1 तीमुथियुस 3:1
पाठ
पौलुस एक वाक्य को पहले "सत्य बात" कहकर उस पर मुहर लगाते हैं, मानो कोई ऐसी कहावत दोहरा रहे हों जिसे तीमुथियुस की कलीसिया पहले से सुनती आई थी। और फिर वह कहावत आती है, इतनी सीधी कि हम उस पर से फिसल जाते हैं: जो अध्यक्ष का पद चाहता है, वह कोई बुरी चीज़ नहीं चाहता, वह "भले काम की इच्छा करता है।" न चेतावनी, न भौंह का टेढ़ा होना, न महत्वाकांक्षा पर तुरंत संदेह। पद की चाह को यहाँ स्वीकार किया जाता है, और उसी साँस में उसे "काम" कहकर उसका वज़न भी बता दिया जाता है। अगले पद से जो लंबी सूची शुरू होती है, वह इसी एक वाक्य की व्याख्या है।
मूल बात
यूनानी में जिस शब्द का अनुवाद "चाहता है" हुआ है, वह है ὀρέγεται, यानी हाथ बढ़ाकर किसी चीज़ तक पहुँचने की कोशिश करना। शरीर आगे झुकता है, उँगलियाँ खुलती हैं। परमेश्वर इस झुकाव को यहाँ कुचलते नहीं। पर ध्यान दीजिए कि हाथ किस ओर बढ़ाया जा रहा है: पद की ओर नहीं, "भले काम" की ओर। यहीं वह चुप्पी है जिसमें ठहरना चाहिए। क्या आपकी इच्छा उस चीज़ तक पहुँचना चाहती है जो दिखाई देती है, या उस श्रम तक जो अक्सर किसी को दिखाई नहीं देता? पौलुस इस सवाल का उत्तर नहीं देते; वे बस अगली पंक्तियों में जीवन का ऐसा नक्शा खींच देते हैं कि इच्छा को स्वयं अपनी जड़ खोदकर देखनी पड़े। परमेश्वर हमारी अभिलाषा को मिटाते नहीं, वे उसे शुद्ध करके काम में लगाते हैं।
सूत्र
यह वाक्य अकेला नहीं खड़ा है। इसी अध्याय के अंत में पौलुस कलीसिया को "परमेश्वर के घराने" कहते हैं, और फिर अचानक उनकी भाषा गीत में बदल जाती है: "वह जो शरीर में प्रगट हुआ।" यानी जिस घर की रखवाली के लिए कोई हाथ बढ़ाता है, वह घर किसी मनुष्य ने नहीं बनाया। उसका स्वामी स्वयं नीचे उतरा, महिमा से नहीं चिपका, और सेवा का काम अपने हाथ में लिया। पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर चरवाहों को खोजते रहे हैं, और बार-बार ऐसे चरवाहे मिले जिन्होंने भेड़ों को नहीं, अपने आप को चराया। इसलिए जब कोई "अध्यक्ष होना चाहता है," तो वह किसी खाली कुर्सी की ओर नहीं, बल्कि एक ऐसी परछाईं की ओर बढ़ रहा है जिसे मसीह ने पहले से भर रखा है। यह सोचकर ही इच्छा थोड़ी काँपने लगती है, और शायद यही ठीक है।
दर्पण
आप जानते हैं कि किस पद की ओर आपका मन चुपचाप खिंचता है। शायद वह प्राचीनों की सूची है, शायद रविवार का मंच, शायद दफ़्तर में वह एक पदोन्नति जिसके बारे में आप किसी से बात नहीं करते। और आप यह भी जानते हैं कि जब वह किसी और को मिल जाता है, तो भीतर क्या टूटता है। यह पद हमें शर्मिंदा नहीं करता, पर वह हमारी इच्छा को एक तराज़ू पर रख देता है: क्या मैं यह भार उठाना चाहता हूँ, या केवल यह नाम पहनना चाहता हूँ? बीमार की चारपाई के पास बैठना, वही झगड़ा तीसरी बार सुलझाना, बिना किसी के जाने प्रार्थना करना, यही "भला काम" है। आज कागज़ पर वह भूमिका लिखिए जिसे आप चाहते हैं, और उसके नीचे एक ऐसा काम लिखिए जो उस भूमिका में कोई नहीं देखेगा; फिर उस एक काम के लिए परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वे आपको उसे करने की इच्छा दें।
चिंतन
अगर आपकी चाही हुई भूमिका आपको मिल जाए, पर उसकी सारी प्रशंसा किसी और के हिस्से में चली जाए, तो क्या आप फिर भी उस काम को करना चाहेंगे?
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1 Timothy 3:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 तीमुथियुस 3:1 का क्या अर्थ है?
1 तीमुथियुस 3:1 किस विषय में है?
1 तीमुथियुस 3:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 तीमुथियुस 3:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 तीमुथियुस 3:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Timothy 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे भीतर का मन साफ रखिए, ताकि जो विश्वास मुझे सौंपा गया है उसे मैं छिपे पापों के बोझ तले दबा न दूँ। जो बातें मैं मानता हूँ और जो जीवन मैं जीता हूँ, दोनों में मेल हो। मुझे ऐसी सच्चाई दीजिए जो अंदर से शुरू हो।
वैसे ही सेवकों को भी गम्भीर होना चाहिए, दो रंगी, और पियक्कड़, और नीच कमाई के लोभी न हों।" ध्यान दीजिए, पहली शर्त कोई बड़ी योग्यता नहीं, बल्कि एक ही जीभ रखना है। एक व्यक्ति के सामने एक बात, पीठ पीछे दूसरी, यही दो रंगीपन है। परमेश्वर की सेवा वहीं से शुरू होती है जहाँ आपकी बात सब जगह एक जैसी रहती है।
अगुवे के लिए पौलुस ने कोई प्रतिभा नहीं गिनाई, बस स्वभाव: "पियक्कड़ या मारपीट करनेवाला न हो, वरन् कोमल हो; और न झगड़ालू और न धन का लोभी हो।" यानी परखने की जगह मंच नहीं, बल्कि वह पल है जब कोई तुम्हें चोट पहुँचाए या पैसों का मामला सामने आए। तब जो निकलता है, वही तुम्हारा असली चरित्र है। आज किसी ने तुम्हें उकसाया था?
पिता, मेरी जीभ को थाम लीजिए, ताकि मैं किसी की बदनामी का कारण न बनूँ। मुझे ऐसा मन दीजिए जो संयम में रहे, जो भरोसे के लायक हो, और जिसकी बातों पर लोग निश्चिंत रह सकें। छोटी-छोटी बातों में भी मुझे वफादार बनाइए।
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