बाइबल व्याख्या

1 यूहन्ना 1:7

बाइबल
यह वचन Panijhora northern evangelical Lutheran church द्वारा समर्पित है

पाठ

यूहन्ना एक शर्त रखता है और उसके साथ दो वादे जोड़ता है। शर्त यह है कि हम उसी उजाले में चलें जिसमें परमेश्वर स्वयं हैं, यानी खुलेपन में, बिना छिपाव के। और तब दो बातें एक साथ घटती हैं: विश्वासियों के बीच सचमुच की सहभागिता बनती है, और "उसके पुत्र यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।" ध्यान दीजिए, यहाँ ज्योति में चलना पाप-रहित होने का दावा नहीं है; अगर ऐसा होता तो शुद्ध करने वाले लहू की ज़रूरत ही न पड़ती। उजाले में चलने का अर्थ है वहाँ खड़े होना जहाँ आपका सच दिखाई देता है।

मर्म

पहली सदी के इफिसुस में यह वाक्य दीये की टिमटिमाती लौ में सुना गया था। शहर की गलियाँ रात में सचमुच अंधेरी थीं, और जो लोग अंधेरे में चलते थे वे प्रायः वही थे जिन्हें दिन के उजाले में देखा जाना गवारा न था: चोर, व्यभिचारी, षड्यंत्रकारी। यूहन्ना इस रोज़मर्रा की छवि को उठाकर परमेश्वर के स्वभाव पर टिका देता है, जैसा उसने पद 5 में कहा, "परमेश्वर ज्योति है और उसमें कुछ भी अंधकार नहीं।" मर्म यह है: परमेश्वर के पास आना किसी गुप्त ज्ञान की सीढ़ी चढ़ना नहीं, बल्कि उस जगह चले आना है जहाँ कुछ भी ढका नहीं रहता। और वहाँ, ठीक उसी उजाले में जहाँ हमारी असलियत नंगी होती है, अनुग्रह हमें धोता है। शुद्धि छिपने का इनाम नहीं, प्रकट होने का फल है।

जोड़ने वाला धागा

"लहू" शब्द इफिसुस के पाठकों के कानों में उतना रूपक नहीं था जितना हमारे कानों में है। मंदिरों के आँगन में जानवर सचमुच काटे जाते थे, नालियों से गंध उठती थी, और यहूदी विश्वासी जानते थे कि प्रायश्चित का दिन बिना लहू के नहीं बीतता। पुराने नियम की पूरी बलि-व्यवस्था एक ही बात दोहराती रही: शुद्धि मुफ़्त नहीं, पर वह मिल सकती है। यूहन्ना उस पूरी परंपरा को एक नाम पर समेट देता है, "उसके पुत्र यीशु मसीह का लहू।" और वह क्रिया वर्तमान काल में रखता है: शुद्ध करता है, एक बार नहीं, लगातार। यशायाह ने बहुत पहले इस्राएल को बुलाया था कि वे प्रभु की ज्योति में चलें; वह बुलाहट अधूरी रह गई थी, क्योंकि उजाले में खड़ा होना तभी सहनीय है जब वहाँ धोने वाला कोई हो। मसीह में वह शर्त पूरी हुई।

दर्पण

आप शायद उस कमरे को जानते हैं जहाँ सब कुछ ठीक-ठाक दिखता है। रविवार को आप मुस्कुराते हैं, समूह की अगुवाई करते हैं, प्रार्थना में सही शब्द बोलते हैं, और भीतर एक कोना है जिसे आपने वर्षों से किसी को नहीं दिखाया: वह कर्ज़ जिसे पत्नी नहीं जानती, वह द्वेष जो भाई के लिए पलता है, वह आदत जो देर रात फ़ोन पर लौट आती है, वह क्रोध जिसे आप बच्चों पर उतारकर "अनुशासन" कह देते हैं। हम अंधकार को पाप के कारण नहीं, शर्म के कारण चुनते हैं। हमें डर है कि अगर लोग असली मुझे देख लें, तो सहभागिता टूट जाएगी। यूहन्ना ठीक उल्टा कहता है: छिपाव सहभागिता को बचाता नहीं, वह उसे खोखला करता है।

आज कीजिए यह एक काम: किसी एक भरोसेमंद विश्वासी को एक वाक्य भेजिए या फ़ोन पर कहिए, जिसमें अपने बारे में वह सच हो जिसे आप आमतौर पर ढके रखते हैं। एक वाक्य, बिना सफ़ाई दिए, बिना उसे धार्मिक भाषा में लपेटे।

प्रश्न

अगर उजाला इतना ही चंगा करता है, तो कलीसिया में सच बोलने वाले लोग अक्सर सज़ा क्यों पाते हैं? यह कोई काल्पनिक शिकायत नहीं। जिसने अपनी लत स्वीकार की, उसे सेवकाई से हटा दिया गया; जिसने अपने संदेह बताए, उसके लिए फुसफुसाहटें शुरू हो गईं। यूहन्ना वादा करता है कि ज्योति में चलने से "एक दूसरे से सहभागिता" बनती है, पर हमारा अनुभव कभी-कभी इसके ठीक विपरीत होता है। मैं इसे मीठा नहीं करूँगा। पद इस बात की गारंटी नहीं देता कि हर मंडली उजाले में खड़ी है; वह बताता है कि जहाँ लोग सचमुच उजाले में चलते हैं वहाँ क्या होता है। जब सच बोलने पर आप अकेले पड़ जाते हैं, तो दोष सच का नहीं, उस समूह का है जो अब भी अंधेरे में खड़ा होकर उजाले का नाम ले रहा है।

मुख्य पात्र

इस पद का केंद्रीय पात्र परमेश्वर ही हैं, और उनका परिचय चौंकाने वाला है। इफिसुस धार्मिक रहस्यों का शहर था: अरतिमिस के मंदिर के गुप्त संस्कार, दीक्षा की सीढ़ियाँ, वे बातें जो केवल भीतरी घेरे को बताई जाती थीं। देवता वहाँ पर्दे के पीछे रहते थे, और भक्ति का अर्थ था धीरे-धीरे पर्दा उठाना। यूहन्ना का परमेश्वर पर्दे के पीछे नहीं। वे ज्योति हैं, और "उसमें कुछ भी अंधकार नहीं", यानी उनमें कोई छिपा हुआ मूड नहीं, कोई गुप्त क्रूरता नहीं, कोई ऐसा पक्ष नहीं जो अचानक निकल आए। ऐसे परमेश्वर के सामने डर लगता है, क्योंकि वे सब देखते हैं; और उन्हीं के सामने चैन मिलता है, क्योंकि उनके बारे में कोई बुरी ख़बर बाकी नहीं है जो कल खुलेगी।

बारीकी

पद के बीच में एक मोड़ है जिसे पढ़ते हुए हम फिसल जाते हैं। तर्क माँगता है कि लिखा हो: यदि हम ज्योति में चलें, तो परमेश्वर के साथ हमारी सहभागिता होती है। पर यूहन्ना लिखता है, "एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं।" ऊर्ध्वाधर से क्षैतिज की ओर यह छलाँग जानबूझकर है। पहली सदी के उन छोटे घरेलू समुदायों में, जहाँ मालिक और दास एक ही मेज़ पर रोटी तोड़ते थे और यह सामाजिक रूप से लगभग अशोभनीय था, यह वाक्य विस्फोटक था। परमेश्वर के साथ आपका रिश्ता सिद्ध है या नहीं, इसकी जाँच का सबसे ईमानदार पैमाना यह है कि आप उन लोगों के साथ कैसे रहते हैं जिन्हें आप हर रविवार देखते हैं। उजाला अकेले नहीं जिया जा सकता; वह हमेशा कमरे में और लोगों को भी दिखाई देने लगता है।

चिंतन

आपके जीवन का कौन सा हिस्सा ऐसा है जिसे आप परमेश्वर के सामने तो मान लेते हैं, पर किसी इंसान के सामने कभी नहीं? और वह अंतर आपकी सहभागिता के साथ क्या कर रहा है?

"शुद्ध करता है" वर्तमान काल में है, लगातार चलती हुई क्रिया। क्या आप अपने पापों की क्षमा को एक बीती हुई घटना मानते हैं, या आज सुबह की ज़रूरत?

1 John में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of John's Letters

David Jackman

Assurance, love and truth in John's letters, warmly explained.

Early Christian Letters For Everyone

N.T. Wright

James, Peter, John and Jude in short accessible readings.

The Letters of John: An Introduction and Commentary

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A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Letters of John

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1 John 1:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 यूहन्ना 1:7 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना एक शर्त रखता है और उसके साथ दो वादे जोड़ता है। शर्त यह है कि हम उसी उजाले में चलें जिसमें परमेश्वर स्वयं हैं, यानी खुलेपन में, बिना छिपाव के। और तब दो बातें एक साथ घटती हैं: विश्वासियों के बीच सचमुच की सहभागिता बनती है, और "उसके पुत्र यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।" ध्यान दीजिए, यहाँ ज्योति में चलना पाप-रहित होने का दावा नहीं है; अगर ऐसा होता तो शुद्ध करने वाले लहू की ज़रूरत ही न पड़ती। उजाले में चलने का अर्थ है वहाँ खड़े होना जहाँ आपका सच दिखाई देता है।
1 यूहन्ना 1:7 किस विषय में है?
"लहू" शब्द इफिसुस के पाठकों के कानों में उतना रूपक नहीं था जितना हमारे कानों में है। मंदिरों के आँगन में जानवर सचमुच काटे जाते थे, नालियों से गंध उठती थी, और यहूदी विश्वासी जानते थे कि प्रायश्चित का दिन बिना लहू के नहीं बीतता। पुराने नियम की पूरी बलि-व्यवस्था एक ही बात दोहराती रही: शुद्धि मुफ़्त नहीं, पर वह मिल सकती है। यूहन्ना उस पूरी परंपरा को एक नाम पर समेट देता है, "उसके पुत्र यीशु मसीह का लहू।" और वह क्रिया वर्तमान काल में रखता है: शुद्ध करता है, एक बार नहीं, लगातार। यशायाह ने बहुत पहले इस्राएल को बुलाया था कि वे प्रभु की ज्योति में चलें; वह बुलाहट अधूरी रह गई थी, क्योंकि उजाले में खड़ा होना तभी सहनीय है जब वहाँ धोने वाला कोई हो। मसीह में वह शर्त पूरी हुई।
1 यूहन्ना 1:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज कीजिए यह एक काम: किसी एक भरोसेमंद विश्वासी को एक वाक्य भेजिए या फ़ोन पर कहिए, जिसमें अपने बारे में वह सच हो जिसे आप आमतौर पर ढके रखते हैं। एक वाक्य, बिना सफ़ाई दिए, बिना उसे धार्मिक भाषा में लपेटे।
1 यूहन्ना 1:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस पद का केंद्रीय पात्र परमेश्वर ही हैं, और उनका परिचय चौंकाने वाला है। इफिसुस धार्मिक रहस्यों का शहर था: अरतिमिस के मंदिर के गुप्त संस्कार, दीक्षा की सीढ़ियाँ, वे बातें जो केवल भीतरी घेरे को बताई जाती थीं। देवता वहाँ पर्दे के पीछे रहते थे, और भक्ति का अर्थ था धीरे-धीरे पर्दा उठाना। यूहन्ना का परमेश्वर पर्दे के पीछे नहीं। वे ज्योति हैं, और "उसमें कुछ भी अंधकार नहीं", यानी उनमें कोई छिपा हुआ मूड नहीं, कोई गुप्त क्रूरता नहीं, कोई ऐसा पक्ष नहीं जो अचानक निकल आए। ऐसे परमेश्वर के सामने डर लगता है, क्योंकि वे सब देखते हैं; और उन्हीं के सामने चैन मिलता है, क्योंकि उनके बारे में कोई बुरी ख़बर बाकी नहीं है जो कल खुलेगी।
1 यूहन्ना 1:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन का कौन सा हिस्सा ऐसा है जिसे आप परमेश्वर के सामने तो मान लेते हैं, पर किसी इंसान के सामने कभी नहीं? और वह अंतर आपकी सहभागिता के साथ क्या कर रहा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 John 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 6

पिता, मैं नहीं चाहता कि मेरे शब्द कुछ और कहें और मेरी ज़िंदगी कुछ और। जहाँ मैं अंधेरे में छिपने की कोशिश करता हूँ, वहाँ अपनी रोशनी ले आइए। मुझे सच्चाई में चलना सिखाइए, ताकि आपके साथ मेरी संगति सिर्फ़ कहने की बात न रहे।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

यूहन्ना लिखता है, "और ये बातें हम इसलिए लिखते हैं, कि हमारा आनन्द पूरा हो जाए।" ध्यान दे, वह "मेरा" नहीं, "हमारा" कहता है। उसका आनन्द तब तक अधूरा है जब तक तू भी मसीह की संगति में न आ जाए। किसी के विश्वास में बढ़ने से क्या तेरे भीतर भी ऐसी खुशी जागती है? या तेरा आनन्द सिर्फ तेरे अपने तक सिमटा है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 1

पिता, जो शुरू से था, वही मेरे पास आया, ताकि मैं उसे सुन सकूँ और जान सकूँ। मेरा विश्वास किसी कहानी पर नहीं, बल्कि उस जीवन पर टिका है जिसे लोगों ने सचमुच देखा और छुआ। जब मन डगमगाए, मुझे इसी सच्चाई पर थामे रखना।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 2

पिता, जो जीवन तेरे पास था, वह हमारे बीच प्रगट हुआ, और यही मेरी सबसे बड़ी आशा है। कभी कभी मेरा मन अंधेरे में टटोलता है, फिर भी तू अपने आप को मुझ पर खोलता जाता है। मुझे देखने की आँखें दे, और जो मैंने पाया है उसे औरों तक ले जाने का साहस भी।

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