2 इतिहास 26:16
पाठ
बावन साल का राज, जीती हुई लड़ाइयाँ, बनाए हुए गुम्मट, खुदवाए हुए हौद, तीन लाख से ऊपर की सेना, और मिस्र की सीमा तक फैली हुई कीर्ति। और फिर एक ही शब्द से सब मुड़ जाता है: "परन्तु।" पद 16 कहता है कि जब उज्जियाह सामर्थी हो गया, तब उसका मन फूल उठा, और वह बिगड़कर अपने परमेश्वर यहोवा का विश्वासघात कर बैठा। विश्वासघात किस रूप में? वह धूप जलाने के लिये यहोवा के मन्दिर में घुस गया, उस वेदी तक पहुँच गया जो उसके लिये नहीं थी। ध्यान दीजिए, उसने मूर्ति नहीं पूजी, वह परमेश्वर से दूर नहीं भागा। वह परमेश्वर के घर के भीतर, धूपदान हाथ में लिये, अपनी सीमा लाँघ गया।
मूल बात
यह पाठ कहता है कि सफलता अपने भीतर एक चुपचाप काम करता हुआ ज़हर रखती है। पद 15 कहता है कि उज्जियाह को "अद्भुत सहायता" मिली, यानी उसकी ताकत उसकी कमाई नहीं, परमेश्वर का उपहार थी। पद 16 दिखाता है कि उसने उसी उपहार को अपनी हैसियत का प्रमाण समझ लिया। यही पाप का सबसे शिष्ट रूप है: परमेश्वर की भलाई को अपनी योग्यता में बदल लेना। और इसका फल दूरी नहीं, अतिक्रमण है। उज्जियाह परमेश्वर से भागता नहीं, वह परमेश्वर की जगह पर खड़ा होना चाहता है। इब्रानी शब्द यहाँ माअल है, वही शब्द जो विवाह में बेवफाई के लिये इस्तेमाल होता है। परमेश्वर की पवित्रता का अर्थ यही है कि उनके सामने हमारी भूमिका तय है, और उस भूमिका से संतुष्ट रहना ही भक्ति है।
जोड़ने वाला सूत्र
इस्राएल में राजा और याजक दो अलग बुलाहटें थीं, और यह अलगाव कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, एक धर्मशास्त्रीय बाड़ थी। राजा लोगों पर शासन करता था, याजक लोगों को परमेश्वर के सामने ले जाता था, और कोई भी मनुष्य दोनों को एक साथ नहीं सँभाल सकता था, क्योंकि एक ही हाथ में तलवार और धूपदान पकड़ना हमेशा अहंकार में बदल जाता है। उज्जियाह ने इस बाड़ को तोड़ा और कोढ़ी होकर बाहर आया। पूरा पुराना नियम एक ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा में है जो दोनों भूमिकाएँ वैध रूप से उठा सके। मसीह वही हैं: राजा भी, महायाजक भी, पर उन्होंने यह पद छीना नहीं, पिता के हाथ से ग्रहण किया। उज्जियाह मन्दिर में घुसा और अशुद्ध होकर निकला; मसीह मन्दिर में आए और अशुद्धों को शुद्ध करके निकले।
दर्पण
यह पाठ उस जगह पर उँगली रखता है जहाँ हम सबसे कम देखना चाहते हैं: हमारी सफलता के ठीक बाद वाला पल। जिस टीम को आपने पन्द्रह साल खड़ा किया है, वहाँ अब आप हर फैसले में घुस जाते हैं, क्योंकि आपको लगता है कि आपका अनुभव आपको हर कमरे का अधिकार देता है। घर में आपका बेटा अब पैंतीस का है, पर आप अब भी उसके पैसों, उसकी नौकरी, उसकी शादी पर अंतिम शब्द बोलना चाहते हैं। कलीसिया में आप वह व्यक्ति हैं जो सब जानता है, और इसलिए किसी की टोक नहीं सुनते। ध्यान दीजिए, उज्जियाह गलत काम करने नहीं गया था, धूप जलाना तो उपासना थी। पाप यह था कि वह उस जगह खड़ा हुआ जो उसकी नहीं थी। आज दस मिनट निकालिए, उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसके अधिकार क्षेत्र में आपने पिछले महीने दखल दिया, और उसे यह संदेश भेजिए: "वह फैसला तुम्हारा था, मैंने अपनी हद पार की, माफ़ करना।"
मुख्य पात्र
उज्जियाह सोलह साल की उम्र में सिंहासन पर बैठा, और जब तक जकर्याह उसे परमेश्वर की बात समझाता रहा, वह खोजता रहा और सफल होता रहा। यही उसका सबसे दुखद वाक्य है: उसकी भक्ति एक दूसरे आदमी की उपस्थिति पर टिकी थी। जब वह आवाज़ चुप हुई, भीतर कोई जड़ नहीं बची, सिर्फ़ उपलब्धियों का ढेर। और ढेर जितना ऊँचा होता है, सलाह उतनी ही कम पहुँचती है। पद 19 में जब अस्सी याजक उसके सामने खड़े होते हैं, वह सुधरता नहीं, झुँझला उठता है, धूपदान हाथ में लिये हुए। यह आदमी बूढ़ा, सम्मानित, सफल, और भीतर से अकेला है, इतना अकेला कि अस्सी लोगों की सच्ची बात भी उसे केवल अपमान लगती है। सफलता का सबसे बड़ा ख़तरा यही है कि वह हमें सुधार के परे ले जाती है।
कठिन प्रश्न
बावन साल की वफ़ादारी, और एक पल की ढिठाई, और सज़ा जीवन भर की। यह असंगत लगता है, और इसे मीठा बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उसे मन्दिर से निकाला गया, अलग घर में रहना पड़ा, और कब्र भी राजाओं के बीच नहीं, क्योंकि "वह कोढ़ी है।" क्या परमेश्वर इतने कठोर हैं? पाठ इसका उत्तर नहीं देता, पर एक संकेत देता है: उज्जियाह का कोढ़ उसी जगह प्रकट हुआ जहाँ याजक की पवित्र पगड़ी बँधती थी, माथे पर। जो चिह्न वह चुराना चाहता था, वही चिह्न उसका न्याय बन गया। शायद यहाँ सज़ा नहीं, उजागर होना है: परमेश्वर ने वही दिखा दिया जो भीतर पहले से था। फिर भी यह सवाल काँटे की तरह रह जाता है, और उसे रहने देना ही ईमानदारी है।
शास्त्र की गूँज
शाऊल की कहानी इसकी जुड़वाँ है। गिलगाल में वह समूएल की प्रतीक्षा न कर सका और स्वयं होमबलि चढ़ा बैठा, और उसी दिन उसका राज्य उसके हाथ से खिसकना शुरू हुआ। दोनों राजा धार्मिक काम करते हुए गिरे, उपासना के बीचोंबीच। दूसरी ओर फिलिप्पियों 2 में पौलुस मसीह के बारे में लिखता है कि उन्होंने परमेश्वर के तुल्य होने को छीन लेने की वस्तु नहीं समझा, बल्कि अपने आप को शून्य कर दिया। यही उज्जियाह का उल्टा है। उज्जियाह ऊपर चढ़ा और कोढ़ी होकर नीचे आया; मसीह नीचे उतरे और ऊँचे किए गए। परमेश्वर के राज्य में सीढ़ी हमेशा उलटी दिशा में चलती है।
चिंतन
आपके जीवन में वह जकर्याह कौन है, जिसकी बात सुनकर आप रुक जाते हैं, और पिछली बार आपने उसे कब बोलने दिया था?
आपकी किस सफलता ने चुपचाप आपको यह विश्वास दिला दिया है कि अब कुछ नियम आप पर लागू नहीं होते?
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2 Chronicles 26:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 इतिहास 26:16 का क्या अर्थ है?
2 इतिहास 26:16 किस विषय में है?
2 इतिहास 26:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 इतिहास 26:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 इतिहास 26:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Chronicles 26 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब चारों ओर से मुश्किलें घेर लेती हैं, तब मैं अपनी ताकत पर नहीं, तेरी मदद पर भरोसा करता हूँ। जैसे तूने बीते समय में अपने लोगों के लिए लड़ाई लड़ी, वैसे ही आज मेरे साथ खड़ा रह। मेरी हर जीत तेरे ही हाथ का काम है, और इसका सारा श्रेय तुझे ही जाता है।
पिता, तूने हर काम के लिए किसी न किसी को ठहराया है, चाहे वह गिनती लिखने वाला हो या अगुवाई करने वाला। मुझे भी अपनी जगह पहचानने में मदद कर। जो छोटा सा काम मेरे हाथ में है, उसे मैं मन लगाकर और ईमानदारी से करूँ, यही मेरी प्रार्थना है।
उज्जियाह ने सेना के हर एक जन के लिये तैयारी की, "उज्जियाह ने उनकी समस्त सेना के लिये ढालें, बरछे, टोप, झिलम, धनुष और गोफन के पत्थर तैयार किए।" ढाल, टोप, झिलम, सब कुछ। पर जिस दिल को उसने खुला छोड़ दिया, वहीं से घमंड घुस आया और वही उसका पतन बना। तुम भी बहुत कुछ सँभालते हो। क्या अपने भीतर के लिये भी कोई पहरा रखा है?
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