इस दावे को नकारता नहीं, वह उसकी जाँच करता है। यदि कोई यह कहे कि परमेश्वर के साथ उसका संग है, और फिर भी अंधकार में चलता रहे, तो उसका कहना और उसका चलना एक-दूसरे को काट देते हैं। यूहन्ना इसे नरम शब्दों में नहीं रखता: ऐसा व्यक्ति "झूठ बोलते हैं और सत्य पर नहीं चलते।" ध्यान दीजिए, वह "हम" कहता है, "तुम" नहीं। प्रेरित स्वयं को इस जाँच के बाहर नहीं रखता। पद 5 में जो घोषणा हुई थी, कि परमेश्वर ज्योति हैं और उनमें अंधकार का कोई अंश नहीं, वही अब जीवन की कसौटी बन जाती है।
मर्म
यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं है कि हम पाप करते हैं या नहीं; पद 8 और 10 उस भ्रम को साफ तोड़ देते हैं। प्रश्न यह है कि हम किस दिशा में चल रहे हैं। "अंधकार में चलना" एक बार गिर जाना नहीं, बल्कि अंधकार को अपना घर बना लेना है, वहाँ रहना, वहीं सहज महसूस करना। और यूहन्ना का तर्क परमेश्वर के स्वभाव से निकलता है, हमारे प्रयास से नहीं: परमेश्वर ज्योति हैं, इसलिए उनके साथ संगति का अर्थ ही है उनके प्रकाश के दायरे में आ जाना। दो अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ नहीं रहा जा सकता। जो व्यक्ति ऐसा दावा करता है, वह केवल दूसरों को धोखा नहीं दे रहा; यूहन्ना कहता है वह "सत्य पर नहीं चलता", यानी सत्य उसके भीतर काम करना बंद कर चुका है। सहभागिता कोई भावना या सदस्यता नहीं, वह एक साझा चाल है।
सूत्र
पद 6 का उत्तर पद 7 में आता है, और वहीं मसीह खड़े हैं: "उसके पुत्र यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।" यूहन्ना अंधकार से बाहर निकलने का रास्ता हमारे सुधार में नहीं, बल्कि उस लहू में देखता है। और यह अचानक नहीं आया। पूरे पुराने नियम में ज्योति परमेश्वर की उपस्थिति की भाषा रही है: सृष्टि के पहले दिन का प्रकाश, मरुभूमि में आग का खम्भा, मन्दिर का दीपक। यशायाह अपने लोगों को पुकारता है कि आओ, हम यहोवा की ज्योति में चलें, और यूहन्ना उसी पुकार को उठा लेता है। पर अब वह ज्योति एक व्यक्ति है, जिसे इस पत्र के पहले पद में उसने सुना, देखा और हाथों से छुआ। जिस परमेश्वर में "कुछ भी अंधकार नहीं", वे शरीर लेकर हमारे बीच चले। इसलिए ज्योति में चलना अब कोई नैतिक अमूर्तता नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति के पीछे चलना है।
दर्पण
यह पद उस विभाजन पर उँगली रखता है जिसे हम सबसे ज़्यादा संभालकर रखते हैं: रविवार का चेहरा और सोमवार का चेहरा। आप छोटे समूह की अगुवाई करते हैं और दफ़्तर में हिसाब में वह छोटी-सी चालाकी चलती रहती है जिसे कोई पकड़ नहीं सकता। आप घर में प्रार्थना करवाते हैं और फ़ोन पर देर रात कुछ ऐसा देखते हैं जिसे किसी को दिखा नहीं सकते। आप पत्नी या भाई से महीनों से एक ऐसी कड़वाहट पाले हैं जिसे आपने "बस दूरी" कहकर सम्मानजनक नाम दे दिया है। यूहन्ना इसे व्यवहार की चूक नहीं, झूठ कहता है, क्योंकि दावा और चाल एक साथ नहीं चल रहे। और ध्यान दीजिए, वह हमें डराने नहीं, बाहर बुलाने के लिए यह कहता है: ज्योति में आना शुद्ध होना नहीं, शुद्ध किए जाने का स्थान है।
आज ही, दस मिनट में: उस एक बात को काग़ज़ पर लिखिए जिसे आपने अब तक परमेश्वर के सामने खुलकर नहीं रखा, और उसे ज़ोर से बोलकर उन्हें सौंप दीजिए।
पहले सुननेवाले
ये पहली सदी के अंत के विश्वासी थे, ऐसी मंडलियों में जहाँ से कुछ लोग निकल चुके थे और नई शिक्षा लेकर लौट रहे थे। उस शिक्षा में एक आकर्षक सुविधा थी: आत्मा ऊपर उठ गई है, इसलिए शरीर जो करता है उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। "परमेश्वर के साथ हमारी सहभागिता है" यह उनका नारा था, ज्ञान का दावा, एक भीतरी अनुभव जो जीवन की जाँच से ऊपर था। यूहन्ना के पाठक इस दावे की चमक से डगमगा रहे थे: क्या हम पीछे रह गए हैं? इसीलिए यूहन्ना पत्र की शुरुआत ही छूने और देखने से करता है, शरीर से। जो शरीर को महत्वहीन कहता है, वह देह में आए मसीह को भी महत्वहीन कर देता है। उनके कानों में पद 6 एक चेतावनी से ज़्यादा एक राहत थी।
मुख्य पात्र
इस पद का केन्द्र हम नहीं, परमेश्वर हैं, और उनके बारे में यूहन्ना जो कहता है वह लगभग निर्मम है: "उसमें कुछ भी अंधकार नहीं।" कोई कोना नहीं, कोई छूट नहीं, कोई मौन समझौता नहीं। यह वह परमेश्वर है जो हमारे अंधकार में सहज नहीं हो सकते, क्योंकि वे स्वयं वैसे नहीं हैं। और फिर भी यही परमेश्वर सहभागिता चाहते हैं; पद 3 कहता है कि यह संगति "पिता के साथ, और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ है।" यही उनका चरित्र है: वे अपने प्रकाश को मंद नहीं करते ताकि हम भीतर आ सकें, वे अपने पुत्र को भेजते हैं ताकि हम प्रकाश में खड़े होने योग्य बन सकें। पवित्रता और प्रेम यहाँ आमने-सामने नहीं, एक ही गति के दो पहलू हैं। इसीलिए यूहन्ना पद 4 में लिख सकता है कि यह सब आनन्द के लिए है।
कठिन प्रश्न
तो सीमा कहाँ है? हम सब अंधकार के किसी न किसी टुकड़े के साथ जी रहे हैं, और पद 8 कहता है कि जो इससे इनकार करे वह अपने आपको धोखा देता है। फिर "अंधकार में चलना" और "ज्योति में चलते हुए ठोकर खाना" में फ़र्क कौन तय करेगा? यूहन्ना कोई मापदंड नहीं देता, और यह असुविधाजनक है। पर वह एक संकेत ज़रूर छोड़ता है: पद 9 में मान लेना, स्वीकार करना। जो प्रकाश में चल रहा है वह अपने पाप को छिपाता नहीं, वह उसे सामने लाता है। जो अंधकार में रह रहा है वह उसे समझाता है, उसका नाम बदलता है, उसे जायज़ ठहराता है। यह जाँच दूसरों पर लागू करने के लिए नहीं है; यूहन्ना "हम" कहता है, और वहीं इसे रहने देना ईमानदारी है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन-सी बात ऐसी है जिसे आप स्वीकार करने के बजाय समझाते हैं, और उसका असली नाम क्या है?
यदि परमेश्वर के साथ सहभागिता एक साझा चाल है, तो पिछले महीने आपकी चाल किस दिशा में मुड़ी है, और आप यह कैसे जानते हैं?
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1 John 1:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 यूहन्ना 1:6 का क्या अर्थ है?
1 यूहन्ना 1:6 किस विषय में है?
1 यूहन्ना 1:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 यूहन्ना 1:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 यूहन्ना 1:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 John 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जो शुरू से था, वही मेरे पास आया, ताकि मैं उसे सुन सकूँ और जान सकूँ। मेरा विश्वास किसी कहानी पर नहीं, बल्कि उस जीवन पर टिका है जिसे लोगों ने सचमुच देखा और छुआ। जब मन डगमगाए, मुझे इसी सच्चाई पर थामे रखना।
पिता, जो जीवन तेरे पास था, वह हमारे बीच प्रगट हुआ, और यही मेरी सबसे बड़ी आशा है। कभी कभी मेरा मन अंधेरे में टटोलता है, फिर भी तू अपने आप को मुझ पर खोलता जाता है। मुझे देखने की आँखें दे, और जो मैंने पाया है उसे औरों तक ले जाने का साहस भी।
पिता, धन्यवाद कि जब मैं अपने पापों को मान लेता हूँ, तो तू उन्हें क्षमा करने और मुझे सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है। धन्यवाद कि मुझे अपना दोष छिपाना नहीं पड़ता, तेरे सामने सब कुछ खोलकर रख सकता हूँ और तू फिर भी गले लगाता है।
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