2 कुरिन्थियों 8:5
पाठ
पौलुस मकिदुनिया की कलीसियाओं के बारे में जो कह रहा था, उसका शिखर यह वाक्य है। उसने जो अपेक्षा की थी, उससे कहीं बढ़कर हुआ: "जैसी हमने आशा की थी, वैसी ही नहीं।" ये गरीब, सताए हुए विश्वासी केवल पैसा देकर नहीं रुके। उन्होंने पहले अपने आपको प्रभु को सौंप दिया, और उसके बाद, परमेश्वर की इच्छा से, पौलुस और उसके साथियों को भी। यानी दान की थैली से पहले जीवन दिया गया। पौलुस यहाँ राशि की गिनती नहीं कर रहा, वह क्रम की ओर उँगली उठा रहा है: पहले स्वयं, फिर सम्पत्ति। और यह क्रम उसके लिए इतना अप्रत्याशित था कि उसने इसे गवाही की तरह लिख दिया, जैसे कोई ऐसी चीज़ देखकर लौटा हो जिसकी योजना किसी ने नहीं बनाई थी।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर के साथ रिश्ते का पूरा व्याकरण छिपा है। बाइबल में परमेश्वर कभी पहले हमारी चीज़ों की माँग नहीं करते; वे पहले व्यक्ति को माँगते हैं। वाचा की भाषा यही है: "मैं तुम्हारा परमेश्वर, तुम मेरी प्रजा।" पहले सम्बन्ध, फिर आज्ञा; पहले छुड़ाया गया व्यक्ति, फिर उसकी भेंट। मकिदुनिया के लोगों ने अनजाने में इसी वाचा-क्रम को दोहराया। और ध्यान दीजिए, पौलुस पूरे प्रकरण को "अनुग्रह" कहता है, आयत 1 में परमेश्वर का अनुग्रह जो उन पर हुआ, आयत 4 में भागी होने का अनुग्रह। देना उनकी उपलब्धि नहीं, उन पर आए अनुग्रह का उभार है। इसका अर्थ कठोर भी है: जो व्यक्ति स्वयं को रोककर केवल पैसा देता है, वह वास्तव में परमेश्वर को खरीदने की कोशिश कर रहा है, समर्पित नहीं हो रहा। परमेश्वर हमारी थैली से पहले हमारा "हाँ" चाहते हैं।
मुख्य सूत्र
यह क्रम, पहले स्वयं और फिर सम्पत्ति, पौलुस ने खुद नहीं गढ़ा; उसने इसे मसीह में देखा था। इसी अध्याय में कुछ ही पंक्तियों बाद वह लिखता है कि प्रभु यीशु "धनी होकर भी तुम्हारे लिये कंगाल बन गया" (आयत 9)। मसीह ने पहले कोई भेंट नहीं भेजी, वे स्वयं आए। देहधारण ही परमेश्वर का "अपने आपको दे देना" है, और क्रूस उसकी पराकाष्ठा। पुराने नियम की बलि-व्यवस्था इसी की ओर इशारा करती रही: पशु वेदी पर पूरा चढ़ता था, टुकड़ों में नहीं, क्योंकि परमेश्वर आधा जीवन स्वीकार नहीं करते। मकिदुनिया के गरीब विश्वासियों ने जो किया, वह नई सृष्टि का चिन्ह है: जिन पर मसीह का आत्म-दान बरसा, वे स्वयं भी आत्म-दान करने लगते हैं। अनुग्रह अपनी ही आकृति दोहराता है।
दर्पण
पैसा देना अक्सर स्वयं को बचाने का सबसे सम्मानित तरीका होता है। हम कलीसिया के खाते में स्थायी दान लगा देते हैं, मिशन के लिए चेक भेजते हैं, और चुपचाप उम्मीद करते हैं कि इससे हमारे शनिवार, हमारा घर और हमारा फ़ोन नम्बर सुरक्षित रह जाएँगे। माता-पिता बच्चों को उपहार देकर उपस्थिति की कमी ढाँकते हैं; हम बुज़ुर्ग रिश्तेदार को रुपये भेजते हैं ताकि जाना न पड़े। यह आयत उस सौदे पर सीधी उँगली रखती है। मकिदुनिया के लोगों के पास देने के लिए बहुत कम था, इसलिए वे वही दे सके जो असल में माँगा गया था: अपने आप। और पौलुस को अपने आप को देना, यानी एक जीते-जागते इंसान के काम में उलझ जाना, आराम की मौत है। आज ही किसी एक विश्वासी को संदेश भेजिए और अगले हफ़्ते का एक ठोस समय, दिन और घंटा बताकर, उसकी किसी ज़रूरत के लिए दे दीजिए।
शास्त्र की गूँज
पौलुस बाद में इस्राएल के मन्ना की ओर लौटता है: "जिसने बहुत बटोरा उसका कुछ अधिक न निकला और जिसने थोड़ा बटोरा उसका कुछ कम न निकला" (आयत 15)। जंगल में परमेश्वर ने ऐसी अर्थव्यवस्था बनाई थी जिसमें जमाखोरी असम्भव थी, क्योंकि प्रजा पहले से ही परमेश्वर की थी। जो लोग स्वयं परमेश्वर के हैं, उनकी रोटी भी बँटने के लिए है। और रोमियों 12:1 में पौलुस इसी बात को आदेश बना देता है: अपने शरीरों को जीवित बलिदान करके चढ़ा दो। ध्यान दें, वहाँ भी बलिदान कोई वस्तु नहीं, स्वयं व्यक्ति है। 2 कुरिन्थियों 8:5 उस आदेश की चश्मदीद गवाही है: कहीं कुछ गरीब कलीसियाओं में यह वाकई हुआ।
पहले पाठक
कुरिन्थ बंदरगाह का समृद्ध शहर था, और वहाँ की कलीसिया अपने वरदानों पर गर्वित (आयत 7)। उन्हें उदाहरण दिया जा रहा है उन मकिदुनी कलीसियाओं का, जो आर्थिक रूप से उनसे नीचे थीं। यह चुभने वाली तुलना थी। इससे भी गहरी बात: उस संसार में बड़ा दान देना प्रतिष्ठा खरीदना था। दाता संरक्षक बन जाता था और पानेवाला उसका आश्रित। मकिदुनिया के लोगों ने इस पूरे ढाँचे को उलट दिया। उन्होंने पैसा देकर पौलुस पर अधिकार नहीं जमाया, उन्होंने खुद को उसके हाथ में सौंप दिया। और यह चन्दा यरूशलेम के यहूदी विश्वासियों के लिए था, यानी अन्यजाति कलीसियाएँ उन लोगों की सेवा कर रही थीं जिन्हें वे कभी देख भी नहीं पाएँगी। यह केवल राहत-कोष नहीं, एक शरीर होने का सार्वजनिक प्रमाण था।
एक बारीकी
सबसे चौंकाने वाले शब्द हैं "परमेश्वर की इच्छा से हमको भी"। पहला चरण समझ में आता है: प्रभु को अपने आप को देना। दूसरा चरण अखरता है, क्योंकि पौलुस मनुष्य है, विवादों में घिरा, आलोचना का शिकार प्रेरित। फिर भी वह कहता है कि उसे स्वयं को सौंपना परमेश्वर की इच्छा थी। यहाँ आत्मिकता का वह मुहावरा टूट जाता है जिसमें भक्ति सीधी ऊपर जाती है और लोगों को छोड़कर जाती है। परमेश्वर की इच्छा शरीर धारण करती है: वह किसी नाम, किसी काम, किसी झगड़ालू समुदाय के रूप में हमारे सामने खड़ी होती है। प्रभु को समर्पण जिसमें किसी मनुष्य के लिए समय, धैर्य और उपलब्धता शामिल न हो, वह अभी अधूरा है।
चिंतन
मेरे देने में क्रम क्या है: मैं पहले अपने आप को सौंपता हूँ, या पहले कुछ दे देता हूँ ताकि अपने आप को बचा सकूँ?
परमेश्वर की इच्छा से मुझे इस समय किस एक ठोस व्यक्ति या समुदाय के हाथ में अपने आप को सौंपना है, और मैं वहाँ किस बात से पीछे हट रहा हूँ?
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2 Corinthians 8:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 कुरिन्थियों 8:5 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 8:5 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 8:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 कुरिन्थियों 8:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 8:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 8 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस चंदा इकट्ठा करने वालों की सिफारिश कर रहा है, यानी उन लोगों की जो पैसे के थैले लेकर सफर करते थे। और इन्हीं साधारण भाइयों के बारे में वह लिखता है, "वे कलीसियाओं के दूत और मसीह की महिमा हैं।" जो काम तुझे मामूली लगता है, वफादारी से किया जाए तो उसी में मसीह की महिमा चमकती है। कौन तुझे ऐसा नाम दे सकता है आज?
पौलुस मकिदुनिया की कलीसियाओं के दान को उनकी उपलब्धि नहीं कहता। वह कहता है, "हम तुम्हें परमेश्वर के उस अनुग्रह का समाचार देते हैं, जो मकिदुनिया की कलीसियाओं पर हुआ है।" जो खुद कंगाल थे, उनके देने में उसने परमेश्वर का हाथ पहचाना। तेरा खुला हाथ भी तेरी बड़ाई नहीं, उसके अनुग्रह की निशानी है।
पिता, धन्यवाद कि आप हमसे आज्ञा के दबाव में नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम से देना चाहते हैं। धन्यवाद उन विश्वासियों के लिए जिनका उत्साह हमें जगाता है, और इसके लिए कि आप हमारे प्रेम की सच्चाई परखकर उसे और खरा बनाते हैं।
पौलुस चंदा इकट्ठा कर रहा था, और उसने अकेले जाना ठीक न समझा। भाइयों को साथ लिया, हिसाब खुला रखा: "क्योंकि जो बातें भली हैं, उनके लिये हम यत्न करते हैं, केवल प्रभु के सामने ही नहीं, परन्तु मनुष्यों के सामने भी।" "मेरा मन तो साफ है" कहकर हम कई बातें छिपा लेते हैं। पर सच्चाई ऐसी होनी चाहिए जो दिखे भी। तेरे पैसों का हिसाब कोई पूछे, तो तू घबराएगा या शांत रहेगा?
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