प्रेरितों के काम 11:26
पाठ
बरनबास तरसुस की गलियों में एक आदमी को ढूँढ़ता फिर रहा है, जिसे कलीसिया ने वर्षों से लगभग भुला दिया था। वह उसे पा लेता है और अन्ताकिया ले आता है, और वहाँ दोनों पूरे एक साल तक उस नई, मिली-जुली मंडली के साथ इकट्ठे होते हैं और भीड़ को सिखाते रहते हैं। उसी शहर में, उसी साल के भीतर कहीं, चेलों को पहली बार एक नया नाम मिलता है: मसीही। लूका इसे बड़े शांत ढंग से लिखता है, जैसे कोई मामूली सूचना हो, पर यही वाक्य बताता है कि यीशु के अनुयायी अब यहूदी धर्म के भीतर की एक टोली नहीं, बल्कि शहर की नज़र में अपनी अलग पहचान रखनेवाले लोग बन गए हैं।
मूल बात
अन्ताकिया रोमी साम्राज्य का तीसरा सबसे बड़ा शहर था: ओरोन्तेस नदी के किनारे, रात में मशालों से जगमगाती स्तंभों वाली मुख्य सड़क, दाफ़ने के मंदिरों की धूप की गंध, सीरियाई, यूनानी और यहूदी मुहल्ले एक-दूसरे से सटे हुए, और हर मुहल्ले की अपनी भाषा और अपने देवता। ऐसे शहर में लोग नाम देने में माहिर थे, क्योंकि किसी को पहचानना ज़रूरी था। "मसीही" शब्द की बनावट लातीनी ढंग की है, जैसे किसी नेता के पक्ष के लोग: हेरोदी, कैसर के लोग। यानी बाहरवालों ने इन्हें देखकर कहा होगा, "ये उस मसीह के आदमी हैं।" यही परमेश्वर के अनुग्रह का काम है: जहाँ पहचान खून, खतने और वंश से तय होती थी, वहाँ अब एक व्यक्ति के साथ जुड़ाव पहचान बन गया।
जुड़ा हुआ सूत्र
अब्राहम से कहा गया था कि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे, और सदियों तक यह वादा यरूशलेम के मंदिर के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। अध्याय 11 की पूरी कहानी इसी वादे के खुलने की कहानी है: पहले पतरस का दर्शन और वह वाक्य, "जो कुछ परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है, उसे अशुद्ध मत कह," फिर स्तिफनुस के बाद तितर-बितर हुए विश्वासी, जो अपनी जान बचाते भागे और अनजाने में सुसमाचार को सीरिया तक ले गए। अन्ताकिया में यूनानी विश्वास करते हैं, और तब उस समुदाय को एक नाम मिलता है जो न यहूदी है न यूनानी, बल्कि मसीह से बना है। यही सूत्र क्रूस से निकलता है: जो दीवार खतने और वंश ने खड़ी की थी, उसे यीशु की मृत्यु ने गिरा दिया, और अन्ताकिया की गलियों में वह गिरी हुई दीवार पहली बार दिखाई देने लगी।
दर्पण
हम सब किसी न किसी नाम से जीते हैं: पेशे का नाम, जाति का नाम, परिवार में मिली उपाधि, या वह नाम जो हमारी असफलताओं ने हमें दे दिया है। अन्ताकिया का यह नाम बताता है कि आपकी असली पहचान वह है जिससे आप चिपके हुए हैं, न कि वह जो आपके पास है। और यहाँ बात चुभती है: बाहरवालों ने यह नाम देखकर दिया, सुनकर नहीं। किसी ने इन लोगों के आपसी व्यवहार, उनके खाने की मेज़, उनके पैसे के इस्तेमाल को देखा और कहा, "ये उस मसीह के आदमी हैं।" आपके दफ़्तर के लोग, आपके पड़ोसी, आपके बच्चे आपको देखकर कौन सा नाम रखेंगे? बरनबास ने एक भुला दिए गए आदमी को खोजने में महीने लगा दिए। आज दस मिनट निकालकर उस एक व्यक्ति को संदेश भेजिए जिसकी सेवा या वरदान को आपकी मंडली ने किनारे कर दिया है, और उसमें साफ़-साफ़ नाम लेकर लिखिए कि आप उसमें क्या देखते हैं।
मुख्य पात्र
बरनबास इस पद का धड़कता हुआ दिल है। लूका उसके बारे में कहता है कि "वह एक भला मनुष्य था; और पवित्र आत्मा और विश्वास से परिपूर्ण था।" यह भलाई भावुक नहीं, बहुत व्यावहारिक है। यरूशलेम ने उसे जाँच करने भेजा था, और वह अनुग्रह देखकर आनन्दित हुआ, यानी उसने नियम नहीं, परमेश्वर का काम खोजा। फिर वह कुछ ऐसा करता है जो नेतृत्व की दुनिया में दुर्लभ है: वह तरसुस जाकर शाऊल को ढूँढ़ता है, उस आदमी को जिससे कलीसिया डरती थी और जिसे वह चुपचाप घर भेज चुकी थी। बरनबास जानता था कि वह जिसे लाएगा वह उससे बड़ा हो जाएगा, और उसने फिर भी उसे लाया। जो अपनी जगह की चिंता छोड़ देता है, वही दूसरों के लिए जगह बना सकता है।
बारीकी
"एक वर्ष तक" वाले इन तीन शब्दों पर नज़र ठहराइए। कोई चमत्कार नहीं, कोई सभा नहीं जिसमें हज़ारों बपतिस्मा लें; बस बारह महीने की मंडली के साथ इकट्ठे होना और सिखाना। सोचिए कि उस सिखाने में क्या-क्या तय होता होगा: यूनानी विश्वासी जो कभी मूर्तियों के सामने खाना खाते थे, अब यहूदी भाइयों के साथ एक मेज़ पर बैठना सीख रहे हैं; किसे दास कहें, किसे भाई; बाज़ार से खरीदे माँस का क्या करें। यह धीमा, थकाऊ, रोज़मर्रा का काम था। और लूका जोड़ता है कि इसी के बीच नाम पड़ा। पहचान सिखाने की मेहनत से बनती है, नारों से नहीं। जिस मंडली में एक साल तक ठोस शिक्षा चलती है, उसे शहर देर-सबेर नाम देने लगता है।
अन्य वचन
यह नाम बाइबल में केवल दो और बार आता है, और दोनों बार किसी बाहरी या विरोधी के मुँह से जुड़ा हुआ। राजा अग्रिप्पा पौलुस से व्यंग्य में कहता है कि वह उसे "मसीही" बना देना चाहता है, यानी यह शब्द अदालत की भाषा बन चुका था। और पतरस अपनी पहली पत्री में लिखता है कि यदि कोई मसीही होने के कारण दुःख उठाए तो लज्जित न हो, बल्कि परमेश्वर की महिमा करे। दोनों जगह नाम के साथ कीमत जुड़ी है। अन्ताकिया में जो शब्द पड़ोसियों की ज़बान पर एक पहचान-चिह्न था, वह कुछ वर्षों में मुकदमे का आरोप बन गया। हमारे लिए यह नाम सस्ता हो चुका है; शुरुआत में यह वह लेबल था जिसे ओढ़कर आदमी अपनी जान जोखिम में डालता था।
मनन
बाहर के लोग मेरे व्यवहार को देखकर मुझे कौन सा नाम देंगे, और क्या वह नाम मसीह से जुड़ा होगा?
मेरे आसपास वह "शाऊल" कौन है जिसे कलीसिया ने भुला दिया है, और उसे ढूँढ़ने के लिए मुझे किस तरसुस तक जाना पड़ेगा?
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