1 कुरिन्थियों 3:16
पाठ
"क्या तुम नहीं जानते" — पौलुस यह पूछते हैं, और प्रश्न में ही एक हल्की-सी झिड़की छिपी है। जो बात कुरिन्थ की कलीसिया को सबसे पहले जाननी चाहिए थी, वही वे भूल बैठे हैं। पद 16 का सार यही है: तुम लोग, यह झगड़ती-गुटबाजी करती मंडली, परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे बीच बसता है। ध्यान दीजिए, यहाँ "तुम" बहुवचन है; पौलुस किसी एक भक्त के हृदय की नहीं, पूरी सभा की बात कर रहे हैं। जिस भवन की नींव पद 11 में यीशु मसीह हैं, जिस खेती को पद 9 में परमेश्वर बढ़ाते हैं, वह भवन अब नाम पाता है: मन्दिर। और मन्दिर का अर्थ केवल इमारत नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति ठहरती है।
मूल बात
यहाँ जो कहा जा रहा है, उसे धीरे से पचाना पड़ता है। यरूशलेम का मन्दिर तब भी खड़ा था, पत्थर, सोना, पर्दे, याजक, धूप का धुआँ। और पौलुस इस साधारण, आपसी खींचतान में उलझी सभा की ओर हाथ बढ़ाकर कहते हैं: पवित्र स्थान यहाँ है। परमेश्वर ने अपना निवास बदल दिया। "वास करता है" जिस यूनानी क्रिया से आता है, उसमें अस्थायी डेरे का नहीं, स्थायी घर का भाव है; आत्मा यहाँ मेहमान नहीं, निवासी हैं। इसका अर्थ यह भी है कि जब तुम भाई से ईर्ष्या करते हो, तो तुम केवल संबंध नहीं बिगाड़ रहे, तुम पवित्र स्थान में गंदगी फैला रहे हो। और यही प्रश्न देर तक गूँजता है: यदि परमेश्वर सचमुच यहाँ बसते हैं, तो हम इस "यहाँ" के साथ इतनी लापरवाही से क्यों पेश आते हैं?
सूत्र
परमेश्वर के निवास की कहानी बाइबल में एक लम्बी यात्रा है। पहले अदन का बगीचा, जहाँ वे संध्या के समय टहलते थे। फिर मरुभूमि में कपड़े का तम्बू, जो खेमों के बीच चलता-फिरता रहा। फिर सुलैमान का पत्थरों वाला भवन, और उस पर उतरता बादल। हर बार निवास और निकट आता गया, और हर बार मनुष्य ने उसे दूषित किया। यीशु मसीह ने अपने शरीर को मन्दिर कहा और कहा कि उसे ढा दो, वे तीन दिन में उसे उठा देंगे; वहीं से यह परम्परा नई दिशा लेती है। पद 11 इसीलिए पद 16 से पहले आना ज़रूरी था: नींव पहले पड़ चुकी है, और वह नींव कोई सिद्धांत नहीं, एक व्यक्ति है। मसीह के जी उठने के बाद परमेश्वर की उपस्थिति अब किसी स्थान से नहीं, एक देह से बँधी है, और वह देह उनके लोग हैं।
दर्पण
यह पद हमारे भीतर की उस सूक्ष्म प्रतिस्पर्धा को उघाड़ता है जिसे हम सेवा का नाम देकर छिपा लेते हैं। किसका समूह बढ़ रहा है, किसे मंच मिला, किसने आपकी बात काटी, कौन "मेरे" पक्ष का है और कौन दूसरे पादरी का। कुरिन्थ में यही चल रहा था और पौलुस उसे शारीरिकता कहते हैं। पर चोट यहाँ लगती है: जिस व्यक्ति से आप ठंडे स्वर में बात करते हैं, उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा निवास करते हैं। आप किसी सामान्य प्रतिद्वंद्वी के पास से नहीं गुज़र रहे; आप पवित्र स्थान के पास से गुज़र रहे हैं और उसे अनदेखा कर रहे हैं। कल्पना कीजिए कि रविवार की सभा में आप हर चेहरे को इसी दृष्टि से देखें। आज ही, कलीसिया के उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिससे आपके मन में खिंचाव है, और उस नाम को देखते हुए ज़ोर से कहिए: "इनमें परमेश्वर का आत्मा वास करते हैं।"
अन्तर्पाठ
इसी पत्री में आगे, अध्याय 6 में, पौलुस लगभग यही वाक्य दोहराते हैं, पर वहाँ वे एकवचन में हर विश्वासी के शरीर को पवित्र आत्मा का मन्दिर कहते हैं। दोनों बातें सच हैं, पर क्रम महत्वपूर्ण है: पहले समुदाय, फिर व्यक्ति। हम अक्सर उल्टा पढ़ते हैं और इस वचन को निजी पवित्रता तक सीमित कर देते हैं, जबकि पौलुस यहाँ गुटबाजी पर वार कर रहे हैं। दूसरी गूँज यूहन्ना 2 से आती है, जहाँ यीशु मन्दिर के आँगन में कोड़ा उठाते हैं और फिर अपनी देह को मन्दिर कहते हैं। मन्दिर के प्रति उनका जोश कोमल नहीं था। यही जोश अगले पद, 17 में सुनाई देता है, जहाँ नाश करने वाले के नाश की बात होती है।
प्रसंग
कुरिन्थ पचास के दशक का एक व्यापारिक बन्दरगाह था, रोमी उपनिवेश, दो समुद्रों के बीच बसा, धन और महत्वाकांक्षा से भरा। वहाँ मन्दिर आम दृश्य थे और संरक्षक-आश्रित की संस्कृति गहरी थी: बड़े आदमी के साथ अपना नाम जोड़ना सामाजिक पूँजी थी। "मैं पौलुस का हूँ", "मैं अपुल्लोस का हूँ" इसीलिए केवल धार्मिक पसंद नहीं, प्रतिष्ठा की राजनीति थी। कलीसिया किसी भव्य भवन में नहीं, किसी धनी सदस्य के घर के आँगन में जुड़ती थी, तीस-चालीस लोग, दास और स्वतंत्र, यहूदी और यूनानी, एक ही मेज़ पर। इसी छोटी, तनावग्रस्त, सामाजिक रूप से असहज मंडली को पौलुस मन्दिर कहते हैं। यह वाक्य उस समय सुनने में लगभग असंगत लगा होगा।
विवरण
"क्या तुम नहीं जानते" पौलुस इस पत्री में बार-बार पूछते हैं, और हर बार वे कोई नई जानकारी नहीं देते, बल्कि भूली हुई पहचान की याद दिलाते हैं। यह प्रश्न शिक्षक का नहीं, चरवाहे का है। पाप हमेशा अज्ञान से नहीं आता; अक्सर वह स्मृति के क्षरण से आता है। हम जानते हैं, पर जीते ऐसे हैं जैसे न जानते हों। और शायद इसीलिए पौलुस उत्तर नहीं देते, प्रश्न को खुला छोड़ देते हैं। प्रश्न उत्तर से अधिक देर तक भीतर रहता है। आप इसे बन्द नहीं कर सकते; यह आपके साथ सोमवार की सुबह तक चलता है, दफ़्तर तक, रसोई तक, उस बातचीत तक जिसे आप टाल रहे हैं।
चिंतन
अगर मैं सचमुच मानूँ कि परमेश्वर का आत्मा मेरी कलीसिया के बीच निवास करते हैं, तो मेरी कौन-सी आदत सबसे पहले असहज हो जाएगी?
पौलुस उत्तर देने के बजाय प्रश्न पूछते हैं। मैं किन सच्चाइयों को "जानता" तो हूँ, पर उनके अनुसार जीना भूल चुका हूँ?
1 Corinthians में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Church problems, cross shaped answers: Corinth feels very modern.
Paul For Everyone: 1 Corinthians
Wright's readable guide through love, gifts and resurrection.
1 Corinthians: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
1 Corinthians 3:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 3:16 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 3:16 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 3:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 3:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 3:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
कुरिन्थ के विश्वासी गुटों में बँट रहे थे, "मैं पौलुस का हूँ", "मैं अपुल्लोस का।" पौलुस बात उलट देता है: "क्या पौलुस, क्या अपुल्लोस, क्या कैफा... सब कुछ तुम्हारा है।" तू किसी नेता की जागीर नहीं। और उस सूची में "मरण" भी लिखा है। जो चीज़ तुझे सबसे ज़्यादा डराती है, वह भी तेरी है, तेरी मालिक नहीं।
पौलुस पूछता है, "अपुल्लोस क्या है? और पौलुस क्या है? केवल सेवक, जिनके द्वारा तुमने विश्वास किया।" ध्यान दे, वह "कौन" नहीं पूछता, "क्या" पूछता है। जो नाम पर कुरिन्थुस की कलीसिया बँट रही थी, वही नाम खुद को इतना छोटा कर रहा है। तेरा विश्वास किसी प्रचारक की देन नहीं, प्रभु की देन है। तो फिर तू किसके पीछे चल रहा है, सेवक के या स्वामी के?
पिता, याद दिला कि मेरा शरीर और यह मंडली तेरे रहने की जगह है। मुझे बचा उन आदतों और शब्दों से जो इसे तोड़ते हैं। जो कुछ तूने पवित्र ठहराया है, उसे मैं हल्के में न लूँ। मुझे संभालना सिखा, अपने आप को भी और अपने भाई बहनों को भी।
पिता, मैं अक्सर सोचता हूँ कि सब कुछ मेरी मेहनत पर टिका है। पर सच तो यह है कि बीज बोना और पानी देना मेरे हाथ में है, बढ़ाना तेरे हाथ में। मुझे बस अपना काम ईमानदारी से करने दे, और बाकी तुझ पर छोड़ना सिखा दे।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें