बाइबल व्याख्या

2 इतिहास 20

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

अम्मोनी, मोआबी और मूनी मिलकर यहूदा पर चढ़ आते हैं, और यहोशापात, डरा हुआ, पूरे देश में उपवास की घोषणा करके मन्दिर के आँगन में खड़ा होकर प्रार्थना करता है। एक लेवीय, यहजीएल, पर परमेश्वर का आत्मा उतरता है और वह घोषित करता है कि "युद्ध तुम्हारा नहीं, परमेश्वर का है" और यहूदा को केवल ठहरे रहकर देखना है। अगले दिन सेना के आगे-आगे गायक चलते हैं, और जब स्तुति शुरू होती है तब शत्रु आपस में ही कट मरते हैं; यहूदा तीन दिन लूट बटोरता है और बजाते-गाते यरूशलेम लौट आता है।

मर्म

पद 17 के शब्द नए नहीं हैं। "ठहरे रहना, और खड़े रहकर यहोवा की ओर से अपना बचाव देखना" ठीक वही बात है जो मूसा ने लाल समुद्र के किनारे घबराए हुए इस्राएल से कही थी, जब आगे पानी और पीछे फ़िरौन के रथ थे। इतिहास की यह पुस्तक जानबूझकर उस क्षण को फिर से जगाती है: तकोआ का जंगल एक नया लाल समुद्र है। इससे परमेश्वर के बारे में एक बात साफ़ होती है जो इस पुस्तक के पूरे धर्मविज्ञान की रीढ़ है, कि छुटकारा परमेश्वर का काम है, मनुष्य की रणनीति का नहीं। पर ध्यान दीजिए, "ठहरे रहना" का अर्थ घर बैठे रहना नहीं है; उन्हें फिर भी सुबह उठकर मैदान में जाना पड़ा। विश्वास निष्क्रियता नहीं, बिना हथियार उठाए मोर्चे पर खड़े होने का साहस है।

सूत्र

यहोशापात की प्रार्थना का पद 9 कोई नई बात नहीं गढ़ता, वह सुलैमान के मन्दिर-समर्पण की प्रार्थना को लगभग शब्दशः दोहराता है: तलवार, मरी, अकाल, और इस भवन के सामने खड़े होकर दुहाई देना। यानी राजा परमेश्वर से कहता है, आपने जो वादा इसी जगह पर लिया था, उसे अब पूरा कीजिए। यही प्रार्थना का सबसे मज़बूत आधार है, परमेश्वर के अपने वचन को उनके सामने रखना। और यहाँ से एक धागा सीधे मसीह तक जाता है: जिस मन्दिर के सामने खड़े होकर यहूदा चिल्लाया, उसी मन्दिर के बारे में यीशु ने कहा कि यहाँ मन्दिर से भी बड़ा कोई है। अब हमारी दुहाई किसी इमारत के सामने नहीं, उस व्यक्ति में होती है जो स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति का स्थान है।

दर्पण

पद 12 ईमानदारी का नमूना है: "हमारा तो बस नहीं चलता और हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करना चाहिये? परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं।" यह उस आदमी की भाषा है जिसके हाथ से नियंत्रण छूट चुका है। मेडिकल रिपोर्ट आ चुकी है, नौकरी का अनुबंध नहीं बढ़ा, बेटे ने फ़ोन उठाना बंद कर दिया, और आपके पास कोई योजना नहीं बची। हम आम तौर पर ऐसे क्षण में या तो और ज़्यादा दौड़ते हैं या सुन्न होकर बैठ जाते हैं। यहोशापात तीसरा रास्ता दिखाता है: वह परिवार समेत, बाल-बच्चों और स्त्रियों समेत, खुलेआम अपनी लाचारी स्वीकार करता है। आज यह कीजिए: एक काग़ज़ पर वह एक परिस्थिति लिखिए जिसमें आपको "कुछ नहीं सूझता", और नीचे पद 12 का अन्तिम वाक्य अपने हाथ से लिखकर ज़ोर से पढ़िए।

प्रश्न

अध्याय का अन्त असहज है। जिस राजा ने गायकों को सेना के आगे भेजा, वही राजा अगले ही पद में दुष्ट अहज्याह से व्यापारिक मेल करता है, और उसके जहाज़ टूट जाते हैं। और पद 33 ठण्डे स्वर में कहता है कि ऊँचे स्थान ढाए न गए। एक ही अध्याय में इतनी बड़ी जीत और इतनी स्पष्ट अधूरापन क्यों? इसे आसान नैतिक शिक्षा में बदलना बेईमानी होगी। पाठ हमें यह मानने को मजबूर करता है कि एक असाधारण अनुभव किसी के हृदय को स्थायी रूप से नहीं बदल देता। बराका की तराई में धन्यवाद गाने वाला आदमी भी कुछ साल बाद वही पुरानी समझौतावादी बुद्धि अपना सकता है। जीत की स्मृति आज्ञाकारिता का विकल्प नहीं बनती, और यह बात हमारे अपने गवाहियों पर भी लागू होती है।

संदर्भ

यहोशापात नौवीं शताब्दी ईसा पूर्व में यहूदा का राजा था, आसा का पुत्र, उत्तर के आहाब के घराने से विवाह-संबंध में बँधा हुआ। हमला दक्षिण-पूर्व से आता है, मृत सागर के पार से एनगदी होकर, यानी यरूशलेम से कुछ ही दिन की दूरी पर। हमलावर कोई अजनबी नहीं: अम्मोन, मोआब और सेईर इब्राहीम और इसहाक के रिश्तेदारों के वंश हैं, और व्यवस्थाविवरण के अनुसार मिस्र से आते समय इस्राएल को इन्हीं के देश छोड़ देने का आदेश मिला था। यहोशापात प्रार्थना में ठीक यही पकड़ता है, पद 10 में: हमने इन्हें छोड़ दिया था, और अब ये हमें निकालने आए हैं। प्राचीन पूर्व में युद्ध देवताओं का मुक़दमा समझा जाता था; राजा यहाँ अदालत में वादी बनकर खड़ा होता है।

श्रोता

इतिहास की पुस्तकें बंधुआई से लौटे उस समुदाय के लिए लिखी गईं जिसके पास न सेना थी, न स्वतंत्र राजा, न कोई राजनीतिक वज़न, केवल एक नया बना मन्दिर और आसपास के शत्रुतापूर्ण पड़ोसी। उनके कानों में पद 20 का वाक्य घण्टी की तरह बजा होगा: "अपने परमेश्वर यहोवा पर विश्वास रखो, तब तुम स्थिर रहोगे।" इब्रानी में यहाँ एक ही मूल शब्द दो बार आता है, आमन, जिससे हमारा "आमीन" बना है; विश्वास करना और टिके रहना एक ही क्रिया के दो रूप हैं। यही शब्द यशायाह ने आहाज से कहे थे, जिसने माना नहीं। लौटे हुए समुदाय ने सुना: तुम्हारी सुरक्षा दीवारों से नहीं, उस परमेश्वर पर टिके रहने से आती है जिसकी करुणा सदा की है।

चिंतन

आपके जीवन की कौन सी "बराका की तराई" है, वह जगह जहाँ आपने धन्यवाद किया था, और क्या आप उसे याद करते हैं या भूल चुके हैं?

यहोशापात ने परमेश्वर के अपने वादे उन्हीं के सामने रखे; आप किस वचन को लेकर आज प्रार्थना में खड़े हो सकते हैं?

2 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

2 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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2 Chronicles 20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 इतिहास 20 का क्या अर्थ है?
अम्मोनी, मोआबी और मूनी मिलकर यहूदा पर चढ़ आते हैं, और यहोशापात, डरा हुआ, पूरे देश में उपवास की घोषणा करके मन्दिर के आँगन में खड़ा होकर प्रार्थना करता है। एक लेवीय, यहजीएल, पर परमेश्वर का आत्मा उतरता है और वह घोषित करता है कि "युद्ध तुम्हारा नहीं, परमेश्वर का है" और यहूदा को केवल ठहरे रहकर देखना है। अगले दिन सेना के आगे-आगे गायक चलते हैं, और जब स्तुति शुरू होती है तब शत्रु आपस में ही कट मरते हैं; यहूदा तीन दिन लूट बटोरता है और बजाते-गाते यरूशलेम लौट आता है।
2 इतिहास 20 किस विषय में है?
यहोशापात की प्रार्थना का पद 9 कोई नई बात नहीं गढ़ता, वह सुलैमान के मन्दिर-समर्पण की प्रार्थना को लगभग शब्दशः दोहराता है: तलवार, मरी, अकाल, और इस भवन के सामने खड़े होकर दुहाई देना। यानी राजा परमेश्वर से कहता है, आपने जो वादा इसी जगह पर लिया था, उसे अब पूरा कीजिए। यही प्रार्थना का सबसे मज़बूत आधार है, परमेश्वर के अपने वचन को उनके सामने रखना। और यहाँ से एक धागा सीधे मसीह तक जाता है: जिस मन्दिर के सामने खड़े होकर यहूदा चिल्लाया, उसी मन्दिर के बारे में यीशु ने कहा कि यहाँ मन्दिर से भी बड़ा कोई है। अब हमारी दुहाई किसी इमारत के सामने नहीं, उस व्यक्ति में होती है जो स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति का स्थान है।
2 इतिहास 20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अध्याय का अन्त असहज है। जिस राजा ने गायकों को सेना के आगे भेजा, वही राजा अगले ही पद में दुष्ट अहज्याह से व्यापारिक मेल करता है, और उसके जहाज़ टूट जाते हैं। और पद 33 ठण्डे स्वर में कहता है कि ऊँचे स्थान ढाए न गए। एक ही अध्याय में इतनी बड़ी जीत और इतनी स्पष्ट अधूरापन क्यों? इसे आसान नैतिक शिक्षा में बदलना बेईमानी होगी। पाठ हमें यह मानने को मजबूर करता है कि एक असाधारण अनुभव किसी के हृदय को स्थायी रूप से नहीं बदल देता। बराका की तराई में धन्यवाद गाने वाला आदमी भी कुछ साल बाद वही पुरानी समझौतावादी बुद्धि अपना सकता है। जीत की स्मृति आज्ञाकारिता का विकल्प नहीं बनती, और यह बात हमारे अपने गवाहियों पर भी लागू होती है।
2 इतिहास 20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इतिहास की पुस्तकें बंधुआई से लौटे उस समुदाय के लिए लिखी गईं जिसके पास न सेना थी, न स्वतंत्र राजा, न कोई राजनीतिक वज़न, केवल एक नया बना मन्दिर और आसपास के शत्रुतापूर्ण पड़ोसी। उनके कानों में पद 20 का वाक्य घण्टी की तरह बजा होगा: "अपने परमेश्वर यहोवा पर विश्वास रखो, तब तुम स्थिर रहोगे।" इब्रानी में यहाँ एक ही मूल शब्द दो बार आता है, आमन, जिससे हमारा "आमीन" बना है; विश्वास करना और टिके रहना एक ही क्रिया के दो रूप हैं। यही शब्द यशायाह ने आहाज से कहे थे, जिसने माना नहीं। लौटे हुए समुदाय ने सुना: तुम्हारी सुरक्षा दीवारों से नहीं, उस परमेश्वर पर टिके रहने से आती है जिसकी करुणा सदा की है।
2 इतिहास 20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यहोशापात ने परमेश्वर के अपने वादे उन्हीं के सामने रखे; आप किस वचन को लेकर आज प्रार्थना में खड़े हो सकते हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Chronicles 20 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 13

पिता, आज मैं भी अपने पूरे परिवार के साथ तेरे सामने खड़ा हूँ। छोटे बच्चों से लेकर बड़ों तक, हम सब तुझ पर नज़र लगाए हैं। हमारे पास कोई हल नहीं, पर तू है। हमें साथ मिलकर तुझ पर भरोसा करना सिखा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

यहोशापात परमेश्वर को याद दिलाता है, "जिनके विरुद्ध तूने इस्राएल को मिस्र देश से आते समय जाने न दिया, और वे उनकी ओर से मुड़ गए और उनको नाश न किया।" सोचिए, जिन्हें आज्ञा मानकर छोड़ दिया था, वही अब चढ़ाई कर रहे हैं। कभी आपकी आज्ञाकारिता भी आपको महँगी पड़ी है? यहोशापात शिकायत नहीं करता, बस सब कुछ परमेश्वर के सामने रख देता है। यही प्रार्थना की सच्चाई है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

यहोशापात एक भयानक संकट के सामने खड़ा है। मोआब और अम्मोन की सेनाएँ चढ़ आई हैं। पर वह अपने डर से पहले परमेश्वर के इतिहास को याद करता है, "उन्होंने उसमें बसकर तेरे नाम का एक पवित्रस्थान बनाकर कहा।"

यह मंदिर सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं थी, यह एक गवाही थी कि परमेश्वर ने उन्हें यह भूमि दी। जब तू आज डरता है, क्या तू याद करता है कि परमेश्वर ने तेरे जीवन में क्या क्या बनाया है? पुरानी गवाहियाँ नई लड़ाइयों में साहस बनती हैं।

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